जम्मू कश्मीर में पहली बार कैसे हुए थे चुनाव, कौन जीता था कौन हारा?

जनसभा को संबोधित करते शेख अब्दुल्ला.

जनसभा को संबोधित करते शेख अब्दुल्ला.

जम्मू कश्मीर चुनावों के नतीजों (Jammu & Kashmir DDC Election Results) के बीच जानिए कि पहली बार इस राज्य में चुनाव किन राजनीतिक स्थितियों के बीच हुए थे. देखिए कि आठ दशक पहले के उन चुनावों से जुड़े रोचक किस्से आज भी दोहराए जाने लायक लगते हैं.

  • News18Hindi
  • Last Updated: December 23, 2020, 5:01 PM IST
  • Share this:
जम्मू और कश्मीर रियासत (J&K Princely State) में ब्रिटिश राज के दौरान पहली बार विधानसभा चुनाव (First Legislative Election) 1934 में हुए थे, जिसे 'प्रजा सभा' के नाम से जाना गया था. प्रजा सभा (Praja Sabha) में 75 सदस्य थे जिनमें से 33 चुने हुए सदस्य थे, 30 नॉमिनेटेड थे और 12 अधिकारी वर्ग के सदस्य थे. यह जम्मू कश्मीर के आधुनिक इतिहास में पहली बार राज्य के स्तर पर हुए चुनाव थे. चुनी हुई प्रजा सभा को राज्य के राजा हरि सिंह (Maharaja Hari Singh) की सरकार ने स्थापित किया था, जिसमें कई पार्टियां उभरकर सामने आई थीं.

जम्मू कश्मीर में हालिया डीडीसी चुनावों में गुपकार गठबंधन को सबसे ज़्यादा सीटें मिली हैं जबकि भाजपा राज्य में सबसे बड़ी अकेली पार्टी बनकर उभरी है. इतिहास के पन्नों में झांकें तो पहली बार जो प्रजा सभा बनी थी, तब एक उदारवादी समूह के पास बहुमत था और मुस्लिम कॉन्फ्रेंस (Muslim Conference) सबसे बड़ी पार्टी बनकर सामने आई थी. आइए इस दिलचस्प इतिहास को टटोलें.

ये भी पढ़ें :- आखिरी बार 1964 में कोई पीएम पहुंचे थे एएमयू, तब क्या संदेश गूंजा था?

1948 में पीएम की हैसियत से अलीगढ़ यूनिवर्सिटी पहुंचे नेहरू ने क्या बोला था?
कैसे बनी थी प्रजा सभा?

उस समय देश भर में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ही बड़ी राजनीतिक पार्टी थी इसलिए हर राज्य में उसी का प्रभाव था. जम्मू कश्मीर भी इससे अछूता नहीं था. कुछ अन्य राज्यों में चूंकि चुनाव के ज़रिये सरकारें चुनी जा चुकी थीं इसलिए भारत के उत्तरी राज्य में भी इस तरह का फैसला हुआ. महाराजा हरि सिंह ने 1932 में सर बुरजोर दलाल की अगुवाई में एक कमेटी बनाई थी, जिसे राज्य में चुनावों के लिए रास्ता बनाने का ज़िम्मा सौंपा गया था.

Youtube Video




ये भी पढ़ें :- देश में कब-कब हुए अमोनिया रिसाव के बड़े हादसे और कितने गंभीर?

jammu and kashmir polls, jammu and kashmir election results, elections in jammu and kashmir, who won kashmir election, जम्मू कश्मीर चुनाव, कश्मीर चुनाव नतीजे, कश्मीर चुनाव कौन जीता, जम्मू कश्मीर में चुनाव
महाराजा ​हरि सिंह ने चुनाव की सिफारिशों के लिए एक कमेटी बनाई थी.


इस कमेटी ने 75 सदस्यों की सभा बनाने की सिफारिश की थी और पहले बताए गए हिसाब से सदस्यों की संख्या तय की थी. यही नहीं, 33 चुने हुए सदस्यों को बाद में संप्रदायों के आधार पर बांटा गया था, जिसके तहत 21 सीटें मुस्लिमों, 10 सीटें हिंदुओं और 2 सिखों को आवंटित कर दी गई थीं.

ये भी पढ़ें :-

ब्रिटेन में वायरस बेकाबू है, क्या इस बीच 26 जनवरी को मुनासिब होगा "नमस्ते लंदन"?

इसके साथ ही, सीटों का बंटवारा क्षेत्रों के हिसाब से भी हुआ था. कश्मीर क्षेत्र में 16 सीटों में से 11 मुस्लिमों और 3 हिंदुओं के हिस्से में थीं तो जम्मू क्षेत्र में 17 सीटों में से 9 मुस्लिमों और 7 हिंदुओं के खाते में. यहां एक एक सीट सिखों के लिए थी. वहीं, लद्दाख और गिलगिट से सिर्फ नॉमिनेटेड सदस्य प्रजा सभा में थे. इसी तरह, चेनानी से भी एक नॉमिनेटेड सदस्य था.

कैसे और क्यों हुए थे चुनाव?

इन चुनावों से पहले राजनीतिक स्थितियां काफी उलझी हुई थीं. महाराजा हरि सिंह और शेख अब्दुल्ला एक तरह से प्रतिद्वंद्वी के तौर पर नज़र आ रहे थे. बीच में ब्रिटिश सरकार की भूमिका भी अटपटी थी. एक तरफ महाराजा और ब्रिटिश हुकूमत लोकतंत्र बहाली पर राज़ी थे, तो दूसरी तरफ राजनीतिक पार्टियों के दमन को लेकर भी एक हवा लगातार बनी हुई थी.

