जानिए ऑस्ट्रेलिया के पानी पर कैसे चीन ने जमा लिया कब्जा?

जानिए ऑस्ट्रेलिया के पानी पर कैसे चीन ने जमा लिया कब्जा?
चीन और ऑस्ट्रेलिया के रिश्ते तनाव की हालत में पहुंचे.

ऑस्ट्रेलिया के कई क्षेत्रों में पानी की किल्लत (Water Crisis) और बीते कुछ सालों से सूखे के हालात (Drought) के चलते कोहराम मचा है. दूसरी तरफ, चीन के साथ ऑस्ट्रेलिया के रिश्तों में तनाव चरम पर पहुंच रहा है. ऐसे में, ऑस्ट्रेलिया के जलक्षेत्रों (Water Bodies) पर चीन का तेज़ी से कब्ज़ा करना क्या मायने रखता है? पूरी तस्वीर ठीक से समझना चाहिए.

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एक तरफ ऑस्ट्रेलिया और चीन (Australia-China Relation) के बीच रिश्ते खराब हो रहे हैं, तो दूसरी तरफ, ऑस्ट्रेलिया के सामने यह नया संकट बन सकता है कि China उसी के पानी का इस्तेमाल उसके खिलाफ करे. जलसंकट से बुरी तरह जूझ रहे ऑस्ट्रेलिया के सबसे कीमती जलक्षेत्रों (Water Entitlements) में शुमार एक में चीन के मालिकाना हक को लेकर बड़ी चिंताओं का माहौल बन रहा है. ये भी कहा जा रहा है कि चीन किसी रणनीति या चालबाज़ी के तहत इस पानी को गलत ढंग से इस्तेमाल कर सकता है.

1980 में पहली बार ऑस्ट्रेलिया में पानी Commodity बन गया था, तबसे कई सालों में ये Water Market बहुत बड़ा हुआ और अब ऑस्ट्रेलिया के पानी पर विदेशी कब्ज़े अच्छे खासे हो चुके हैं. सबसे बड़ा विदेशी हिस्सेदार चीन है और अब यही चिंता की बात हो रही है. क्या है ये पूरा माजरा और ये भी जानिए कि ऑस्ट्रेलिया किस कदर जलसंकट से जूझने पर मजबूर है.

कितना बड़ा है ऑस्ट्रेलिया में पानी का बाज़ार?
जलक्षेत्रों की खरीद फरोख्त का बाज़ार ऑस्ट्रेलिया में सालाना 2 अरब अमेरिकी डॉलर से ज़्यादा का है, जो दुनिया के किसी और देश या महाद्वीप में ऐसे बाज़ारों में सबसे बड़ा है. अस्ल में, धरती के सबसे सूखे महाद्वीप ऑस्ट्रेलिया में ज़मींदार किसानों के पास जल अधिकार हैं जिनके ज़रिये वो पानी के बाज़ार में सौदे कर सकते हैं. साथ ही, ऑस्ट्रेलिया के कमज़ोर कानूनों के हिसाब से इन वॉटर एंटाइटलमेंट में विदेशी भी निवेश कर सकते हैं.
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दक्षिणी ऑस्ट्रेलिया में जलसंकट बेहद गहरा चुका है.


पारदर्शी नहीं है विदेशी निवेश?
हालांकि ऑस्ट्रेलिया सरकार दावा करती है कि पानी के अधिकारों को लेकर विदेशी निवेश की प्रक्रिया में पूरी पारदर्शिता है, लेकिन रिपोर्टों की मानें तो इस तरह के निवेशों को पूरी तरह लोगों के साथ साझा नहीं किया जाता और निवेशकों को चुनने की प्रक्रिया भी कठोर नहीं है.

सबसे उपजाऊ जलक्षेत्र पर चीन का हक
वॉटर एंटाइटलमेंट में विदेशी निवेश के रजिस्टर में ऑस्ट्रेलिया सरकार की रिपोर्ट ने बताया कि चीन का निवेश ऑस्ट्रेलियाई जलक्षेत्रों में सबसे बड़ा है. पिछले साल जून तक की स्थिति के मुताबिक 756 गीगालीटर जलक्षेत्र पर चीनी हक था, जो ऑस्ट्रेलिया में बिकाऊ जलक्षेत्रों का 1.9 फीसदी है. इसके बाद 713 गीगालीटर पानी या 1.85 फीसदी पर अमेरिकी हक है. इसके बाद यूके 1.1 फीसदी के साथ तीसरा बड़ा निवेशक है.

ऑस्ट्रेलियाई जलक्षेत्रों के 10.5 फीसदी हिस्से पर विदेश निवेश है. खबरों के मुताबिक चीनी सरकारी कंपनी कोफ्को कॉर्पोरेशन की यूनिबेल जिस हिस्से में पानी का मालिकाना हक रखती है वह कृषि और डेयरी के उत्पादन में ऑस्ट्रेलिया का नंबर वन क्षेत्र है. इस इलाके में ऑस्ट्रेलिया का 60 फीसदी अनाज पैदा होता है. चीन ने ऑस्ट्रेलिया के साउथ वेल्स ग्वाइडर रिवर सिस्टम के मरे-डॉर्लिंग बेसिन में पानी खरीदा है.


