जाड़ों में बर्फ गिरेगी तो इस बार सीमा पर कैसे रहेंगे हमारे सैनिक?

जाड़ों में बर्फ गिरेगी तो इस बार सीमा पर कैसे रहेंगे हमारे सैनिक?
बर्फीले इलाकों में सैन्य बल. (File Photo)

भारत की उत्तरी सीमाएं जहां चीन (LAC) से मिलती हैं, वहां तनाव के चलते सैन्य बलों (Armed Forces) की संख्या बढ़ गई है. होता यह है कि सड़क के रास्ते बलों के लिए सर्दियों का पर्याप्त स्टॉक नवंबर के पहले पहुंचाना होता है, लेकिन इस बार स्टॉक पहुंचाने के लिए समय उतना ही है, ज़रूरत बढ़ चुकी है. जानिए, इस बर्फबारी (Snowfall) में कितने चुनौतीपूर्ण होंगे हालात.

  • News18India
  • Last Updated: August 11, 2020, 4:23 PM IST
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हालांकि, मौजूदा तनाव के हालात में भारत और चीन दोनों ही देशों की सेनाएं (India China Forces) लद्दाख में पीछे हटने को लेकर बातचीत कर रही हैं लेकिन खबरें कह रही हैं कि भारतीय सेना (Indian Army) यहां अपनी मौजूदगी को मज़बूत करने के पक्ष में है. यानी जो अतिरिक्त सैन्य बल (Additional Forces) लद्दाख में एलएसी पर भेजे गए हैं, वो सर्दियों में भी बॉर्डर पर तैनात रहेंगे. यह फैसला हालात की संजीदगी ज़ाहिर करता ही है, यह सोचने पर भी मजबूर करता है कि हाड़ कंपा देने वाली ठंड में यहां हमारे सैनिकों के जीने और रहने के तमाम इंतज़ाम होते कैसे हैं?

आमतौर पर वित्त वर्ष शुरू होते ही आर्मी के लिए सामानों की सप्लाई का सिलसिला शुरू हो जाता है ताकि सीमा पर डटे सैनिकों के लिए सर्दी का स्टॉक जमा हो जाए. कपड़े, राशन कॉन्ट्रैक्ट, मैटेरियल मैन्युफैक्चरिंग वगैरह नवंबर तक मोर्चों तक पहुंचा दिया जाता है. खबरों की मानें तो अब स्थिति अलग है. चौदहवीं कोर के लद्दाख में तैनात 80,000 सैनिक पहले से हैं और अब वहां अतिरिक्त बल भी हैं. सड़क के रास्ते नवंबर तक ही काम पूरा होना है और ज़्यादा सैनिकों के लिए. उसके बाद हवाई रूट से ही सामान पहुंचाने का विकल्प होगा.

क्या विशेष उपकरण सैनिकों को चाहिए होते हैं?
सबसे पहले तो यही जान लें कि भारत की उत्तरी सीमा यानी बर्फीले इलाके में तैनात सैनिकों को विशेष कपड़े और पर्वतारोहण के काम आने वाले तमाम उपकरण चाहिए होते हैं. 14000 फीट से ज़्यादा अल्टिट्यूड को बेहद ऊंचा माना जाता है. जहां चीन के साथ पिछले दिनों झड़प हो चुकी है, वहां यानी गलवान वैली, गोगरा पोस्ट जैसे इलाके 14000 फीट से ज़्यादा ऊंचाई पर हैं. देपसांग के पठार तो 17000 फीट तक के अल्टिट्यूड पर हैं.
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जाड़े के स्टॉक के लिए आम तौर से हर बार करीब 2 लाख टन सामान सप्लाई होता है.




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अब सैनिकों को जो विशेष सामान चाहिए होगा, उसमें रस्सियां, स्पेशल हेलमेट, बर्फ वाले बूट, जैकेट आदि शामिल हैं. खबरों के मुताबिक सियाचिन में पोस्टेड सैनिकों को इस पूरे विशेष सामान के दो सेट दिए जाते हैं जिसकी कीमत दो लाख रुपये पड़ती है. अब समस्या कितनी बड़ी है, इसे यों समझें कि इसी साल संसद में रखी गई एक रिपोर्ट में सीएजी ने कहा था कि हाई अल्टिट्यूड पर तैनात सैनिकों के लिए कपड़े और उपकरण भेजने में देर होने से बेहद शॉर्टेज की स्थिति है. दूसरी तरफ, आर्मी ने इससे इनकार किया था.

