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तब भारत-चीन सीमा विवाद ने कैसे कम्युनिस्ट पार्टी में कर दी थी दोफाड़?

महागठबंधन में सीटों के बंटवारे के तहत लेफ्ट पार्टियों को 29 सीटें दी गई हैं (न्यूज़़ 18 ग्राफिक्स)

महागठबंधन में सीटों के बंटवारे के तहत लेफ्ट पार्टियों को 29 सीटें दी गई हैं (न्यूज़़ 18 ग्राफिक्स)

विशेषज्ञों की मानें तो सोवियत (USSR) का हिस्से रहे उज़बेकिस्तान में 1920 में बनी भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) शुरू से ही अंतरराष्ट्रीय कम्युनिस्ट आंदोलन (Communist Movement) की छांव में रही और उन क्रांतिकारियों ने पाला पोसा जो खुद भारत से अमेरिका या यूरोप माइग्रेट कर गए थे. अपने स्टैंड पर स्पष्ट नहीं रही सीपीआई कैसे भारत-चीन (Sino-India War) युद्ध में ढह गई?

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    मार्क्स के कम्युनिस्ट मेनिफे​स्टो (Communist Manifesto) में एक विचार है 'वर्किंग क्लास के हितों के लिए बनी अन्य पार्टियों के खिलाफ जाकर कम्युनिस्ट अलग पार्टी नहीं बनाते.' लेकिन, भारत में कम्युनिस्ट पार्टियों (Communism in India) के साथ यह बात लागू नहीं हुई, बल्कि आज़ादी के बाद कांग्रेस (INC) को चुनौती देने वाली सबसे बड़ी प्रमुख पार्टी यानी सीपीआई दरारों के कारण टूटी थी. सीपीआई के टूटने के बाद ही भारतीय मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी यानी CPI (M) का जन्म हुआ था. लेकिन इस ऐतिहासिक बंटवारे के पीछे कारण क्या था?

    भारत और चीन के बीच 1962 का जो युद्ध (India-China War) हुआ, इतिहास के मुताबिक उसकी भूमिका 21 अक्टूबर 1959 को तब तैयार हो गई थी, जब 10 भारतीय सीआपीएफ जवानों को चीनी सेना ने मार गिराया था. लद्दाख के बेहद ठंडे इलाके कोंगका पास (Kongka Pass) पर हुई इस घटना से भारत को बड़ा झटका तो लगा ही था, लेकिन क्या आप जानते हैं कि यही वो घटना भी थी, जहां से देश की लेफ्ट राजनीति (Politics of Left) में भी दरारों की शुरुआत हुई थी?

    बेशक, इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि कम्युनिस्ट पार्टी के भीतर विचारधारा और नेतृत्व को लेकर कई तरह की समस्याएं थीं और इसके टूटने के लिए बड़े कारण थे, लेकिन 'गर्म लोहे पर जो चोट' की जाती है, वो काम 1962 के युद्ध ने किया और पार्टी टूट गई. जानिए कि कैसे भारत चीन सीमा विवाद से देश की कम्युनिस्ट पार्टी दोफाड़ हुई थी और इसके कारण क्या थे.

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    सीपीआई के संस्थापकों में शुमार महाराष्ट्र के कम्युनिस्ट नेता एसए दांगे की यह तस्वीर विकिमीडिया कॉमन्स से साभार.


    शुरू से ही सब कुछ ठीक नहीं था!
    संक्षेप में इतिहास को समझें तो भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की जड़ें स्थापना से ही विदेशी कम्युनिस्ट आंदोलन में थीं. भारत में सीपीआई का नज़रिया काफी भ्रम पैदा करने वाला था क्योंकि यहां राष्ट्रवादी आंदोलन से इसका उदय माना गया. अदरिजा रॉयचौधरी लेख में आगे यह भी कहते हैं कि 1940 के दशक में गांधी के 'भारत छोड़ो' नारे और दूसरे विश्व युद्ध के दौरान सोवियत संघ द्वारा अंग्रेज़ों का पक्ष लेने के बाद सीपीआई ने स्वतंत्रता की लड़ाई से मुंह फेर लिया था.

