दुनिया के ये 8 करोड़ लोग कैसे झेल रहे हैं COVID-19 महामारी?

दुनिया के ये 8 करोड़ लोग कैसे झेल रहे हैं COVID-19 महामारी?
करोड़ों रिफ्यूजी बेसिक स्वास्थ्य सेवाओं के लिए मोहताज हैं. फाइल फोटो.

विदेशी लोगों के प्रति नफरत को Xenophobia कहा जाता है. यह बड़ा कारण है, जिसके चलते अत्याचारों, हिंसा और अन्यायों जैसी वजहों से बेघर हो गए लोग किसी दूसरी जगह भी ठीक ठाक ज़िंदगी से महरूम हो जाते हैं. 20 जून यानी World Refugee Day पर जानिए कि क्या है करोड़ों वंचितों के सामने Coronavirus का खतरा.

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दुनिया की सबसे ज़्यादा संवेदनशील (Vulnerable) आबादी की तकलीफों को Corona Virus संक्रमण की महामारी जैसे मुंह चिढ़ा रही है. विस्थापितों (Displaced) की यह बड़ी आबादी पहले ही गरीबी रेखा (Poverty Line) के नीचे है और बुनियादों ज़रूरतों के लिए ही मजबूर भी. ऐसे में, कोविड 19 के प्रकोप के कारण इस आबादी को सबसे पहले अपने रोज़गार (Employment) और आय से हाथ धोना पड़ा. अब भोजन और दवाओं के अभाव के साथ ये आबादी महामारी के कहर सामने डटी है.

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विश्व रिफ्यूजी दिवस पर तो कम से कम तकरीबन 8 करोड़ की इस आबादी की चिंता करना ही चाहिए. दुनिया में कितने विस्थापित हैं, किन हालात में जी रहे हैं और महामारी के हालात में इनके सामने क्या चुनौतियां हैं? इसके साथ ये भी जानने लायक है कि इनके लिए क्या कहीं कोई कोशिश हो रही है. रेडक्रॉस फेडरेशन (IFRC) के प्रमुख फ्रैंकेसो रॉका की इस चिंता से शुरूआत कीजिए:



दुनिया भर में सामाजिक सुरक्षा का जो जाल है, कोविड 19 के चलते फैले आ​र्थिक पतन के दौर में संवेदनशील समुदायों के लिए मदद के उपाय कर रहा है, लेकिन रिफ्यूजी इस सिस्टम की भी दरारों में ही रह जाते हैं.

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सीरिया हो या बांग्लादेश, रिफ्यूजी कैंपों में बुनियादी ज़रूरतों के अभाव के हालात से महामारी को लेकर डर होने की खबरें आ चुकी हैं. फाइल फोटो.


थोड़ा बहुत रोज़गार कैसे हुआ खत्म?
चूंकि रिफ्यूजियों को वही काम मिलते हैं जो अनौपचारिक अर्थव्यवस्था का सेक्टर है यानी असंगठित और असंगत. ऐसे में महामारी का असर अर्थव्यवस्था पर पड़ा तो सबसे पहले यही लोग प्रभावित हुए. रिफ्यूजियों के लिए संयुक्त राष्ट्र की इकाई UNHCR के गिलियन ट्रिग्स के मुताबिक लॉकडाउन हुआ तो बहुत जल्दी रिफ्यूजी बेरोज़गार हुए. लेबनान और कोलंबिया के आधे रिफ्यूजी अपने आय के साधन खो चुके हैं. साथ ही, अमेरिका में हाल ही सैटल हुए रिफ्यूजियों में से दो तिहाई के सामने बेरोज़गारी का संकट है.

दुनिया में तुर्की वह देश है, जहां रिफ्यूजियों की सबसे बड़ी आबादी दर्ज है. इस देश में रिफ्यूजियों के हालात पर फोकर करने वाली संस्था रेडक्रॉस और रेड क्रेसेंट के सर्वे में पता चला कि 70 फीसदी रिफ्यूजी महामारी के चलते रोज़गार खो चुके हैं. आधे से ज़्यादा रिफ्यूजी परिवार अपने रोज़ के खर्चों के लिए मोहताज हो गए हैं. रिफ्यूजियों के हालात पर और जानकारियों से पहले जानें कि इनकी आबादी के आंकड़े क्या हैं.

