जश्ने आज़ादी: आखिर क्यों 15 अगस्त 1947 की आधी रात को ही हमें मिली स्वतंत्रता

क्या भारत (India) उस तारीख़ पर स्वतंत्रता दिवस (Independence Day) मनाता है, जो किसी अंग्रेज़ के लिए शुभ थी? क्या आज़ादी का वक़्त मुक़र्रर करने के पीछे कुछ अंधविश्वास या मान्यताएं रही हैं? पढ़ें इतिहास (History) के पन्नों से एक अनूठी कहानी.

Bhavesh Saxena | News18Hindi
Updated: August 14, 2019, 9:48 PM IST
Bhavesh Saxena | News18Hindi
Updated: August 14, 2019, 9:48 PM IST
भारत को आज़ादी 1946 या 48 में क्यों नहीं मिली? 15 अगस्त की जगह किसी और तारीख़ पर क्यों नहीं मिली? और क्यों पहले प्रधानमंत्री (Prime Minister) जवाहरलाल नेहरू (jawaharlal Nehru) ने आधी रात को आज़ादी और 'नई सुबह' की घोषणा की? हर साल आज़ादी का जश्न मनाते हुए या आज़ादी की कहानियां किताबों में पढ़ते हुए क्या कभी आपके मन में ये सवाल आया कि भारत को आज़ाद करने का दिन, साल और वक़्त ब्रितानी हुकूमत (British Raj) ने कैसे और किन कारणों से तय किया था. भारत के स्वतंत्रता दिवस की 73वीं सालगिरह के मौके पर इस सवाल के जवाब के बहाने जानिए कि आज़ादी के संघर्ष में जुटे हमारे नेता और ब्रिटिश सरकार के बीच किस-किस तरह की चर्चाएं चल रही थीं और एक तारीख के पीछे कितनी और तारीखें गवाह हैं.

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ऐसा नहीं था कि यह तारीख नियति थी या एक बार में ही तय हो गई थी. अगर नेहरू की मंशा के अनुरूप तारीख तय हुई होती, तो शायद हम आज 26 जनवरी को स्वतंत्रता दिवस के रूप में मना रहे होते. अगर भारत में आखिरी ब्रितानी वायसराय माउंटबेटन (Lord Mountbatten) की पूरी मर्ज़ी चल गई होती तो शायद भारत अपना स्वतंत्रता दिवस 30 जून को मना रहा होता. फिर आखिर क्या हुआ कि ये तमाम तारीखें बदलकर एक नई तारीख चुनी गई और क्यों? आइए, शुरू से कहानी शुरू करते हैं.

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पंडित नेहरू और जिन्ना भारत में आखिरी ब्रिटिश वायसराय माउंटबेटन और अन्य नेताओं के साथ.


26 जनवरी क्यों हो सकता था स्वतंत्रता दिवस?
कांग्रेस के अध्यक्ष के तौर पर जवाहरलाल नेहरू ने 1929 में पहली बार ब्रितानी सरकार से पूर्ण स्वराज की अपील की और स्वतंत्रता दिवस 26 जनवरी को मनाने की घोषणा की. यही नहीं, 1930 के बाद से इसी तारीख को हर साल स्वतंत्रता दिवस मनाया भी गया. लेकिन, ये तारीख भारत के वास्तविक स्वतंत्रता दिवस में तब्दील नहीं हो सकी इसलिए इसे बाद में गणतंत्र दिवस के रूप में सुरक्षित किया गया, जब 1950 में इसी तारीख पर भारत का संविधान लागू हुआ.
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30 जून कैसे होती स्वतंत्रता दिवस की तारीख?
भारत को आज़ादी देने की पूरी कार्रवाई के लिए आखिरी वायसराय के तौर पर ब्रितानिया हुकूमत ने माउंटबेटन को नियुक्त किया था. माउंटबेटन ने एक मसौदा तैयार किया था, जिसे जून 3 माउंटबेटन प्लान के नाम से जाना जाता है और इसमें प्रस्ताव था कि ब्रितानी हुकूमत 30 जून 1948 को सारी शक्तियां भारत को हस्तांतरित करे. लेकिन, उस वक्त के भारतीय नेताओं के साथ इस प्रस्ताव पर सहमति नहीं बन सकी और ये तारीख बदली गई.

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भारत में आखिरी ब्रिटिश वायसराय माउंटबेटन, पंडित नेहरू और जिन्ना के साथ.


