अफ्रीका में टिड्डियां बनीं महामारी, भगवान की मर्ज़ी या डरावना विज्ञान?

अफ्रीका में टिड्डियां बनीं महामारी, भगवान की मर्ज़ी या डरावना विज्ञान?
किसानों को डर, कहीं टिड्डियां खराब ने कर दें उनकी फसल. (फाइल फोटो)

टिड्डी दल (Locust Swarm) के हमले भारत (India) में समस्या बन रहे हैं लेकिन पूर्वी अफ्रीका (East Africa) में महामारी बन चुके हैं, जिससे किसान तबाह हो रहे हैं. पिछले कई महीनों से बार बार आसमान इतना काला हो जाता है कि अफ्रीकी किसानों की उम्मीद सवाल बन जाती है कि उसके पीछे ईश्वर है कि नहीं? जानिए कि अफ्रीका में इतनी तबाही की वजहें क्या हैं.

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पूर्वी अफ्रीका में टिड्डियों के दल (Locusts Swarms) का हमला महामारी की शक्ल अख्तियार कर चुका है. सैकड़ों अरबों की तादाद में टिड्डियों के दल यानी बड़े शहर के बराबर झुंड पूर्वी अफ्रीका (Eastern Africa) की फसलों पर पसरे पड़े हैं. इथोपिया (Ethiopia) में पिछले 25 सालों में यह सबसे बड़ा हमला है, तो केन्या (Kenya) में पिछले 70 सालों में इतना खतरनाक हमला (Locusts Attack) ​टिड्डियों ने कभी नहीं किया. लेकिन क्या आप जानते हैं कि इसके पीछे कारण क्या है? टिड्डियों के आपदा बन जाने के पीछे एक डरावना विज्ञान (Science) है.

'ये भगवान की सेना है और यही उनकी इच्छा है...'

रेगिस्तानी टिड्डियों के ये दल कितने खतरनाक होते हैं और कितना कहर बरपाते हैं, इस बारे में आप न्यूज़18 के इस​ लिंक पर पढ़ सकते हैं. अब हम आपको विशेषज्ञों के हवाले से बताते हैं कि पूर्वी अफ्रीका में प्लेग कहे जा रहे टिड्डियों के इस आतंक के पीछे भगवान की मर्ज़ी है या एक भयानक विज्ञान है.



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1. मिट्टी का नैरेटिव : मनुष्यों के भोजन पर सेंध?
जब टिड्डियों के दल झुंड में रहने की प्रवृत्ति विकसित कर लेते हैं, तब ये मुख्य रूप से कार्बोहाइड्रेट वाले भोजन पर निर्भर करने लगते हें. विशेषज्ञों ने दक्षिण अमेरिकी टिड्डियों पर किए अध्ययन में यह पाया है, हालांकि अभी अफ्रीका में रेगिस्तानी ​टिड्डियों पर फील्ड टेस्ट बाकी हैं. झुंड बन जाने वाली टिड्डियों को अनाजों पर टूट पड़ना भाता है, जो मनुष्यों का भोजन का मुख्य स्रोत है.

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खेत का जायज़ा लेती एक केन्याई किसान महिला. (फाइल फोटो)


भगवान की मर्ज़ी या इंसान के गुनाह?
विज्ञान क्या कहता है? जिस मिट्टी से लगातार फसलें ली जा चुकी हैं और जो ज़रूरत से ज़्यादा चराई जा चुकी है, उसमें से नाइट्रोजन गायब हो चुकी है. इसकी वजह से प्रोटीन तो मिट्टी में है नहीं इसलिए कार्बोहाइड्रेट बहुलता वाली घासें पैदा होती हैं. ये स्थितियां किसानों के लिए बड़ी मुसीबत बन चुकी हैं. अब इससे जुड़कर बात को समझना ज़रूरी है.

ग्लोबल लोकस्ट इनिशिएटिव के शोध समन्वयक रिक ओवर्सन के हवाले से वायर्ड ने अपने लेख में लिखा है कि बाइबल और कुरआन में कहा गया कि 'आकाश में अंधेरा कर देने वाले और न जाने कहां से आने वाले टिड्डियों के इन दलों का निष्क्रिय पीड़ित मनुष्य रहा है.' लेकिन, विज्ञान के नज़रिये से देखा जाए तो टिड्डियों के दलों के बढ़ते हमलों के पीछे हम मनुष्य सक्रिय रूप से ज़िम्मेदार हैं.


2. पानी का नैरेटिव : कैसे पनपे टिड्डियों के दल?
अफ्रीका में टिड्डियों के मौजूदा आतंक की यह कहानी साल 2018 में शुरू हुई थी. संयुक्त राष्ट्र के एफएओ के मुताबिक उस साल मई में अरबी प्रायद्वीप में चक्रवाती तूफानों के कारण भारी बारिश हुई. मई के तूफान से ही इतना पानी हो गया कि अगले छह महीनों के लिए रेगिस्तानी हरियाली उपजी. इस पर टिड्डियों की दो पीढ़ियां ​जीवन गुज़ार सकती थीं. इसके बाद अक्टूबर के तूफान के कारण टिड्डियों को प्रजनन और पनपने के लिए और कुछ महीनों का आधार मिल गया. यहां से ये खतरनाक हुईं और साल 2019 से अफ्रीका को निशाना बनाया.

