इन 5 बड़ी वजहों से पाकिस्तान FATF की ग्रे लिस्ट में बरकरार

न्यूज़18 क्रिएटिव

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आतंकवाद को पोसने (Terrorism Financing) के इल्ज़ामों के चलते पाकिस्तान को फिर फ्रांस की अंतर्राष्ट्रीय संस्था (French International Group) से राहत ​नहीं बल्कि जून तक की चेतावनी मिली. फ्रांस से रिश्तों की फांस पाकिस्तान को चुभी या अमेरिकी नाराज़गी भारी पड़ी?

  • News18Hindi
  • Last Updated: February 28, 2021, 3:46 PM IST
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तीन दिनों तक फ्रांस स्थित वित्तीय कार्रवाई कार्यदल (FATF) की बैठक में विचार किया गया कि पाकिस्तान (Pakistan) के बारे में क्या फैसला क्या जाए. बैठकों पर बैठकों हुईं तो देखा गया कि पेरिस स्थित एफएटीएफ मुख्यालय ने जो 27 पॉइंट्स बताए थे, उनमें से खास तौर से तीन पर पाकिस्तान उम्मीद के मुताबिक काम नहीं कर पाया. हालांकि यह भी अंदेशा था कि पाकिस्तान कहीं ब्लैक लिस्ट (Pakistan in Black List) में न डाल दिया जाए, लेकिन आखिरकार फैसला हुआ कि पाकिस्तान को इस साल जून तक ग्रे लिस्ट में ही रखा जाए.

पाकिस्तान के स्वतंत्र थिंकटैंक तबादलाब की रिपोर्ट के हवाले से आ रही खबरों में कहा गया ​कि 2008 से 2019 के बीच FATF की ग्रे लिस्ट में रहने के कारण पाकिस्तान को 38 अरब डॉलर का नुकसान हुआ. यह भी नोट किया गया कि जिस अवधि में पाकिस्तान को इस लिस्ट से छूट मिली, तो अर्थव्यवस्था को फायदा भी हुआ. पाकिस्तान को इस बार भी राहत न मिलना एक बड़ा झटका है. जानिए कि इस झटके के पांच बड़े कारण क्या रहे.

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1. आतंकियों पर लगाम न कस पाना
पाकिस्तान को ग्रे लिस्ट से न हटाए जाने के FATF के फैसले के पीछे मुख्य कारणों में अहम यही रहा कि संयुक्त राष्ट्र द्वारा लिस्ट किए गए आतंकियों के खिलाफ पाकिस्तान कारगर कदम नहीं उठा सका. इन आतंकियों में जैश ए मोहम्मद चीफ मसूद अज़हर, लश्क का संस्थापक हाफिज़ सईद और लश्कर का कमांडर जकीउर रहमान का नाम शामिल है.

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भारत के लिए मोस्ट वॉंटेड आतंकी है मौलाना मसूद अज़हर.


बता दें कि ये तीनों ही आतंकी भारत में मोस्ट वॉंटेड आतंकी हैं, जो 26/11 के मुंबई आतंकी हमले और 2019 के पुलवामा आतंकी हमले के मामलों में आरोपी हैं.

2. मनी लॉंड्रिंग रोकने में फेल
आतंकी फंडिंग पर लगाम कसने में भी पाकिस्तान फेल साबित हुआ. इस मामले में ऐसे 18 देशों में से पाकिस्तान एक रहा. यह एक बड़ा पहलू इसलिए भी है क्योंकि इसी वजह से विदेशी कंपनियां पाकिस्तान में निवेश करने से कतराती हैं. FATF ने इस बारे में पाकिस्तान को जो कदम उठाने को कहा था, उतने वो उठा नहीं सका. FATF के प्रमुख ने प्रेस से कहा भी कि पाकिस्तान ने कुछ अहम प्रोग्रेस दिखाई लेकिन खाई अब भी गहरी है.

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उन्होंने कहा कि आतंकी फंडिंग और मनी लॉंड्रिंग को रोकने की दिशा में बढ़े पाकिस्तान को अभी कई चुनौतियों का सामना करना है. खास तौर से 3 मोर्चों पर पाकिस्तान को मज़बूती से काम करना होगा.

3. डैनियल पर्ल के कातिल की रिहाई
अमेरिका में 9/11 के आतंकी हमले के बाद पाकिस्तान में आतंकवाद की रिपोर्टिंग करने पहुंचे पत्रकार डैनियल का सिर 2002 में आतंकियों ने काट डाला था. इस केस में प्रमुख आरोपी उमर सईद शेख था, जिसे पिछले ही दिनों पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट ने निर्दोष कहकर छोड़ दिया. अमेरिका ने पाकिस्तान के इस कदम पर ऐतराज़ जताया था. अब माना जा रहा है कि FATF ने भी इस फैसले को पाकिस्तान की कमज़ोरी के तौर पर देखा.

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अमेरिकी पत्रकार डैनियल पर्ल की निर्मम हत्या करीब 19 साल पहले पाकिस्तान में कर दी गई थी.


4. ब्लैक लिस्ट के करीब होना
बीती 25 फरवरी को ही FATF के प्रमुख ने पाकिस्तान के हवाई किलों को ढहाते हुए साफ कहा कि पाकिस्तान इस खुशफहमी में न रहे कि उसे ब्लैक लिस्ट में नहीं डाला जा सकता. संस्था ने साफ चेतावनी दी कि अगर पाकिस्तान ने कारगर ढंग से आतंकवाद और आतंकी फंडिंग को पनाह देने के खिलाफ कदम नहीं उठाए तो उस पर यह खतरा मंडरा रहा है कि वो ईरान और उत्तर कोरिया की तरह ब्लैक लिस्टेड हो जाए.

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5. फ्रांस के साथ उलझे रिश्ते
फ्रांस में पैगंबर मोहम्मद के कार्टून को लेकर जो विवाद हुए, उनमें पाकिस्तान के रुख को लेकर फ्रांस नाराज़ रहा. आपको याद दिला दें कि पाकिस्तान में 'बॉयकॉट फ्रांस' एक मुहिम के तौर पर चलाया गया था. भारी विरोध प्रदर्शनों में फ्रांस के राष्ट्रपति के पुतले और झंडे भी जलाए गए थे. चूंकि FATF फ्रांस बेस्ड संस्था ही है, इसलिए रिपोर्ट्स में कहा गया फ्रांस समेत कुछ यूरोपीय देशों ने पाकिस्तान को ग्रे लिस्ट में ही रखने की मंशा जताई.

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पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान.


आखिर में यह भी जानना चाहिए कि FATF अस्ल में है क्या. 1989 में कई देशों ने साझा कोशिशों के तहत मनी लॉंड्रिंग के खिलाफ लड़ाई के लिए अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर यह संस्था बनी थी. दुनिया भर के लिए आर्थिक गड़बड़ियों के मामलों में निगरानी करने वाली संस्था के तौर पर काम करने वाले इस समूह का रोल 9/11 के हमले के बाद और बड़ा हो गया, आतंकी फाइनेंसिंग के खिलाफ लड़ाई भी इसके दायरे में आ गई.
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