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कुंभ विशेष: ये है सबसे ज्यादा पढ़े-लिखे साधुओं का अखाड़ा, डॉक्टर और प्रोफेसर भी हैं शामिल

कुंभ विशेष: ये है सबसे ज्यादा पढ़े-लिखे साधुओं का अखाड़ा, डॉक्टर और प्रोफेसर भी हैं शामिल

तीन साधु (फाइल फोटो)

तीन साधु (फाइल फोटो)

हालांकि दस हज़ार से भी ज्यादा नागा संन्यासियों वाला यह देश का दूसरा सबसे बड़ा अखाड़ा कुछ सालों पहले एक शराब कारोबारी को महामंडलेश्वर बनाने के चलते विवादों में भी घिर गया था.

    जनवरी 2019 में प्रयागराज (पहले इलाहाबाद) में कुंभ मेला आयोजित होने जा रहा है. दुनिया के कुछ सबसे बड़े धार्मिक अनुष्ठानों में से एक इस मेले को यूनेस्को की भी मान्यता मिल चुकी है. शाही स्नान की तारीख की घोषणा हो चुकी है जिसके साथ ही 15 जनवरी से मेले की शुरुआत हो जाएगी जो 4 मार्च को शिवरात्रि के साथ खत्म होगी. कुंभ के दौरान यहां आने वाले साधुओं के अखाड़े आकर्षण का केंद्र होते हैं. ऐसा माना जाता है कि देश के विभिन्न कोनों से आने वाले साधु-संतों के इन अखाड़ों में से 7 की स्थापना शंकराचार्य ने खुद की थी. ये अखाड़े थे- महानिर्वाणी, निरंजनी, जूना, अटल, आवाहन, अग्नि और आनंद. इन अखाड़ों का मुख्य उद्देश्य हिंदू धर्म के प्राचीन मंदिरों और धार्मिक लोगों को अन्य धर्मों के आक्रमणकारियों से बचाना था. साथ ये ये धार्मिक क्रिया-कलाप में भी जुड़े रहते थे.

    हिंदू मान्यताओं के अनुसार साधुओं और संन्यासियों के अलग-अलग अखाड़ों की धर्म को लेकर अलग-अलग व्याख्या और विचार है. इन सभी अखाड़ों में से जूना अखाड़ा सबसे बड़ा अखाड़ा है. इसके बाद निरंजनी और महानिर्वाणी अखाड़ा सबसे बड़े अखाड़े हैं. उनके अध्यक्ष श्री महंत तथा अखाड़ों के प्रमुख आचार्य महामण्डेलेश्वर के रुप में माने जाते हैं. आज हम आपको निरंजनी अखाड़े के बारे में बता रहे हैं.

    हजारों साल पुराना है अखाड़े का इतिहास
    निरंजनी अखाड़ा की स्थापना सन् 904 में विक्रम संवत 960 कार्तिक कृष्णपक्ष दिन सोमवार को गुजरात की मांडवी नाम की जगह पर हुई थी. महंत अजि गिरि, मौनी सरजूनाथ गिरि, पुरुषोत्तम गिरि, हरिशंकर गिरि, रणछोर भारती, जगजीवन भारती, अर्जुन भारती, जगन्नाथ पुरी, स्वभाव पुरी, कैलाश पुरी, खड्ग नारायण पुरी, स्वभाव पुरी ने मिलकर अखाड़ा की नींव रखी. अखाड़ा का मुख्यालय तीर्थराज प्रयाग में है. उज्जैन, हरिद्वार, त्रयंबकेश्वर व उदयपुर में अखाड़े के आश्रम हैं.

    माना जाता है सबसे ज्यादा पढ़े-लिखे साधु-संतों का अखाड़ा
    राजस्थान पत्रिका की एक रिपोर्ट की मानें तो शैव परंपरा के निरंजनी अखाड़े के करीब 70 फीसदी साधु-संतों ने उच्च शिक्षा प्राप्त की है. इनमें से कुछ डॉक्टर, कुछ वकील, प्रोफेसर, संस्कृत के विद्वान और आचार्य शामिल हैं.