ऑस्ट्रेलिया में पानी की कीमतें
पिछला साल ऑस्ट्रेलिया का सबसे गर्म और सूखा दर्ज हुआ. मौसम के हिसाब से ऑस्ट्रेलिया में दस लाख लीटर पानी सूखे में 1000 ऑस्ट्रेलियाई डॉलर से लेकर मानसून में 20 डॉलर तक बिकता है. इसी तरह, राज्यों के हिसाब से भी पानी की कीमतों में फर्क आता है. पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया में सबसे सस्ता पानी मिलता है, जहां लोग एक तिमाही में 234 ऑस्ट्रेलियाई डॉलर खर्च करते हैं, वहीं तस्मानिया में पानी सबसे महंगा है जहां 365 डॉलर खर्च होते हैं.

विदेशी निवेश को लेकर नियम
सरकारी रिपोर्ट की मानें तो ऑस्ट्रेलिया जलक्षेत्रों में विदेशी निवेश को मंज़ूरी देता है, लेकिन सैद्धांतिक तौर पर कहता है कि निवेशक अपने मालिकाना हक वाले पानी का ज़्यादातर इस्तेमाल ऑस्ट्रेलिया में कृषि (66.5 फीसदी) और खनन (26.3 फीसदी) पर करेंगे. 6 फीसदी पानी का इस्तेमाल लीज़ के लिए हो सकता है और 3 फीसदी से कम पानी सिंचाई के लिए.

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ऑस्ट्रेलिया में लोग पानी की बोतलें खरीदने पर मजबूर हैं.


क्या चीन से वाकई खतरा है?
इस बारे में विशेषज्ञों की राय मीडिया से अलग है. अस्ल में, ऑस्ट्रेलिया और चीन के बीच तनाव के हालात बनने के कारण लोकल मीडिया में इस तरह की खबरें और कार्यक्रम प्रसारित हुए कि चीन ने चालबाज़ी के तहत जलक्षेत्रों पर कब्ज़ा किया है और अब वह देश के लिए मुसीबत खड़ी करने की तैयारी में है. कुछ हेडलाइन्स इस तरह दिखीं, 'चीन का जल अत्याचार', 'चीन के दोनों हाथ हमारी नदियों में' और 'हमारे किसानों से लूट'. इससे कई तरह की ऑनलाइन प्रतिक्रियाएं और चर्चाएं शुरू हुईं. लेकिन, विशेषज्ञों के मुताबिक स्थिति अलग है.

कुछ लोगों ने वो बिंदु आपस में जोड़ दिए हैं, जो हैं ही नहीं. चीन, अमेरिका या कोई भी देश पानी खरीदे, इससे क्या फर्क पड़ता है क्योंकि पानी को एक्सपोर्ट तो वो नहीं कर सकता. कौन पानी खरीद रहा है, ये जानने से ज़्यादा ज़रूरी है कि हम ये जानें कि पानी कहां है और इसका इस्तेमाल कितना बेहतर किया जा सकता है.
प्रोफेसर क्वेंटिन ग्रैफ्टन, ऑस्ट्रेलियन नेशनल यूनिवर्सिटी


इसी तरह चीन में बतौर ऑस्ट्रेलियाई राजनयिक रह चुकीं नताशा कैसम के मुताबिक चीन को लेकर निगेटिव रिपोर्टिंग इसलिए हुई क्योंकि चीन के साथ संबंधों का असर ऑस्ट्रेलिया की अर्थव्यवस्था और सुरक्षा पर जितना पड़ रहा है, उतना पहले कभी नहीं दिखा. ऑस्ट्रेलिया में कुल विदेशी निवेश का डेटा बताता है कि पिछले साल के व्यापार के मामले में चीन सिर्फ 2 फीसदी निवेश के साथ नौवां बड़ा विदेशी निवेशक रहा जबकि अमेरिका 25.6 फीसदी निवेश के साथ अव्व्ल.

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ऑस्ट्रेलिया का जलसंकट समझना ज़रूरी
सिर्फ ढाई करोड़ की आबादी वाले इस महाद्वीप पर ग्लोबल वॉर्मिंग और क्लाइमेट चेंज का असर पूरी दुनिया को सबक देने के लिए काफी है. हालत ये है कि यहां नदियों का जलतंत्र पूरी तरह नष्ट होने की कगार पर पहुंच गया है, जिसकी दो बड़ी वजहें क्लाइमेट चेंज और औद्योगिक फार्मिंग है. इसका बड़ा खमियाज़ा ये ​है कि भूमिगत जलस्तर नीचे खिसक रहा है, साथ ही ये अंडरग्राउंड पानी कठोर और ज़्यादा सोडियम युक्त हो चुका है, जिससे लोग पानी की बोतलें खरीदने पर मजबूर हैं.

ऑस्ट्रेलिया के कुछ नगरों से पानी लगभग समाप्त हो चुका है. वैज्ञानिकों के बीच इस बात को लेकर कोई खास चिंता नहीं है कि ऑस्ट्रेलिया में ग्राउंडवॉटर सिस्टम न तो पूरी तरह निगरानी में है और न ही सही हाल में. सूखे से निपटने में अव्यवस्थाओं, जलस्रोतों के खराब प्रबंधन, जल संबंधी नीतियों के अभाव और जल सुरक्षा के मुद्दों पर चर्चा करती एक रिपोर्ट दावा करती है कि भविष्य में ऑस्ट्रेलिया और बड़े जलसंकट का सामना करेगा और सरकार इतनी लाचार है कि उसके पास कोई हल नहीं है.
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