क्यों नहीं चला माउंटबेटन का जून प्लान?
जब माउंटबेटन ने 30 जून 1948 को भारत को आज़ादी दिए जाने की बात कही तो तत्कालीन नेताओं ने इसे बेवजह की देर माना. चक्रवर्ती राजगोपालाचारी ने कहा था, 'तब तक शक्ति बचेगी ही नहीं, तो आप हस्तांतरित क्या करेंगे?' 1946-47 में देश की जो परिस्थितियां बन चुकी थीं, उनके लिहाज़ से राजगोपालाचारी का यह वाक्य इतिहास में अमर हो गया और माउंटबेटन को अपना फैसला बदलना पड़ा. दूसरा प्रस्ताव तैयार किया गया जो ब्रिटेन के हाउस ऑफ कॉमंस में 4 जुलाई 1947 को चर्चाधीन रहा और एक पखवाड़े के भीतर पास हुआ. इस प्रस्ताव में भारत को आज़ादी देने की तारीख 15 अगस्त 1947 मुकर्रर की गई थी.

'आज़ादी की कीमत खून से चुकानी होती है'
1946-47 में पूरे देश में खबर फैल चुकी थी कि देश को आज़ादी बंटवारे की कीमत पर मिलेगी. इसके चलते देश भर में तनाव और दंगों का माहौल बन चुका था. वॉवेल वायसराय हुआ करते थे, जो हालात पर काबू पाने में नाकाम रहे. वॉवेल की जगह माउंटबेटन को हालात काबू करने और भारत के साथ आज़ादी को लेकर पूरी बातचीत करने के लिए भेजा गया. माउंटबेटन ने 15 अगस्त मुकर्रर करते हुए दिलासा दी थी कि ऐसा करने से दंगे या खूनखराबा नहीं होगा. लेकिन हुआ और बहुत भीषण हुआ.

बाद में, अपने बयान से मुकरते हुए माउंटबेटन ने कहा था, 'जब जब औपनिवेशिक शासन खत्म होता है, खूनखराबा होता ही है. ये वही कीमत है, जो आपको चुकानी पड़ती है.'

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भारत विभाजन के समय भीषण दंगे हुए थे.


पहला सवाल - 1947 क्यों?
1945 में दूसरे विश्वयुद्ध के खत्म होने के समय ब्रिटेन की आर्थिक हालत खराब हो चुकी थी और देश में राजनीतिक संकट भी था. ऐसे में, 1945 में हुए चुनावों में ब्रिटेन की लेबर पार्टी को जीत मिली. लेबर पार्टी ने अपने चुनावी वादों में कहा था कि उसकी सरकार बनी, तो ब्रितानी उपनिवेशवाद को खत्म किया जाएगा यानी भारत सहित कई ब्रितानी गुलाम देशों को आज़ादी दी जाएगी. लेबर पार्टी की सरकार बनते ही भारत की आज़ादी की मुहिम शुरू हुई.

भारत को शक्ति सौंपने के लिए फरवरी 1947 में माउंटबेटन को नियुक्त किया गया. जून 1948 में आज़ादी देने के माउंटबेटन के प्रस्ताव का विरोध हुआ. एक, नेहरू और मोहम्मद अली जिन्ना के बीच भारी मतभेद थे. जिन्ना ने अलग देश की मांग करते हुए हर रोज़ दबाव बढ़ाया था और दंगे रोज़ उग्र होते जा रहे थे. ये हालात और भारतीय नेताओं का विरोध देखते हुए माउंटबेटन ने आज़ादी का समय करीब एक साल एडवांस किया.

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15 अगस्त 1947 को पंडित जवाहरलाल नेहरू ने आधी रात को भारत की आज़ादी के ऐलान के साथ देश को संबोधित किया.


दूसरा सवाल - तारीख 15 अगस्त क्यों?
जून 1947 में तय हुआ था कि जल्द ही यानी अगस्त तक भारत को शक्तियां हस्तांतरित करने की प्रक्रिया संपन्न कर दी जाएगी. अब सवाल था कि तारीख़ कौन सी होगी? तो ये माउंटबेटन ने तय किया था कि 15 अगस्त वो तारीख़ होगी. इसके पीछे एक किस्सा था, जिसे आप माउंटबेटन का अंधविश्वास, मान्यता या लक फैक्टर कह सकते हैं. किस्सा माउंटबेटन के शब्दों में पढ़ें :

'मैंने इस तारीख का चयन एक सवाल के जवाब में इसलिए किया था क्योंकि मैं चाहता था कि सबको अहसास रहे कि इस पूरे घटनाक्रम का सूत्रधार मैं ही था. जब सबने पूछा कि तारीख कौन सी होगी, तो ये तो तय था कि अब कोई नज़दीक की तारीख यानी अगस्त/सितंबर में ही किसी दिन को तय करना था. तब मैंने 15 अगस्त का दिन चुना क्योंकि यह वही तारीख थी, जब 1945 में दूसरे विश्वयुद्ध के खात्मे के समय जापान ने आत्मसमर्पण किया था.'

