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नाम को लेकर चर्चा में आई इलाहाबाद यूनिवर्सिटी कैसे बनी थी? क्यों कही गई 'पूरब का ऑक्सफोर्ड'?

इलाहाबाद विश्वविद्यालय का ब्रिटिश कालीन भवन. फाइल फोटो

इलाहाबाद विश्वविद्यालय का ब्रिटिश कालीन भवन. फाइल फोटो

सवा सौ साल से भी ज़्यादा पुरानी इलाहाबाद यूनिवर्सिटी (Allahabad University) के बनने और इसकी प्रतिष्ठा 'Oxford of the East' जैसे जुमले में बांधे जाने के क्या कारण और किस्से थे, ये रोचक बातें हम आपको बताएंगे. पहले ये जानें कि नाम बदलने (Name Change) को लेकर जो विवाद चला, उसे यूनिवर्सिटी ने किन आधारों पर खारिज कर दिया.

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भारत में ब्रिटिश औपनिवेशिक काल (British Era) के दौरान बनी इलाहाबाद यूनिवर्सिटी इन दिनों अपने नाम बदलने के एपिसोड (Name Changing Issue) के कारण चर्चा में है. साल 2018 में इलाहाबाद (Allahahbad) नगर का नाम बदलकर प्रयागराज (Prayagraj) किए जाने के बाद से ही इस पुराने और प्रतिष्ठित वि​श्वविद्यालय का नाम बदले जाने की मांग उठ रही थी, लेकिन ताज़ा खबरों के मुताबिक यूनिवर्सिटी ने यह प्रस्ताव खारिज कर दिया है.

इसलिए नहीं बदला गया नाम
इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के पीआरओ शैलेंद्र मिश्रा के हवाले से खबरों में कहा गया कि ईसी के 15 में से 12 सदस्यों ने नाम बदलने के प्रस्ताव को खारिज कर दिया जबकि बाकी तीन से प्रतिक्रिया नहीं मिली. सोशल मीडिया के ज़रिए यूनि​वर्सिटी के कई एल्युमिनाई ने नाम न बदलने के लिए अभियान भी चलाया था. बहरहाल, नाम न बदलने के कारण इस तरह बताए गए.

1. कुछ सदस्यों ने माना कि शहर का नाम बदलने के बावजूद जब मद्रास और कलकत्ता यूनिवर्सिटी के नाम नहीं बदले तो इलाहाबाद यूनिवर्सिटी का नाम भी क्यों बदला जाए.
2. कुछ सदस्यों ने यह भी इंगित किया कि इलाहाबाद हाई कोर्ट का नाम नहीं बदला गया.
3. नाम बदलने के लिए बेइंतहा दस्वतावेज़ी प्रक्रिया करना होगी जैसे कि मार्कशीटों और डिग्रियों आदि से जुड़े तमाम दस्तावेज़ बदलने होंगे, जो कि एक बेहद मुश्किल व लंबी प्रक्रिया होगी.

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ब्रिटेन के प्रतिष्ठित आर्किटेक्ट्स ने इलाहाबाद यूनिवर्सिटी भवन की डिज़ाइन तैयार की थी. फाइल फोटो.


कैसी रही है इस यूनिवर्सिटी की प्रतिष्ठा?
औपचारिक तौर पर 1887 में स्थापित इलाहाबाद यूनिवर्सिटी उस समय देश की पांचवी यूनिवर्सिटी थी. एक तरह से पूरे मध्य भारत में यह इकलौती यूनिवर्सिटी थी क्योंकि बाकी चार कलकत्ता, मद्रास, बम्बई और पंजाब यूनिवर्सिटियां चार दिशाओं में थीं इसलिए राजपूताना से लेकर बंगाल के बॉर्डर तक सिर्फ यही एक उच्च शिक्षा का स्थान था. इसके अलावा, यहां अध्ययन व अध्यापन का स्तर भी एक कारण था कि इसे 'पूरब का ऑक्सफोर्ड' कहा गया.

क्यों कहा गया 'पूरब का ऑक्सफोर्ड'?
स्थापना के कई सालों बाद तक इलाहाबाद यूनिवर्सिटी को इस तरह से भी प्रतिष्ठा प्राप्त रही थी. इसके पीछे शैक्षणिक गुणवत्ता जैसे कारणों के साथ ही कुछ और कारण भी थे. 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के एक साल बाद अंग्रेज़ों का पूरी तरह आधिपत्य हो चुका था और यूनाइटेड प्रॉविन्स की राजधानी आगरा से इलाहाबाद शिफ्ट की गई थी. साथ ही, हाई कोर्ट भी इसी शहर में रहा. कुल मिलाकर राजधानी होने की वजह से यह शहर और इसके सरकारी संस्थानों पर ज़ाहिर तौर पर अंग्रेज़ी अफसरों का ही प्रभुत्व रहा.

