जानिए लद्दाख कैसे बना था भारत और कश्मीर का हिस्सा

लद्दाख को जम्मू कश्मीर से अलग कर केंद्रशासित प्रदेश का दर्जा दिए जाने के बाद लद्दाख इसलिए भी संतुष्ट होगा कि उसकी सालों पुरानी मांग आखिर मंज़ूर हुई. कश्मीर और लद्दाख के रिश्ते के बारे में ज़रूरी और रोचक तथ्य जानिए.

News18Hindi
Updated: August 7, 2019, 9:38 PM IST
जानिए लद्दाख कैसे बना था भारत और कश्मीर का हिस्सा
न्यूज़18 क्रिएटिव
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Updated: August 7, 2019, 9:38 PM IST
आर्टिकल 370 के प्रावधान समाप्त कर जम्मू और कश्मीर राज्य का विशेष दर्जा खत्म कर केंद्र सरकार ने हालिया कानून के तहत लद्दाख को जम्मू कश्मीर से अलग केंद्रशासित प्रदेश बना दिया है. लेकिन क्या आप जानते हैं कि इतिहास के हवाले से लद्दाख कैसा प्रदेश या हिस्सा रहा है और भारत में कैसे शामिल हुआ? सदियों का इतिहास इसके पीछे है और उसी इतिहास के चलते कभी तिब्बत तो कभी चीन लद्दाख के हिस्सों पर अपना हक जमाता रहता है. जानिए क्या है लद्दाख की कहानी और क्यों लद्दाख भारत का ही अभिन्न अंग है, किसी और देश का नहीं.

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लद्दाख का इतिहास दो हज़ार साल से भी ज़्यादा पुराना है और भूगोल के हिसाब से हिमालय व काराकोरम पर्वत शृंखला के बीच बसे इस भूभाग पर समय समय पर ताकतवर रहे तमाम देशों की नज़र रही है. बहुत पुरानी बात न करते हुए ये जानिए कि 17वीं सदी के अंत में तिब्बत के साथ विवाद के चलते लद्दाख ने खुद को भूटान के साथ जोड़ा था. फिर कश्मीर के डोगरा वंश के शासकों ने लद्दाख को 19वीं सदी में हासिल किया. तिब्बत, भूटान, चीन, बाल्टिस्तान और कश्मीर के साथ कई संघर्ष के बाद 19वीं सदी से लद्दाख कश्मीर का ही हिस्सा रहा.

कश्मीर का हिस्सा ऐसे रहा लद्दाख

साल 1834 में महाराजा रणजीत सिंह के सिपहसालार ज़ोरावर सिंह ने लद्दाख को डोगरा वंश के लिए जीता था. इसके बाद 1842 में लद्दाखी विद्रोह को भी कुचला गया और लद्दाख को डोगराओं के जम्मू व कश्मीर का अभिन्न हिस्सा बना लिया गया. लद्दाख के शासक रहे नामज्ञाल वंश को स्तोक की जागीर दी गई और वज़ीरे-वज़ारत की पदवी भी. 1850 के बाद लद्दाख में ब्रितानी हुकूमत और यूरोप की दिलचस्पी बढ़ना शुरू हुई और 1885 तक लेह को मोरावियन चर्च के मिशन का हेडक्वार्टर बनाया गया.

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भारत की आज़ादी के वक्त का घटनाक्रम
साल 1947 में जब भारत को बंटवारे की शर्त पर आज़ादी मिली, तब कश्मीर के महाराज हरि सिंह के पास दो विकल्प थे कि वो हिंदोस्तान में शामिल हों या पाकिस्तान में. इसी बी, 1948 में पाकिस्तानी हमलावरों ने लद्दाख में कारगिल और ज़ांसकर तक घुसकर इस हिस्से को हथियाने की कोशिश की लेकिन समय रहते भारतीय सैनिकों ने इस हिस्से से पाकिस्तानियों को खदेड़ा. फिर जम्मू कश्मीर ने भारत के साथ सशर्त विलय का ऐलान किया और भारतीय सेना का आभारी लद्दाख भी जम्मू कश्मीर राज्य के हिस्से के बतौर भारत का अभिन्न अंग बना.

फिर चीन की नज़र का दौर
साल 1949 में चीन ने नूब्रा और झिनजियांग के बीच का बॉर्डर बंद कर तेल व्यापार रोक दिया. इस क्षेत्र के तिब्बतियों को 1950 में चीन की घुसपैठ ने बेहद परेशान किया. 1962 में चीन ने अक्साई चिन इलाके पर कब्ज़ा कर लिया और फौरन झिनजियांग व तिब्बत के बीच सड़कें बनवाना शुरू किया. पाकिस्तान के साथ मिलकर चीन ने काराकोरम हाईवे भी बनवाया. इधर, भारत ने श्रीनगर से लेह के बीच हाईवे उसी समय बनवाया. इस हाईवे श्रीनगर से लेह जाने में लगने वाला 16 दिन का समय घटकर दो दिन का हुआ.

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श्रीनगर-लेह हाईवे. फाइल फोटो


हमेशा रही इस इलाके पर सबकी नज़र
जम्मू और कश्मीर समेत राज्य के इस हिस्से पर भी भारत का अपने पड़ोसियों पाकिस्तान और चीन के साथ विवाद चलता रहा. लद्दाख का कारगिल क्षेत्र तो 1947, 65, 71 और 1999 के युद्धों में फोकस पर रहा. लद्दाख को 1979 में दो ज़िलों या क्षेत्रों कारगिल और लेह में बांट दिया गया. 1989 में बौद्धों और मुस्लिमों की आबादी के बीच बने तनाव के कारण यहां सांप्रदायिक तनाव व दंगे भी हुए और तब कश्मीर से अलग होकर लद्दाख ने केंद्रशासित राज्य का दर्जा पाने की मांग उठाई. इसके बाद 1993 में भारत सरकार ने लद्दाख को स्वायत्ता देते हुए लद्दाख स्वायत्त हिल डेवलपमेंट परिषद की स्थापना की.

सीमा पर अब भी है तनाव
चीन के साथ 1962 के युद्ध के समय से ही लद्दाख की सीमा को लेकर विवादों ने पीछा नहीं छोड़ा है. तबसे यहां हालात यहां पेचीदा रहे हैं और लद्दाख के उत्तर पूर्वी छोर पर भारतीय और चीनी सैन्य बलों की भारी तैनाती रही है. लद्दाख के चुमार जैसे इलाके पिछले कुछ सालों में सीमा विवाद को लेकर सुर्खियों में रह चुके हैं. भारत और चीन के बीच सीमा विवाद के बीच उधर, 2014 तक जीवित रहे तिब्बत के कम्युनिस्ट नेता फुंत्स्योक वांग्याल का लद्दाख को तिब्बत का हिस्सा बताने का दावा हमेशा रहा.

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First published: August 7, 2019, 8:55 PM IST
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