    1950 और 60 के दशक में चीन और सोवियत यानी दो बड़ी कम्युनिस्ट शक्तियों के बीच संबंध तकरीबन टूट जाने की घटना, भारत की कम्युनिस्ट पार्टी के लिए लंबे समय के असर वाली साबित हुई. ये दोनों शक्तियां मार्क्स और लेनिन के सिद्धांतों के पालन को लेकर एक दूसरे पर आरोप लगा रही थीं. तभी सोवियत और भारत के बीच नजदीकियां बढ़ीं तो सोवियत ने सीपीआई से नेहरू की विदेश नीति का साथ देने की अपील की.


    यहां से कम्युनिस्ट पार्टी के भीतर धड़े बने. नेहरू की नीतियों का साथ देने के लिए सीपीआई का जो धड़ा तैयार नहीं था, उसने चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के साये को चुना.

    कोंगका पास घटना से कैसे पड़ी फूट?
    सीपीआई के सामने फिर स्टैंड की समस्या खड़ी हुई. दलाई लामा के भारत आने और तिब्बत पर चीन के रवैये के बारे में शोधकर्ता रॉबर्ट स्टर्न ने 1965 के अपने लेख में लिखा कि सीपीआई ने एक साझा बयान इस तरह जारी किया कि उसमें चीन का समर्थन था और तिब्बत के विद्रोहियों, भारत के प्रतिक्रियावादियों और पश्चिम के साम्राज्यवादियों का विरोध.

    इधर, लद्दाख और अरुणाचल, जिसे तब उत्तर पूर्व फ्रंटियर एजेंसी कहा जाता था, दोनों जगहों पर चीनी सेना का दखल बढ़ रहा था. कलकत्ता रिज़ाल्यूशन पार्टी के असंतुष्टों के लिए बड़ा झटका था. तब पार्टी के महासचिव अजय घोष ने जो कोशिशें कीं, उससे कुछ समय के लिए पार्टी बची रही. सिर्फ एक महीने बाद कोंगका पास की घटना हुई और पार्टी के एक धड़े ने खुलकर सीपीआई की नीतियों का विरोध कर दिया.

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    महाराष्ट्र के कम्युनिस्ट नेताओं ने घोषित कर दिया कि मैकमोहन रेखा भारत की कुदरती सीमा है और चीन का रवैया यहां आक्रांता का है. सीपीआई के लिए एक ​तरफ राष्ट्रवाद था, तो दूसरी तरफ विचारधारा. संकट बड़ा था. बॉम्बे और केरल के प्रभावी कम्युनिस्ट नेताओं ने खुलकर नेहरू की सीमा नीति को समर्थन देने की बात कही थी. एजी नूरानी के विस्तृत लेख के मुताबिक लेफ्ट पार्टी के भीतर वामपंथी और दक्षिणपंथी समर्थकों के गुट बने थे.

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    1962 भारत चीन युद्ध के लिए प्रतीकात्मक तस्वीर.


    युद्ध में ढह गया सीपीआई का किला!
    सीपीआई के संस्थापकों में से एक और लोकसभा में पार्टी के चेहरे रहे एसए दांगे ने साफ शब्दों में कहा कि 'कोंगका पास जैसी घटनाओं को रोकने के लिए पूरा देश पंडित नेहरू के पीछे खड़ा होगा.' इस बयान को केरल से उत्तर प्रदेश के बड़े सीपीआई नेताओं का समर्थन मिला तो पंजाब, गुजरात, दिल्ली व अन्य जगहों के नेताओं ने असंतोष जाहिर किया.

    अगले कुछ दिनों में पार्टी में मतभेद बहुत ज़्यादा हो चुके थे और 1961 में घोष के गुज़रने के बाद संकट और गहराया. 1962 में जब चीनी सेना ने भारत पर हमला कर दिया, तब दांगे ने सरकार का साथ देकर उन हज़ारों पार्टी सदस्यों को गिरफ्तार करवाया जो चीन के हिमायती थे.

    वामपंथी द्विजेन नंदी ने दांगे के लिखे कुछ पत्रों का पर्दाफाश करते हुए दावा किया कि दांगे ब्रिटिश इंटेलिजेंस से जुड़े थे. इसे सीपीआई की आखिरी दरार माना जा सकता है. इस युद्ध के कारण सीपीआई के भीतर जो दरारें गहरा गई थीं, खाइयों की तरह दिखीं और सीपीआई दोफाड़ हो गई. 31 अक्टूबर से 7 नवंबर 1964 के बीच मार्क्सवादी गुट यानी CPI(M) की स्थापना हुई.

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