दूसरी तरफ, हिंदी साहित्य, इतिहास, दर्शनशास्त्र जैसे विषयों में बेहतरीन गुणवत्ता का शिक्षण इस यूनिवर्सिटी का नाम बनाता चला गया. ऐसे भी उल्लेख मिलते हैं कि रानी विक्टोरिया समेत कई प्रतिष्ठित अंग्रेज़ इस यूनिवर्सिटी को देखने तक आए थे. बहरहाल, इन तमाम कारणों से इसकी प्रतिष्ठा काफी समय तक रही.

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यूनाइटेड प्रॉविंस के गवर्नर रहे विलियम मुइर को ही इलाहाबाद यूनिवर्सिटी की स्थापना का श्रेय जाता है.


कैसे बनी थी इलाहाबाद यूनिवर्सिटी?
यूनाइटेड प्रॉविंस के लेफ्टिनेंट गवर्नर हुआ करते थे सर विलियम मुइर. उन्हीं के नाम पर 1873 में मुइर कॉलेज का शिलान्यास तत्कालीन भारत के गवर्नर जनरल नॉर्थब्रुक ने किया था. मुइर कॉलेज ही बाद में इलाहाबाद यूनिवर्सिटी बना जब 23 सितंबर 1887 को इस संबंध में एक एक्ट पास हुआ. बहरहाल, यह जानना दिलचस्प है कि शिलान्यास के समय मुइर ने क्या कहा था :

इलाहाबाद में सेंट्रल कॉलेज हमेशा से मेरा सपना रहा था क्योंकि यहां के कई प्रतिष्ठित लोग भी चाहते थे कि उच्च शिक्षा के लिए कोई अच्छा संस्थान हो. यह सिर्फ इच्छा ही नहीं थी बल्कि बाकायदा इसके लिए कोशिशें हुईं और मुझे 1869 में एक बड़ी रकम इकट्ठा करके दी गई थी ताकि कॉलेज बन सके.


क्या था यह चंदे का किस्सा?
साल 1868 के जनता दरबार में सेंट्रल कॉलेज और फिर इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के सपने के बारे में चर्चा के बाद मुइर ने शहर के कई लोगों को इस दिशा में प्रेरित किया. ठोस कदम के तौर पर इसके लिए एक प्राथमिक समिति बनाई गई, जिसके सचिव बाबू प्यारे मोहन बनर्जी थे. बैठक में मौजूद सभी लोगों ने उस वक्त 16 हज़ार रुपये कॉलेज के लिए इकट्ठे करने का बीड़ा उठाया था.

हेरंब चतुर्वेदी की किताब इलाहाबाद स्कूल ऑफ हिस्ट्री में यूनिवर्सिटी बनने के बारे में कुछ उल्लेख हैं. इनके मुताबिक शहर के जिन प्रतिष्ठित लोगों ने कॉलेज के सपने को साकार करने के लिए जी जान से मेहनत की थी उनमें दारागंज के बैंकर लाला गयाप्रसाद और बाबू बनर्जी के अलावा मौलवी फरीदुद्दीन, मौलवी हैदर हुसैन, हाई कोर्ट के याचिकाकर्ता और गुमास्ता कमिश्नरी के राय रामेश्वरी चौधरी शामिल थे.

सरकार ने ठुकरा दी थी कॉलेज की मांग?
मुइर से प्रेरित इस पूरी मुहिम भारत सरकार यानी तत्कालीन ब्रिटिश सरकार के सचिव को प्रस्ताव भेजा गया था और बताया गया था किन कारणों से इलाहाबाद में एक बेहतर गुणवत्ता के सेंट्रल कॉलेज की ज़रूरत थी. सरकार ने यह तो माना कि इलाहाबाद प्रॉविंस की राजधानी होने, हिंदुओं का प्रमुख तीर्थ होने और मिलिट्री का गढ़ होने के कारण प्रमुख शहर था, लेकिन कॉलेज की बात अटक गई!

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1857 के संग्राम के समय भारत का नक्शा विकिमीडिया के अनुसार कुछ इस तरह था.


प्रॉविंस की राजधानी होने के कारण यहां सेंट्रल कॉलेज सैद्धांतिक रूप से होना भी चाहिए था फिर भी, बनारस, आगरा या अवध की तरह इलाहाबाद संपन्न नगर नहीं था और सरकार को इसमें सहयोग करना ही था. फिर 1857 के घटनाक्रम के बाद सरकार पसोपेश में रहकर तय नहीं कर पा रही थी कि इस मामले में क्या​ किया जाए इसलिए 1871 में इलाहाबाद यूनिवर्सिटी संबंधी मांग को कुछ समय तक के लिए ठंडे बस्ते में डाल दिया गया.

मुइर को ही जाता है श्रेय
इलाहाबाद यूनिवर्सिटी नहीं, लेकिन सेंट्रल कॉलेज के लिए मुइर ने खुद अपनी एक स्कीम बनाकर कॉलेज के निर्माण का रास्ता खोला क्योंकि वो भी सरकारी रवैये से परेशान हो चुके थे. यही नहीं, मुइर ने इस कॉलेज के लिए निजी तौर पर 2 हज़ार रुपये का दान भी दिया था. और तभी उन्होंने यह सपना देख लिया था कि यही कॉलेज आगे जाकर इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के तौर पर स्थापित हो जाएगा.

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