राजस्थान सियासी संकट : सिंघवी ने क्यों दिए सुप्रीम कोर्ट के जजमेंट के हवाले?

राजस्थान सियासी संकट : सिंघवी ने क्यों दिए सुप्रीम कोर्ट के जजमेंट के हवाले?
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राजस्थान विधानसभा स्पीकर ने व्हिप उल्लंघन मामले में सचिन पायलट समेत उनके खेमे के 19 विधायकों को नोटिस थमाए थे,​ जिन पर हाईकोर्ट में जस्टिस इंद्रजीत माहन्ती और जस्टिस प्रकाश गुप्ता की बेंच सुनवाई कर रही है. पायलट गुट की ओर से बहस हो चुकी थी जबकि स्पीकर की तरफ से शुक्रवार को अधूरी रह गई बहस सोमवार को जारी रही.

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राजस्थान के सियासी संकट (Rajasthan Political Crisis) के नौवें दिन यानी सोमवार को सचिन पायलट (Sachin Pilot) के गुट के विधायकों के खिलाफ व्हिप नोटिस की सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट (High Court) में स्पीकर की ओर से वरिष्ठ वकील अभिषेक मनु सिंघवी (Abhishek Manu Singhvi) ने मणिपुर, उत्तराखंड और झारखंड के मामलों में हुए फैसलों के हवाले दिए. खासकर जस्टिस नरीमन के फैसले का उल्लेख सिंघवी ने किया. जानिए कि सिंघवी ने ये हवाले क्यों दिए और ये कानूनी दांव पेच क्या हैं.

क्या और क्यों है ये मुद्दा?
असल में, राजस्थान में बागी विधायकों को दलबदल कानून के तहत अयोग्य करार देने संबंधी नोटिस जारी किए गए हैं. इससे पहले भी ये मुद्दा चर्चा में रहा है. कर्नाटक में विधायकों को अयोग्य करार दिए जाने के मामले में जस्टिस एनवी रामन्ना की अगुआई वाली बेंच ने 109 पेज के फैसले में कहा था कि चूंकि स्पीकर अपनी राजनीतिक पार्टी के दबाव और इच्छा से अछूता नहीं रहता, इसलिए उसके पास विधायकों को योग्य या अयोग्य करार देने का कानूनी अधिकार नहीं होना चाहिए.

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अदालत में सिंघवी की बहस के बारे में अपडेट संबंधी ट्वीट किए गए.

पिछले साल नवंबर में इस फैसले में कहा गया था कि संविधान के दसवें शेड्यूल को मज़बूत करने पर सोचा जाना चाहिए ताकि अलोकतांत्रिक व्यवस्थाएं खत्म की जा सकें.



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क्या था जस्टिस रोहिंटन नरीमन का जजमेंट?
इसी साल जनवरी में मणिपुर विधानसभा में ऐसे ही मामले में जस्टिस रोहिंटन एफ नरीमन की अगुआई वाली बेंच ने 31 पेज के जजमेंट में स्पीकर की उस शक्ति पर सवाल उठाया था, जिसके तहत वह दलबदल कानून के तहत विधायकों को विधानसभा के लिए अयोग्य करार दे सकता है. इस जजमेंट में भी कहा गया था कि एक राजनीति पार्टी का सदस्य होने के नाते स्पीकर अकेला और अंतिम न्यायकर्ता नहीं होना चाहिए. जजमेंट के मुताबिक -

यह सही समय है कि संसद इस तरह की आभासी न्यायिक व्यवस्था में संशोधन के लिए पुनर्विचार करे. चूंकि स्पीकर खुद एक राजनीतिक पार्टी का सदस्य होता है, ऐसे में वह बागी विधायकों की अयोग्यता के लिए अंतिम न्यायकर्ता नहीं होना चाहिए. ऐसे मामलों में एक स्वतंत्र ट्रिब्यूनल होना चाहिए जो ऐसे विधायकों या सांसदों को लेकर सुनवाई करे.


सिंघवी ने और भी जजमेंटों के दिए हवाले
पिछले साल जून में सुप्रीम कोर्ट ने आम आदमी पार्टी के बागी विधायक देविंदर सेहरावत की याचिका पर सुनवाई करने से इसलिए इनकार किया था क्योंकि यह व्यवस्था स्पीकर के अधिकार क्षेत्र की थी.

इसी तरह, सिंघवी ने अमृता रावत व अन्य बनाम स्पीकर केस का हवाला भी दिया, जिसमें उत्तराखंड हाई कोर्ट ने भी यही कहा था कि कोर्ट इस मामले में दखल नहीं देना चाहता क्योंकि दलबदल संबंधी मामले में विधायकों की अयोग्यता को लेकर स्पीकर का निर्णय अंतिम है. हालांकि इस फैसले में हाईकोर्ट ने कहा था कि इस व्यवस्था पर बहस की गुंजाइश है क्योंकि यह आभासी न्याय प्रक्रिया है.

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वरिष्ठ अधिवक्ता और कांग्रेस नेता अभिषेक मनु सिंघवी.


सिंघवी ने क्यों दिए ये हवाले?
हालांकि इन मामलों के जजमेंट के दौरान अदालतों ने ये माना कि स्पीकर के पास इस तरह के निर्णय का अधिकार होना अलोकतांत्रिक है और न्यायसंगत नहीं है, लेकिन अब तक संविधान के मुताबिक व्यवस्था यही है कि इस फैसले का अंतिम अधिकार स्पीकर के पास ही सुरक्षित है. जब तक संसद में इस व्यवस्था में संशोधन की कार्यवाही नहीं की जाती, तब तक इसमें किसी तरह की बहस की गुंजाइश कम ही है.

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चूंकि अभिषेक मनु सिंघवी अदालत में स्पीकर की ओर से बहस कर रहे हैं इसलिए उन्होंने स्पीकर की अहमियत साबित करने के लिए ये हवाले दिए. राजस्थान के सियासी संकट के संदर्भ में सिंघवी ने दलील दी कि यह याचिका अभी प्रीमेच्‍योर है. इस बाबत फाइनल निर्णय नहीं लिया गया है. अंतिम निर्णय आने के बाद भी अदालत लिमि‍टेड ग्राउंड पर ही दखल दे सकती है.

सिंघवी ने ये भी दलील दी कि याचिका में उस ग्राउंड का उल्‍लेख नहीं है, जिसके आधार पर स्‍पीकर के आदेश को चुनौती दी जा सके. उन्‍होंने हाईकोर्ट की पीठ के सामने कहा कि इस मामले की (विधानसभा अध्‍यक्ष के आदेश) की न्‍यायिक समीक्षा नहीं की जा सकती.
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