25 साल की मेहनत 25 हफ्ते में कोरोना ने कर दी तबाह

न्यूज़18 क्रिएटिव

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बेरोज़गारी (Unemployment), भुखमरी और तनाव जैसी कई परेशानियां Covid-19 के असर के तौर पर हमारे सामने हैं. ये और कितनी विकराल हो सकती हैं? विकास (Global Development) की पटरी पर जिस तरह दुनिया दौड़ रही थी, कितनी फिसल गई है?

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  • Last Updated: September 17, 2020, 3:34 PM IST
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दुनिया भर को अपनी चपेट में लेने वाले कोरोना वायरस (Corona Virus) के असर पर हुए एक अध्ययन का दावा है कि पिछले करीब 25 हफ्तों में जिस तरह महामारी विकराल हुई, विकास के पैमाने पर दुनिया 25 साल पीछे खिसक गई. पिछले कुछ दशकों में ऐसा पहली बार हुआ है जब दुनिया स्वास्थ्य (Health System) और तरक्की के मामले में (Development Issues) इस कदर पिछड़ गई है. असर केवल इतना ही नहीं है, बल्कि ये भी कहा गया है कि निकट भविष्य में और खामियाज़े भुगतते हुए हम कुछ और पीछे हो जाएंगे.

बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन ने 2020 की हेल्थ एंड डेवलपमेंट रिपोर्ट हा​ल ही में रिलीज़ करते हुए कहा है कि नवजात व शिशु मृत्यु दर, मातृत्व स्वास्थ्य, कृषि में वित्तीय निरंतरता, एचआईवी, टीबी, मलेरिया, शिक्षा की उपलब्धता, लैंगिक समानता और टॉयलेट व साफ पानी की उपलब्धता जैसे विकास के ग्लोबल पैमानों पर इस साल स्थिति बदतर देखी गई या फिर कोई विकास नहीं हुआ. इस रिपोर्ट ने 25 सालों की मेहनत के 25 हफ्तों में मटियामेट होने के दावे के क्या सबूत दिए हैं?

गरीबी के मोर्चे पर नाकामी
47 पन्नों की इस रिपोर्ट में गरीबी और टीकाकरण अभियानों पर मुख्य रूप से चर्चा की गई है. कोरोना वायरस महामारी के चलते लॉकडाउन जैसे कदम उठाए गए और दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाएं चौपट हुईं. इस सिलसिले में अध्ययन के आधार पर बताया गया कि 30 सालों में पहली बार ऐसा हुआ है, जब गरीबी रेखा के नीचे रहने वाले लोगों की संख्या बढ़ती नज़र आई.
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1.90 अमेरिकी डॉलर प्रतिदिन से कम आय यानी वैश्विक गरीबी रेखा के नीचे रहने वाली आबादी को लेकर (Bill & Melinda Gates Foundation) प्रोजेक्शन.




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बीपीएल लोगों की दर 2019 में 6.7% फीसदी थी, जो 2020 में 7.1% देखी गई. यही नहीं आकलन यह कह रहा है कि आने वाले समय में स्थिति और खराब होगी और 2021 में यह दर 7.3% तक हो जाएगी. महत्वपूर्ण बात यह है कि जिस तरह दुनिया मंदी की तरफ बढ़ रही है, उसके चलते 2030 तक हम 2019 वाली स्थिति तक लौट सकेंगे. गरीबी का यह पैमाना साफ तौर पर कोरोना का अर्थव्यवस्था पर असर बताने के लिए पर्याप्त है.

टीकों के मोर्चे पर बदहाली
गरीबी के बाद दूसरा मोर्चा है टीकाकरण, जो दुनिया भर के स्वास्थ्य सिस्टम की कार्यशैली और क्षमताओं को दिखाता है. इस मोर्चे पर भी नाकामी ही हाथ लगी है. साल 2019 में, शिशु मृत्यु दर को कम करने से जुड़े डीटीपी टीकाकरण अभियान के तहत 84% बच्चे दुनिया में वैक्सीन पा रहे थे. वहीं, 2020 में यह आंकड़ा 70% रह गया. करीब 1.4 करोड़ बच्चों को यह बेसिक वैक्सीन नहीं मिल सकी. कोविड 19 की वजह से टीकाकरण की दर 1990 के दशक के समय की दर के स्तर पर पहुंच गई है.

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इनके अलावा, कई विषयों पर इस रिपोर्ट में मौजूदा स्थिति की तुलना पिछले सालों की स्थिति से की गई है. ​शिक्षा के क्षेत्र में, महामारी से पहले भी दुनिया संकट से जूझ रही थी. कम और मध्यम आय वाले देशों के 53 फीसदी और सब सहारा अफ्रीका के 87 फीसदी विद्यार्थी 10 साल की उम्र तक भी एक आसान सा लेख पढ़ने के काबिल नहीं हो पाए गए थे.

महामारी से स्थिति और बदतर होने, खासकर लड़कियों की शिक्षा पर खासा असर पड़ने का अनुमान है. यह भी आशंका जताई गई कि लड़कियों को अब स्कूल न भेजने की समस्या भी बढ़ जाएगी. इसी तरह, दुनिया भर में खाद्य असुरक्षा को लेकर भी चिंता की जानी चाहिए. संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक महामारी से जो आर्थिक झटके लगे हैं, उनका अंजाम ये होगा कि दुनिया के 13 करोड़ से ज़्यादा लोगों के सामने भूख का संकट गहराएगा.
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