8 करोड़ विस्थापितों में से 85% विकासशील देशों में
दुनिया भर में विस्थापितों की कुल संख्या करीब 8 करोड़ है. ये आंकड़े UNHCR के रिकॉर्ड में दर्ज लोगों के आधार पर हैं जबकि यह वैश्विक संस्था खुद कबूल कर रही है कि रिपोर्टेड केसों के अलावा लोगों को जोड़ा जाए तो वास्तविक आंकड़े और ज़्यादा हो सकते हैं. खैर, अब तक जो डेटा सामने है, उसके मुताबिक :

कितने हैं रिफ्यूजी : करीब 3 करोड़
सबसे ज़्यादा किन देशों में : तुर्की में 36 लाख, कोलंबिया में 18 लाख, पाकिस्तान व युगांडा में 14-14 लाख और जर्मनी में 11 लाख. यानी पांच देशों में करीब 40% रिफ्यूजी.
सबसे ज़्यादा कहां से : सीरिया से 66 लाख, वेनेज़ुएला से 37 लाख, अफगानिस्तान से 27 लाख, दक्षिण सूडान से 22 लाख और म्यांमार से 11 लाख लोग रिफ्यूजी हैं. यानी इन पांच देशों से कुल 68% रिफ्यूजी.
और क्या कहते हैं आंकड़े : करीब 8 करोड़ विस्थापितों में से साढ़े तीन करोड़ आबादी बच्चों की है. दुनिया के कुल रिफ्यूजियों में से 85% विकासशील देशों में हैं, जबकि 27% को शरण पिछड़े देशों में मिली है.

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UNHCR के पोर्टल पर विस्थापितों संबंधी डेटा विस्तार से दिया गया है.


कैंपों में बीमारी के खतरे के सिवा कुछ नहीं!
अत्याचारों, हिंसा या अन्य कारणों से अपने घरों से विस्थापित हुए करोड़ों लोगों में से 85% चूंकि विकासशील और पिछड़े देशों में हैं तो हेल्थ केयर के लिए मोहताजी ज़ाहिर है. 2017 में म्यांमार में अत्याचार के बाद बांग्लादेश जैसे देशों में रिफ्यूजियों की संख्या बढ़ी. वहीं, UNHCR के मुताबिक दुनिया के सबसे बड़े रिफ्यूजी कैंप कुटुपैलॉंग में 6 लाख से ज़्यादा लोगों के सामने स्वास्थ्य का संकट खड़ा है.

दुनिया के ज़्यादातर हिस्सों में विस्थापितों को टेंट के शेल्टरों में जगह मिली है, जहां भारी भीड़ को एक साथ कम से कम सुविधाओं के साथ रखा जाता है. या फिर लेबनान की तरह ये लोग बड़ी तादाद में छोटी बिल्डिंगों में रहते हैं. ऐसे में सोशल डिस्टेंसिंग और क्वारंटाइन का ज़िक्र तो दूर की बात है, साफ सफाई की बुनियादी मुश्किलें हैं.


वायरस के प्रकोप के पहले ही ये लोग साफ पानी और भोजन के लिए मजबूर थे. खबरों के मुताबिक ऐसे कैंपों में साबुन, मास्क और दस्ताने तक उपलब्ध नहीं हैं, सही सूचनाएं तक कई जगह नहीं पहुंच रहीं, ऐसे में टेस्टिंग तो कल्पना मात्र ही है.

इस आबादी के लिए क्या कोशिशें हैं?
सामाजिक और स्वयंसेवी संस्थाओं की मदद से कई जगहों पर रिफ्यूजी या विस्थापितों के कैंपों तक बुनियादी मदद पहुंचाए जाने के इंतज़ाम किए जा रहे हैं, लेकिन ये बहुत मामूली हैं और ये भी निश्चित नहीं है कि कब तक होते रहेंगे. दूसरी ओर, नीतिगत तौर पर एक ठोस कदम सामने आया है. विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने UNHCR के ​साथ किए एग्रीमेंट में दुनिया भर के विस्थापितों के लिए स्वास्थ्य सुविधाएं बेहतर किए जाने का कदम उठाया है.

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दस लाख रोहिंग्या रिफ्यूजियों के बांग्लोदश कैंप में कोरोना संक्रमण पाए जाने की खबर आई थी. फाइल फोटो.


मई के आखिरी हफ्ते में WHO ने कहा था कि इस एग्रीमेंट के तहत इस साल प्रमुख लक्ष्य यही है कि करीब 7 करोड़ की इस आबादी को कोविड 19 संक्रमण के खतरे से बचाया जा सके. इसके लिए जहां विस्थापितों की आबादी है, उन देशों की सरकारों के साथ बातचीत कर इनके लिए स्वास्थ्य सुविधाएं बेहतर किए जाने की हिदायतें दी गई हैं. अब ये कदम कितने कारगर साबित होंगे, ये तो समय बताएगा.

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आखिरकार, रेडक्रॉस और रेड क्रेंसेट की दुनिया भर की टीमों ने अपने अनुभवों के आधार पर कहा है कि बांग्लादेश के कॉक्स बाज़ार, दक्षिण अमेरिका, मध्य अमेरिका जैसे अलग अलग क्षेत्रों में भी विस्थापितों के संवेदनशील समूह महामारी और उसके प्रभावों के शिकार हो चुके हैं. कुल मिलाकर, मानवता के हित में सामाजिक सुरक्षा के ढांचे को और लचीला, और समावेशी होना ही होगा.
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