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जानिए दुनिया में किस महामारी से निपटने के लिए पहली बार बना था आईसीयू वार्ड

डेनमार्क के कोपेनहेगन में ब्लेगडैम हॉस्पिटल में 1952 में पोलियो के मरीजों को डॉक्टर और नर्सों को हाथ से पंप कर सांस लेने में मदद करनी पडी थी. (फोटो साभार: नेचर मैगजीन)

डेनमार्क के कोपेनहेगन में ब्लेगडैम हॉस्पिटल में 1952 में पोलियो के मरीजों को डॉक्टर और नर्सों को हाथ से पंप कर सांस लेने में मदद करनी पडी थी. (फोटो साभार: नेचर मैगजीन)

कोरोना वायरस (Coronavirus) के गंभीर मामलों में मरीजों को आईसीयू (ICU) में शिफ्ट करने और वेंटिलेटर (Ventilators) की जरूरत महसूस की जा रही है. यहां तक कि मांग के मुताबिक वेंटिलेटर्स की आपूर्ति नहीं हो पा रही है. आइए जानते हैं कि सबसे पहली बार आईसीयू वार्ड किस महामारी से निपटने के लिए और किस देश में बनाया गया था.

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    कोरोना वायरस (Coronavirus) के गंभीर मामलों में इलाज के लिए इंटेंसिव केयर यूनिट (ICU) और वेंटिलेटर्स (Ventilators) को काफी अहम माना जा रहा है. स्‍वास्‍थ्‍य विशेषज्ञों का कहना है कि दुनिया भर में ज्‍यादातर गंभीर तौर पर संक्रमण की चपेट में आए मरीजों को आईसीयू में भर्ती करने की जरूरत हो रही है. वहीं, कोरोना वायरस के श्‍वसन तंत्र पर हमला करने के कारण मरीजों को सांस लेने में बहुत दिक्‍कत होती है. ऐसे में उन्‍हें वेंटिलेटर पर लेना पड़ रहा है. बता दें कि अब तक दुनियाभर में 24 लाख से ज्‍यादा लोग कोरोना वायरस की चपेट में आ चुके हैं, जिनमें 1.7 लाख से ज्‍यादा लोगों की मौत हो चुकी है. वहीं, 6.53 लाख से ज्‍यादा लोग इलाज के बाद स्‍वस्‍थ्‍य हो चुके हैं. मरीजों की संख्‍या के और ज्‍यादा होने की आशंका के चलते पूरी दुनिया में वेंटिलेटर्स बनाने की होड़ मची हुई है. आइए जानते हैं कि गंभीर मरीजों को जीवन देने वाले आईसीयू और वेंटिलेटर को पहली बार कब और कहां इस्‍तेमााल किया गया.

    वैज्ञानिक धीरे-धीरे वेंटिलेटर में करते गए बदलाव
    मेडिकल साइंस में मरीज को जिंदा रखकर इलाज करने के लिए वेंटिलेटर का सहारा देना आखिरी कोशिश मानी जाती है. वेंटिलेटर की मदद से मरीज को ऑक्सीजन दी जाती है. इसके अलावा ये मरीज के नर्वस सिस्टम तक दवाई पहुंचाने में भी मदद करता है. किसी मरीज की सांस चलते रहने के लिए एक मशीन का प्रयोग 18वीं शताब्दी में हुआ था, जिसमें किसी दूसरे व्यक्ति की मदद ली जाती थी. इसे पॉजिटिव-प्रेशर वेंटिलेटर का नाम दिया गया. इसके अलावा 1830 में एक स्कॉटिश डॉक्टर ने एक एयरटाइड बॉक्‍स बनाया, जिसे पंप कर मरीज की सांस वापस लाने की कोशिश की जाती थी. इसे निगेटिव-प्रेशर वेंटिलेटर कहा गया. इसके बाद वेनिस के एक डॉक्‍टर ने 19वीं सदी में एक नया बॉक्‍स बनाया, जिसका सफलतापूर्वक इस्तेमाल भी किया गया. बाद में साइंटिस्‍ट एलेक्जेंडर ग्राह्म बेल ने वैक्यूम जैकेट बनाया.