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स्टेट्समैन समाचार पत्र का 15 अगस्त 1947 के संस्करण का आर्काइव चित्र


शुभ और अशुभ का संकट
गौरतलब है कि माउंटबेटन इस तारीख को अपने लिए लकी समझते थे क्योंकि जापान ने 15 अगस्त 1945 को जब सरेंडर करने की घोषणा की थी, तब अलाइड फोर्सेस यानी संयुक्त बलों के कमांडर माउंटबेटन ही थे और उनके सामने ही जापानी सेना ने हथियार डाले थे. एक तरफ माउंटबेटन के लिए यह तारीख शुभ थी, तो दूसरी तरफ कहा जाता है कि भारत के ज्योतिष विशेषज्ञों ने इस तारीख को भारत के लिए अशुभ बताया था और कुछ और तारीखें सुझाई थीं, लेकिन माउंटबेटन उन सभी बातों को खारिज कर अपनी ज़िद पर अड़े रहे.

तीसरा सवाल - वक्त़ आधी रात क्यों?
14 अगस्त 1947 को पाकिस्तान अलग आज़ाद देश बना. 14 व 15 अगस्त 1947 की दरम्यानी रात 12 बजे नेहरू ने ऐतिहासिक भाषण देते हुए अंग्रेज़ी राज से भारत की आज़ादी का औपचारिक ऐलान किया. जैसा कि ज्योतिष विशेषज्ञ मान रहे थे कि 15 अगस्त की तारीख भारत की कुंडली के हिसाब से शुभ नहीं होगी, इसलिए ज्योतिषीय गणना के हिसाब से एक शुभ समय निकाला गया, जब भारत एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में घोषित हो.

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टाइम्स आफ इंडिया समाचार पत्र का 15 अगस्त 1947 के संस्करण का आर्काइव चित्र


ज्योतिषियों ने अभिजीत मुहूर्त के हवाले से नेहरू को सलाह दी थी कि 14 अगस्त की रात 11.51 से 12 .39 बजे के बीच का समय भारत की स्वतंत्रता की घोषणा के भाषण के लिए मुफीद था और ठीक मध्यरात्रि यानी 12 बजे पवित्र शंखनाद किया जा सकता था. ज्योतिषियों का मानना था कि भले ही अंग्रेज़ी कैलेंडर के हिसाब से इस समय तारीख 15 अगस्त होगी, लेकिन भारतीय पद्धति के अनुसार तारीख सूर्योदय से बदलती है इसलिए यह समय उचित रहेगा.

और पाकिस्तान का स्वतंत्रता दिवस 14 अगस्त क्यों?
शायद कम ही लोग जानते होंगे कि 1947 में पाकिस्तान ने भी अपना स्वतंत्रता दिवस 15 अगस्त को ही मनाया था, 14 अगस्त को नहीं. इसकी वजह यह थी कि ब्रितानी हुकूमत के दस्तावेज़ के हिसाब से भारत और पाकिस्तान दोनों के लिए 15 अगस्त की स्वतंत्रता की तारीख तय की गई थी. जिन्ना ने 15 अगस्त 1947 को ही पाकिस्तान के आज़ाद देश होने का पहला भाषण दिया था. लेकिन, 1948 में इस तारीख को बदलकर 14 अगस्त कर दिया गया. क्यों?

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डॉन समाचार पत्र का 15 अगस्त 1947 के संस्करण का आर्काइव चित्र


इसकी दो वजहें थीं. एक पाकिस्तान ने पुनर्विचार किया कि आज़ादी के दस्तावेज़ पर एक साल पहले 14 अगस्त को दस्तख़त किए गए थे इसलिए तकनीकी तौर पर वही आज़ादी की तारीख थी. दूसरी वजह थी कि 14 अगस्त 1947 को रमज़ान का 27वां दिन था, जिसे इस्लाम में बेहद पवित्र दिन माना जाता है, इसलिए इसी दिन स्वतंत्रता दिवस मनाने का निर्णय लिया गया. एक वजह जो प्रमाणित नहीं है, वो यह भी रही कि पाकिस्तान अपना स्वतंत्रता दिवस भारत के स्वतंत्रता दिवस के ही दिन नहीं मनाना चाहता था.

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First published: August 14, 2019, 8:57 PM IST
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