ये भी पढ़ें :-

क्या है ब्रिटेन में फैला कोरोना का नया घातक रूप, क्या वैक्सीन बेअसर होगी?

सिर्फ शेख अब्दुल्ला ही नहीं, बल्कि तमाम पक्षों के स्टैंड स्पष्ट नहीं थे. अब्दुल्ला की पार्टी मुस्लिम कॉन्फ्रेंस ने काफी गतिरोधों के बाद चुनाव लड़ने का फैसला किया तो राजनीतिक बंदी बनाए गए अब्दुल्ला की रिहाई को लेकर नई बहस छिड़ी. महाराजा ने वादा भी किया और फिर अब्दुल्ला की रिहाई से मुकरे भी. अब्दुल्ला ने सरकार के खिलाफ आग उगलना शुरू किया.

jammu and kashmir polls, jammu and kashmir election results, elections in jammu and kashmir, who won kashmir election, जम्मू कश्मीर चुनाव, कश्मीर चुनाव नतीजे, कश्मीर चुनाव कौन जीता, जम्मू कश्मीर में चुनाव
कश्मीर के पहले चुनाव का ज़िक्र इतिहास की किताबों में मिलता है.


हालांकि प्रजा सभा अब्दुल्ला की मुस्लिम कॉन्फ्रेंस की अपेक्षा के मुताबिक नहीं थी, फिर भी आखिरकार चुनाव लड़ने की कवायद हुई और अब्दुल्ला ने जमकर चुनाव प्रचार किया और अपने पक्ष में लहर बनाने में कामयाब रहे. श्रीनगर में अब्दुल्ला की पार्टी और यूसुफ शाह की आज़ाद मुस्लिम कॉन्फ्रेंस के बीच चुनावी टक्कर अहम मानी गई थी.

कौन जीता कौन हारा?

पंडित राम चंदर दुबे की अगुवाई में एक उदारवादी समूह डोगरा सदर सभा बना था, जिसे 1934 के चुनाव में प्रजा सभा में ओवरऑल बहुमत मिला था और प्रजा सभा में 24 सदस्य, हालांकि जीत सिर्फ 13 सीटों पर मिली थी. अब्दुल्ला की पार्टी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी, जिसने 16 सीटें जीती थीं. अब्दुल्ला की पार्टी को श्रीनगर में सभी 5 सीटों पर जीत मिली थी और यूसुफ शाह को हार.

ये भी पढ़ें :- क्या चांद पर सब्जी उगा सकेगा चीन? चांद से मिले नमूने क्या बताते हैं?

उस वक्त दलबदल भी हुआ था. जी हां, मुस्लिम कॉन्फ्रेंस के 2 सदस्यों ने चुनाव के ढाई हफ्ते बाद डोगरा सदर सभा के साथ गठजोड़ कर लिया था. डोगरा सदर सभा के पास पहले 13 सीटें थीं, लेकिन बाद में नॉमिनेटेड सदस्यों के शामिल हो जाने से इसकी सदस्य संख्या बढ़ गई थी. इसके अलावा, प्रजा सभा में पंडितों की कश्मीर पंडित युवक सभा नाम की पार्टी को 3 और सिख पार्टी को 3 सीटों पर जीत मिली थी.

प्रजा सभा में मुस्लिम कॉन्फ्रेंस का नेतृत्व मियां अहमद यार और मिर्ज़ा मोहम्मद अफज़ल बेग ने किया था जबकि डोगरा सदर सभा के प्रमुख रामचंदर दुबे थे. गौरतलब है कि यह मुस्लिम कॉन्फ्रेंस ही 1939 में नेशनल कॉन्फ्रेंस पार्टी के तौर पर स्थापित हुई थी और शेख अब्दुल्ला के बाद इस पार्टी के प्रमुख लंबे समय तक फारुक अब्दुल्ला रहे.

jammu and kashmir polls, jammu and kashmir election results, elections in jammu and kashmir, who won kashmir election, जम्मू कश्मीर चुनाव, कश्मीर चुनाव नतीजे, कश्मीर चुनाव कौन जीता, जम्मू कश्मीर में चुनाव
सरदार पटेल के साथ शेख अब्दुल्ला.


कश्मीर में चुनाव का संक्षिप्त इतिहास

1934 में इस प्रजा सभा के बाद 1938 और फिर 1947 में भी जम्मू व कश्मीर में चुनाव हुए थे. 1939 से शेख अब्दुल्ला की पार्टी सिर्फ मुस्लिमों के लिए नहीं रह गई थी. 1946 में इसी पार्टी ने कश्मीर छोड़ो आंदोलन छेड़ा था और 1947 के चुनावों का बहिष्कार भी किया था. बहरहाल, आज़ादी के बाद कश्मीर जब भारत के साथ मिला, तो 1951 में विधानसभा चुनाव हुए जिसमें अब्दुल्ला की पार्टी ने 75 सीटें जीती.

1957 में इस विधानसभा ने अपना नया संविधान बनाकर विधानसभा के दो सदन बनाने की व्यवस्था की. 1951 के बाद से केंद्रशासित प्रदेश बनने से पहले तक राज्य में 11 बार विधानसभा चुनाव हुए थे और 1967 के बाद से 12 बार ऐसा हुआ कि संसदीय चुनाव यहां रोकने की नौबत आई. 1947 से 2018 तक पांच बार ऐसा हुआ कि म्यूनिसिपल चुनाव रोके गए.
अगली ख़बर

फोटो

टॉप स्टोरीज