कैसे पाकिस्तान में पनप रहे हैं भारत आने वाले टिड्डियों के दल?

कैसे पाकिस्तान में पनप रहे हैं भारत आने वाले टिड्डियों के दल?
भारत में इस बार टिड्डडी दल का सबसे बड़ा हमला

रेगिस्तानी टिड्डियों (Desert Locust) के प्रजनन के लिए पाकिस्तान (Pakistan) फ्रंट लाइन देश रहा है. बसंत और गर्मियों के मौसम में बलूचिस्तान (Balochistan) के अंदरूनी इलाकों में टिड्डी दल पनपते हैं क्योंकि यहां उनके लिए मौसम अनुकूल होता है. जानिए कि पाकिस्तान में अपनी आबादी बढ़ाकर टिड्डियों का ये हुजूम भारत (India) की तरफ कैसे रुख करता है.

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पिछले करीब एक महीने से हर दो-तीन दिनों में राजस्थान (Rajasthan) में टिड्डियों के झुंड पाकिस्तान के रास्ते से घुसपैठ कर रहे हैं. रेगिस्तानी टिड्डियों के चार बड़े दल हाल में सीमा पार से राजस्थान के जयपुर (Jaipur) शहर भी पहुंचे थे. राज्य के कृषि विभाग (Agriculture) के हवाले से खबरों में आया कि पाकिस्तान इन टिड्डियों का नया प्रजनन केंद्र (Breeding Ground) बन गया है इसलिए भारत में टिड्डियों के हमले लगातार हो रहे हैं. अब जानने की बात है कि कैसे पाकिस्तान में टिड्डियों के दल पनप रहे हैं.

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क्या है भारत का दावा?
भारतीय विशेषज्ञों के हवाले से किए जा रहे दावों के मुताबिक भारत में आ रहे टिड्डियों के इन दलों की शुरुआत तो हॉर्न ऑफ अफ्रीका से हुई थी, जहां बरसात ने टिड्डियों को पनपने के लिए अनुकूल वातावरण दिया था. लेकिन, इसके बाद इन टिड्डियों को प्रजनन के नए केंद्र बलूचिस्तान, पाकिस्तान और ईरान में मिले.



अप्रैल महीने में पाकिस्तान से टिड्डियों के दल राजस्थान पहुंचे थे और वहां से अन्य इलाकों में भी. केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय के मुताबिक ताज़ा हालात ये हैं कि टिड्डियों के दल सबसे ज़्यादा राजस्थान को प्रभावित कर रहे हैं और मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और गुजरात जैसे राज्यों में भी सक्रिय हैं.



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भारत व पाकिस्तान टिड्डियों के हमलों को लेकर गुरुवार को बातचीत कर रहे हैं. फाइल फोटो.


पाकिस्तान में क्यों पनपे टिड्डियों के दल?
समय पर इन्हें नष्ट न किया जाना बड़ी वजह रहा. टिड्डी चेतावनी संस्था के विशेषज्ञ केएल गुर्जर की मानें तो पाकिस्तान ने टिड्डियों के दलों के अंडे पनपने की स्थिति पर ध्यान नहीं दिया गया. पाकिस्तान में इन्हें नष्ट कर दिया जाता तो दोनों देशों को इतना खतरा और नुकसान नहीं होता. पाकिस्तान में नज़रअंदाज़ी के चलते पनप गए इन अवयस्क टिड्डियों के दलों ने सिंध के बार्डर के ज़रिए भारत में प्रवेश किया और अब इनके वयस्क होने पर आने वाले खतरे बढ़ रहे हैं. साथ ही, पाकिस्तान से अभी और दल भारत में घुस सकते हैं.