इस बार कितना पड़ेगा खर्च?
सर्दियों के मौसम के लिए एडवांस स्टॉक के लिए अप्रैल मई से ही सड़क के रास्ते ट्रांसपोर्ट शुरू हो जाता है. सामान्य तौर से लद्दाख में तैनात फौज के लिए कपड़ों, उपकरणों और भोजन आदि मिलाकर करीब 2 लाख टन सामान सप्लाई होता है, लेकिन इस बार अतिरिक्त सैन्य बलों की तैनाती के चलते यह दोगुना तो नहीं लेकिन डेढ़ गुना ज़रूर होगा यानी 3 लाख टन तक सप्लाई की ज़रूरत पड़ेगी.

सेना के हवाले से खबरों में कहा गया है कि सड़क के रास्ते 10 टन की सप्लाई पर करीब 1 लाख औसतन खर्च आता है. इससे कुल कीमत का अंदाज़ा लग सकता है. हवाई रास्ते से सप्लाई और महंगी पड़ती है, हालांकि यह सप्लाई इमरजेंसी के हालात में ही होती है.


कैसे होती है सप्लाई?
चूंकि नवंबर से लेकर मार्च या अप्रैल तक हाई अल्टिट्यूड वाले इलाकों के रास्ते बर्फ से ढंके रहते हैं इसलिए सप्लाई अप्रैल से नवंबर के बीच ही हो सकती है. श्रीनगर से लद्दाख के लिए सप्लाई पहुंचाने के दो रूट हैं, रोहतांग पास और ज़ोजी ला. रोहतांग से भी ज़्यादा ऊंचाई पर दो और रूट हैं बरालचा ला और थंगलांग ला. ये सभी रूट कुछ ही समय के लिए खुले रहते हैं.

सड़क के रास्ते से श्रीनगर से लेह तक 10 टन सप्लाई लाने वाले एक ट्रक पर जहां 1 लाख रुपये तक खर्च आता है, वहीं एक घंटे में 50 टन सप्लाई लाने वाले सेना के एयरक्राफ्ट A C-17 ग्लोबमास्टर की एक उड़ान पर 24 लाख रुपये का खर्च आता है.

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श्रीनगर से लद्दाख सप्लाई पहुंचाने के दो सड़क रूट हैं, जो साल में कुछ ही समय के लिए खुले रहते हैं.


क्या सर्दियों में युद्ध होगा चुनौतीपूर्ण?
कतई नहीं. हालांकि इतनी संख्या में सैनिकों और बलों की तैनाती से तो यही लग सकता है कि भारत सर्दियों में युद्ध की तैयारी कर रहा है लेकिन रक्षा जानकारों के हवाले से खबरें कह रही हैं कि यह सुरक्षा के लिए उठाए गए कदम हैं, हमले के लिए नहीं. लद्दाख में सर्दी भयंकर होती है. तापमान माइनस 40 से माइनस 60 डिग्री तक चला जाता है और बर्फ 40 फुट तक. ऐसे में गश्त तक करना टेढ़ी खीर होता है वहां भारत युद्ध नहीं करना चाहेगा.

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लेकिन चीन की तरफ से अगर कोई हमला होता है तो जवाब मुस्तैदी से दिए जाने की तैयारी से भी पीछे हटने के मूड में भारत नहीं है इसलिए अतिरिक्त बलों की तैनाती की गई है. ज़ाहिर तौर पर सर्दियों में युद्ध हुआ तो हालात बहुत चुनौतीपूर्ण होंगे. दूसरी तरफ, इस बार सर्दियों में युद्ध हो या नहीं, एयरफोर्स की भूमिका पहले से ज़्यादा अहम रहने वाली है.

एयर वाइस मार्शल मनमोहन बहादुर (रिटायर्ड) के हवाले से एक रिपोर्ट कहती है कि बेशक इस बार यहां उड़ानें ज़्यादा होंगी. लेह और थोइस के मुख्य बेस से आर्मी को सपोर्ट दिए जाने की तैयारी है. भारतीय वायु सेना की ट्रांसपोर्ट इकाई के पास सी17, आईएल76, सी130जे, एएन32 जैसे काफी क्षमता वाले एयरक्राफ्ट हैं, जिनके ज़रिये आर्मी को सर्दियों के मौसम में मदद पहुंचाई जा सकती है.
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