    पोलियो पीड़ितों के लिए 1920 में इस्‍तेमाल हुआ आयरन लंग
    आयरन लंग नाम के वेंटिलेशन डिवाइस का इस्तेमाल 20वीं सदी की शुरुआत में हुआ. ये मशीन भी निगेटिव प्रेशर वेंटिलेटर तकनीकी पर काम करती थी. साल 1920 में पोलियो (Polio) से पीड़ित बच्चों के लिए आयरन लंग का इस्तेमाल किया गया. पोलियो के कारण 1950 के अंत तक बच्चों की मौत की संख्‍या में तेजी से वृद्धि होने लगी थी. नेचर मैगजीन की रिपोर्ट के मुताबिक, साल 1952 में पोलियो से 3,000 से ज्‍यादा बच्चों की मौत हुई.

    डेनमार्क के कोपनहेगन में पोलिया की मरीज एक बच्‍ची को बचाने के लिए वेंटिलेटर का इस्‍तेमाल किया गया था.


    तब डेनमार्क के कोपेनहेगन में 500 बिस्तरों वाले ब्लेगडैम हॉस्पिटल में डॉक्टर और नर्स मरीजों की बढ़ती संख्‍या के कारण उनकी मदद नहीं कर पा रहे थे. पोलियो एक गंभीर वायरल इंफेक्शन था, जिसका उस समय कोई इलाज नहीं था. कई लोग तो बिना किसी लक्षण के ही इस वायरस से संक्रमित हो रहे थे. कुछ मामलों में ये वायरस रीढ़ में मौजूद नर्व्स और दिमाग पर हमला कर रहा था. ब्लेगडैम हॉस्पिटल में रोजाना पोलियो से संक्रमित 50 लोग आ रहे थे. उनमें छह से 12 लोगों को श्वसन तंत्र फेल होने का सामना करना पड़ रहा था.

    डॉ. इब्‍सेन ने रबर ट्यूब से फेफड़ों तक पहुंचाई थी ऑक्‍सीजन
    पोलियो महामारी के कारण मरीजों को सांस लेने में सबसे ज्‍यादा दिक्‍कत का सामना पड रहा था और डॉक्‍टर उनकी कोई मदद नहीं कर पा रहे थे. काफी मशक्‍कत के बाद इस समस्‍या का समाधन एनिस्‍थीसिया स्‍पेशलिस्‍ट डॉ. बर्जार्न आजे इब्‍सेन ने निकाला और हजारों लोगों की जान बचाई. उन्होंने अपने करियर का लंबा समय अमेरिका के बोस्टन में गुजारा था. डॉ. इब्‍सेन की बनाई मशीन पर पहली बार इलाज पाने वाली मरीज 12 साल की लड़की विवी थी.

    विवी पोलियो वायरस की वजह से हुए पैरालिसिस अटैक के कारण मरने की कगार पर थी. सभी को लग रहा था कि विवी भी दूसरे बच्‍चों की तरह मर जाएगी. उसी समय डॉ. इब्सेन ने नए तरीके से इलाज का प्रस्ताव दिया. उन्‍होंने कहा कि पोलियो के मरीजों का इलाज भी सर्जरी के लिए लाए गए मरीजों की ही तरह होना चाहिए. उन्‍होंने कहा कि मरीज के फेफड़ों में हवा सीधे पहुंचाई जाए तो उसके शरीर को आराम मिलेगा और वो धीरे-धीरे खुद सांस लेने लगेगा.