भारत पाकिस्तान के बीच बातचीत
दोनों देश आज यानी गुरुवार को टिड्डियों के हमलों को लेकर बातचीत करेंगे और हालात को काबू में लाने के बारे में विचार साझा करने वाले हैं. दूसरी तरफ, ये भी खबरें हैं कि चीन की मदद लेकर पाकिस्तान टिड्डियों के दलों को नष्ट या काबू करने के कदम उठाने पर भी विचार कर रहा है. भारत ने अपनी तरफ से संदेश दिया है कि पाकिस्तान को अपने क्षेत्रों में टिड्डियों के ब्रीडिंग ठिकानों पर हमला बोलकर उनकी बड़ी आबादी पनपने से रोकने के कदम उठाने चाहिए.

ब्रीडिंग केंद्रों पर ही किया जा सकता है काबू
विशेषज्ञ मान रहे हैं कि जहां टिड्डियों के दल प्रजनन केंद्र बनाते हैं, वहीं रासायनिक हमले कर इन्हें नष्ट किया जाना ही इन्हें काबू करने का बेहतर विकल्प है. अगर ये टिड्डी दल एक बार शहर में आ गए, तो वहां रासायनिक छिड़काव करना मुश्किल हो जाता है क्योंकि इससे मनुष्यों की आबादी को नुकसान होता है. जैसे पिछले दिनों जयपुर शहर में टिड्डियों के दलों के हमलों के दौरान बचाव टीमें रसायन का प्रयोग नहीं कर सकीं.

टिड्डियों का बड़ा केंद्र है पाकिस्तान
बसंत और गर्मी के मौसम में रेगिस्तानी टिड्डियों के प्रजनन के लिए पाकिस्तान फ्रंट लाइन देश रहा है. भारतीय सीमा से सटे पाक के सिंध और दक्षिणी पंजाब के थारपारकर, खिपरो और चोलिस्तान क्षेत्रों में टिड्डियां गर्मी के मौसम में प्रजनन करती हैं. प्रजनन के इस समय का सीधा संबंध मानसून के मौसम से भी है.

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यूएन के एफएओ ने इस नक्शे से पाकिस्तान में टिड्डियों के प्रजनन केंद्रों को समझाया है.


हर साल बदलती हैं लोकेशनें
संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं ​कृषि संस्थान एफएओ के मुताबिक टिड्डियों के प्रजनन की पाकिस्तान में ये लोकशनें और पैमाने मानसून की बारिश के समय और स्वभाव के कारण हर साल कुछ बदल जाते हैं. जब बेतहाशा सक्रियता न हो, तब सामान्य रूप से टिड्डियों के दल सिंधु घाटी के कृषि क्षेत्रों में नहीं देखे जाते. पाकिस्तान से सटे भारतीय राज्य राजस्थान में गर्मी के मौसम में टिड्डियां प्रवेश करती हैं.

गर्मियों में पाक में कैसे पनपती हैं टिड्डियां?
बसंत के मौसम के समय का प्रजनन हर साल टिड्डियां बलूचिस्तान में करती हैं. फरवरी और मार्च के आसपास कराची के पश्चिमी यानी तटीय क्षेत्र से ईरान की सीमा तक का इलाका टिड्डियों के अनुकूल होता है. ये टिड्डियां तुरबत से दलबंदीन के साथ ही खारान घाटी तक अपने ठिकाने बनाती हैं लेकिन क्वेटा अज्ञैर चगाई हिल्स की तरफ बहुत कम देखी जाती हैं.

बलूचिस्तान में प्रजनन के ठिकाने हर साल बारिश की टाइमिंग, जगहों और अवधि के हिसाब से बदलते हैं. अगर अप्रैल में बसंत के मौसम की बारिशें खत्म होती हैं, तो जून तक मौसम टिड्डियों के लिए अनुकूल रहता है. वहीं, कराची के पश्चिम में लासबेला और उथल क्षेत्र टिड्डियों के ट्रांज़िशन ज़ोन्स हैं जहां टिड्डी दल हर समय हो सकते हैं.

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First published: May 28, 2020, 2:15 PM IST
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