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नागरिकता संशोधन विधेयक से जुड़ी दस खास बातें, क्यों ये शुरू से विवादों में रहा

News18Hindi
Updated: December 9, 2019, 6:53 PM IST
नागरिकता संशोधन विधेयक से जुड़ी दस खास बातें, क्यों ये शुरू से विवादों में रहा
अमित शाह लोकसभा में नागरिकता संशोधन विधेयक पेश करते हुए

नागरिक संशोधन विधेय़क 2019 लोकसभा में पेश कर दिया गया है. ये क्या है, इसे लेकर क्या विवाद है और ये किस तरह एनआरसी से अलग है. इसके लागू होने से क्या हो जाएगा

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  • Last Updated: December 9, 2019, 6:53 PM IST
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लोकसभा में नागरिकता संशोधन विधेयक से जुड़ा बिल पेश कर दिया गया है. इसे केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने पेश किया. जानिए क्या इस बिल की खास बातें और क्यों ये शुरू से विवादों में रहा है.

1. इस विधेयक में बांग्लादेश, अफ़गानिस्तान और पाकिस्तान के छह अल्पसंख्यक समुदायों (हिंदू, बौद्ध, जैन, पारसी, ईसाई और सिख) से ताल्लुक़ रखने वाले लोगों को भारतीय नागरिकता देने का प्रस्ताव है.

2. अभी तक के कानून के अनुसार किसी भी व्यक्ति को भारतीय नागरिकता लेने के लिए कम से कम 11 साल भारत में रहना पड़ता है, इसकी समयावधि अनिवार्य है. इस विधेयक में पड़ोसी देशों के अल्पसंख्यकों के लिए यह समयावधि 11 से घटाकर छह साल कर दी गई है.

3. इस बिल में संशोधन होने के बाद भारत में अवैध तरीक़े से दाख़िल होने वाले लोगों को छह धर्मों के लोगों को नागरिकता मिलने का रास्ता आसान हो जाएगा. उन्हें वापस उनके देश भी नहीं भेजा जा सकेगा.

4. इसे लेकर विवाद इसलिए है क्योंकि विपक्षी पार्टियों का कहना है कि यह विधेयक मुसलमानों के ख़िलाफ़ है. साथ ही भारतीय संविधान के अनुच्छेद-14 (समानता का अधिकार) का उल्लंघन करता है. एक धर्मनिरपेक्ष देश किसी के साथ धर्म के आधार पर भेदभाव कैसे कर सकता है. भारत के पूर्वोत्तर राज्यों असम, मेघालय, मणिपुर, मिज़ोरम, त्रिपुरा, नागालैंड और अरुणाचल प्रदेश में भी इस विधेयक का ज़ोर-शोर से विरोध हो रहा है क्योंकि ये राज्य बांग्लादेश की सीमा के बेहद क़रीब हैं.

असम में नागरिकता संशोधन विधेयक का विरोध


5. पूर्वोत्तर के राज्यों में इस संशोधन बिल का विरोध इसलिए हो रहा है क्योंकि यहां कथित तौर पर पड़ोसी राज्य बांग्लादेश से मुसलमान और हिंदू दोनों ही बड़ी संख्या में आकर बसे हैं. आरोप है कि मौजूदा सरकार हिंदू मतदाताओं को अपने पक्ष में करने की कोशिश में प्रवासी हिंदुओं के लिए भारत की नागरिकता लेकर यहां बसना आसान बनाना चाहती है.6. एक आरोप ये भी है कि सरकार इस विधेयक के बहाने असम में एनआरसी लिस्ट से बाहर हुए अवैध हिंदुओं को वापस भारतीय नागरिकता पाने में मदद करना चाहती है.

7. ये बिल मोदी सरकार के पिछले कार्यकाल में भी पेश हुआ था. लेकिन नागरिकता संशोधन बिल 2016 लोकसभा में पारित होने के बाद राज्य सभा में लटक गया और फिर चुनाव आ गए. अब इसे दोबारा लाया जा रहा है.

असम में नागरिकता संशोधन बिल का समर्थन


8. एनआरसी इससे जुड़ा है लेकिन इससे अलग एक नेशनल सिटिज़न रजिस्टर है यानी भारतीय नागरिकों की एक लिस्ट. एनआरसी से पता चलता है कि कौन भारतीय नागरिक है और कौन नहीं. जिसका नाम इस लिस्ट में नहीं, उसे अवैध निवासी माना जाता है.

9. असम भारत का पहला राज्य है जहां वर्ष 1951 के बाद एनआरसी लिस्ट अपडेट की गई. असम में नेशनल सिटिजन रजिस्टर सबसे पहले 1951 में तैयार कराया गया था. 21 अगस्त 2019 को एनआरसी की आख़िरी लिस्ट जारी की गई और 19,06,657 लोग इस लिस्ट से बाहर हो गए.

10. नागरिकता अधिनियम, 1955 भारतीय नागरिकता से जुड़ा एक विस्तृत क़ानून है. इसमें बताया गया है कि किसी व्यक्ति को भारतीय नागरिकता कैसे दी जा सकती है और भारतीय नागरिक होने के लिए ज़रूरी शर्तें क्या हैं. इसे अब तक पांच बार (1986, 1992, 2003, 2005 और 2015) संशोधित किया जा चुका है.

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First published: December 9, 2019, 5:20 PM IST
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