    डॉ. इब्‍सेन के तरीके से बची 12 साल की बच्‍ची की जिंदगी
    डॉ. इब्सेन ने ट्रैकियोस्टमी के इस्तेमाल का सुझाव दिया. इस प्रक्रिया के तहत मरीज की गर्दन में एक छेद कर रबर ट्यूब के जरिये फेफड़ों तक ऑक्‍सीजन पहुंचाई जाती है. उस दौर में ऑपरेशन के दौरान ट्रैकियोस्टमी का इस्तेमाल किया जाता था, लेकिन वार्ड में कभी इसका इस्तेमाल नहीं हुआ था. ब्लेगडैम हॉस्पिटल के तत्‍कालीन चीफ डॉ. हेनरी को उनकी बात पर भरोसा तो नहीं था, लेकिन उन्होंने इसकी मंजूरी दे दी. इसके बाद डॉ. इब्सेन के तरीके से विवी की जान पर सब आश्‍चर्य में पड गए. हालांकि, डॉ. इब्‍सेन के तरीके में एक मुश्किल थी कि फेफड़े में रबर ट्यूब के जरिये हवा पहुंचाने किसी डॉक्टर या नर्स को प्रेशर नॉब या बैग की मदद से हवा का दबाव बनाना पड़ रहा था. डॉ. हेनरी को इसके लिए कई मेडिकल स्टाफ की अलग-अलग शिफ्ट में ड्यूटी लगानी पड़ी.

    जिन मरीजों के अंदरूनी अंग काम करना बंद कर देते हैं और उन्हें जीवन रक्षक प्रणाली की जरूरत होती है, उन्‍हें आईसीयू में रखा जाता है.


    ब्‍लेगडैम अस्‍पताल में 1953 में बनाया गया पहला आईसीयू
    डॉ. इब्‍सेन के तरीके से इलाज करने के बाद पोलियो के मरीजों की मृत्यु दर 87 फीसदी से घटकर 31 फीसदी पर आ गई. इसके अगले साल यानी 1953 में ब्लेगडैम हॉस्पिटल में एक इंटेसिव केयर यूनिट वॉर्ड (ICU Ward) की स्थापना की गई. बता दें कि जिन मरीजों के अंदरूनी अंग काम करना बंद कर देते हैं और उन्हें जीवन रक्षक प्रणाली (Life Support System) की जरूरत होती है, उन्‍हें आईसीयू में रखा जाता है. आईसीयू में मरीज के हालात पर करीबी नजर रखी जा सकती है. साथ ही इलाज को बदलते हुए हालात के मुताबिक बदला जा सकता है. आईसीयू में हर मरीज पर डॉक्टरों और नर्सों का अनुपात सबसे ज्‍यादा रखा जाता है.

    वर्ल्‍ड वार-2 के समय बना बर्ड मास्‍क-7 है आज का वेंटिलेटर
    अब बात करते हैं वेंटिलेटर की. जर्मनी के एक व्‍यापारी और शोधकर्ता जोहान हेनरिच ड्रेगर व उनके बेटे बर्नहार्ड ने 1907 में पुलमोटर का आविष्कार किया. ये मशीन पॉजिटिव-प्रेशर वेंटिलेटर तकनीकी पर काम करती थी. ये ट्रांसपोर्टेबल डिवाइस था, जो एक मास्क के जरिये मरीज को ऑक्सीजन पहुंचाने का काम करता था. इसके बाद वर्ल्‍ड वार-2 के दौरान एयरफोर्स के पायलट्स के लिए वेंटिलेटर बनाया गया, जो ज्यादा ऊंचाई पर आक्सीजन सप्लाई करते थे.

    अमेरिकी सेना के पूर्व पायलट फॉरेस्ट बर्ड ने 1950 में बर्ड मास्क-7 नाम से वेंटिलेटर बनाया. कुछ लोगों का मानना है कि बर्ड मास्क-7 ही आज का मेडिकल रेस्पिरेटर है. कुछ समय बाद एक ऐसी वेंटिलेशन तकनीकी की शुरुआत हुई, जिसमें मास्क के बजाय एक ट्यूब के जरिए मरीज के फेफड़ों में हवा पहुंचाई जाती थी. वेंटिलेटर के डिजाइन में लगातार बदलाव से मौजूदा वेंटिलेटर बना.

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