    इस अखाड़े के एक संत स्वामी आनंदगिरि नेट क्वालिफाइड हैं. वह आईआईटी खड़गपुर, आईआईएम शिलांग में लेक्चर भी दे चुके हैं. अभी वे बनारस से पीएचडी कर रहे हैं.

    अखाड़े का महामंडलेश्वर बनने के लिए क्या हैं ज़रूरी योग्यताएं
    अखाड़े का महामंडलेश्वर बनने के लिए कोई निश्चित शैक्षणिक योग्यता की जरूरत नहीं होती है. इन अखाड़ों में महामंडलेश्वर बनने के लिए व्यक्ति में वैराग्य और संन्यास का होना सबसे जरूरी माना जाता है. महामंडलेश्वर का घर-परिवार और पारिवारिक संबंध नहीं होने चाहिए.

    हालांकि इसके लिए आयु का कोई बंधन नहीं है लेकिन यह जरूरी होता है कि जिस व्यक्ति को यह पद मिले उसे संस्कृत, वेद-पुराणों का ज्ञान हो और वह कथा-प्रवचन दे सकता हो. कोई व्यक्ति या तो बचपन में अथवा जीवन के चौथे चरण यानी वानप्रस्थाश्रम में महामंडलेश्वर बन सकता है. लेकिन इसके लिए अखाड़ों में परीक्षा ली जाती है

    अखाड़े के वर्तमान पीठाधीश्वर हैं स्वामी पुण्यानंद गिरि जी महाराज
    निरंजनी अखाड़ा के इष्टदेव कार्तिकेय स्वामी जी व धर्मध्वजा का रंग गेरुआ है. अखाड़ा के वर्तमान आचार्य पीठाधीश्वर स्वामी पुण्यानंद गिरि जी महाराज हैं. अखाड़ा के सचिव महंत नरेंद्र गिरि ने एक बार इंटरव्यू के दौरान कहा था किृ सनातन धर्म की रक्षा एवं प्रचार-प्रसार के लिए वे निरंतर कोशिशें करते रहते हैं. संस्कृत विद्यालयों में गरीब बच्चों को मुफ्त में शिक्षित दिलाते हैं. वहीं गौ, गंगा व गायत्री की रक्षा के लिए भी अखाड़े के महंत निरंतर जनजागरण करते हैं.

    चिलम फूंकता एक साधु (फाइल फोटो)


    विवादों में भी घिर चुका है यह अखाड़ा
    कुछ सालों पहले डिस्कोथेक और बार संचालक रियल इस्टेट कारोबारी सचिन दत्ता को इस अखाड़े का महामंडलेश्वर सच्चिदानंद गिरि बनाया गया था. जिसके बाद निरंजनी अखाड़ा विवादों में घिर गया था.

    फिलहाल इस अखाड़े में दस हजार से अधिक नागा संन्यासी हैं. जबकि महामंडलेश्वरों की संख्या 33 है. जबकि महंत व श्रीमहंत की संख्या एक हजार से अधिक है.

    नासिक कुंभ में शैव और वैष्णव अखाड़ों के लिए होती है अलग-अलग व्यवस्था
    बाकी कुंभ मेलों में सभी अखाड़े एक साथ स्नान करते है लेकिन नाशिक के कुंभ में वैष्णव अखाड़े नाशिक में और शैव अखाड़े त्र्यंबकेश्वर में स्नान करते हैं. यह व्यवस्था पेशवा के दौर में कायम की गई जो सन् 1772 से चली आ रही है.

    यह भी पढ़ें: जानिए नागा बनने के दौरान साधुओं को देनी पड़ती हैं कैसी कठिन परीक्षाएं?

    Tags: Allahabad Kumbh Mela, Allahabad news, Hindu, Naga Chaitanya, Religion, Spirituality

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