ग्लोबल ढांचा कैसे हुआ फेल?
चक्रवातों के चलते ओमान और यमन जैसे दूरदराज के एकदम अविकसित इलाकों में टिड्डियों ने अपनी आबादी बढ़ाई. एफएओ के विशेषज्ञ कीथ क्रेसमैन के मुताबिक मानव संसाधन और उपग्रहों के माध्यम से संस्था टिड्डियों के दलों के संकट को लेकर निगरानी रखती है, लेकिन इस मामले में नाकाम साबित हुई. मॉनिटरिंग नेटवर्क ध्वस्त हो गया. क्रेसमैन के मुताबिक किसी को नहीं पता था कि धरती के इस दूरस्थ इलाके में तब क्या हो रहा था.

इस इलाके में कुछ नहीं है, सड़कें नहीं हैं, कोई इन्फ्रास्ट्रक्चर नहीं है, फेसबुक नहीं, कुछ भी नहीं है. कुछ है तो रेत के बड़े बड़े टीले हैं, जो स्काईस्क्रेपरों से कम नहीं हैं.


साल 2018 के आखिर में जब ओमान में लोगों ने टिड्डियों के दलों को देखा तब कहीं जाकर क्रेसमैन की संस्था तक खबर पहुंची और अलर्ट स्थिति बनी. लेकिन तब तक देर हो चुकी थी. यहां से टिड्डियों के दल यमन और ईरान तक पहुंच चुके थे. और ओमान से लगातार टिड्डियों के दल निकलते हुए सामने आ रहे थे. युद्धग्रस्त रहे यमन के पास टिड्डियों के हमले से लड़ने के लिए फोर्स न होने का संकट था और किसानों के लिए वहां स्थिति भयावह थी.

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बीते मार्च अप्रैल में पूर्वी अफ्रीका में भारी बारिश टिड्डियों के लिए वरदान साबित हुई. (फाइल फोटो)


फिर भारी बारिश ने और बड़ी की समस्या
यमन में इन स्थितियों के दौरान भारी बारिश हुई और टिड्डियों के दलों को प्रजनन के साथ ही और पनपने का अनुकूल वातावरण मिल गया. पिछले बसंत और गर्मियों के मौसम में टिड्डियों की आपदा यहां से सोमालिया पहुंची और उसके बाद इथोपिया और केन्या में कहर टूटा. बीते मार्च अप्रैल में पूर्वी अफ्रीका में भारी बारिश हुई, जो फिर टिड्डियों के लिए वरदान साबित हुई. कुछ ही महीनों के भीतर पूर्वी अफ्रीका दोबारा इस संकट से जूझ रहा है.

3. गर्मी का नैरेटिव : मनुष्यों पर भारी पड़ेंगी टिड्डियां?
ग्लोबल वॉर्मिंग के चलते होगा ये कि समुद्रों में चक्रवाती तूफान जल्दी और तेज़ आएंगे. इससे टिड्डियों के दलों को पनपने के लिए नम आबोहवा मिलेगी, जो इनके लिए बेहद अनुकूल है. दूसरी तरफ, क्लाइमेट चेंज को देखें तो बिन मौसम की बरसातें भी टिड्डियों के लिए फायदेमंद ही साबित होंगी.

ग्लोबल लोकस्ट इनिशिएटिव के प्रयोगों में पाया जा चुका है कि ऑस्ट्रेलियाई आपदा लाने वाली टिड्डियों ने एक महीने तक ​बगैर पानी के अस्तित्व बचाए रखा. यानी गर्म और सूखे के मौसम के साथ भी अनुकूलता बनाने में ये टिड्डियां सक्षम हैं. एक तरफ नमी में तेज़ी से पनपने वाले इस पतंगे के लिए लगातार गर्म होती धरती पर भविष्य बड़ा सुरक्षित दिख रहा है.


तो क्या इनसे निपटा नहीं जा सकेगा?
एफएओ के क्रेसमैन के मुताबिक इन टिड्डियों का सामना करना हमले के समय बहुत मुश्किल है क्योंकि ये बहुत बड़े इलाके में फैली हैं. लेकिन पहले इनका सामना किया जा सकता था. पूर्वी अफ्रीका के संदर्भ में क्रेसमैन के हवाले से फरवरी में बीबीसी ने लिखा था 'अगर कुछ देशों में टिड्डी दलों पर बेहतर ढंग से नियंत्रण किए जाने की कोशिश की जाती तो ये मसला इतना गंभीर नहीं होता. इस महामारी की रोकथाम बेहतर नियंत्रण और मॉनिटरिंग पर निर्भर करती है.' यानी तीन महीने बाद इन्हीं क्रेसमैन ने माना कि मॉनिटरिंग सिस्टम फेल हुआ.

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विशेषज्ञों ने माना कि बेहतर नियंत्रण किया जाता तो समस्या इतनी विकराल नहीं होती. (फाइल फोटो)


अब जैसी भगवान की मर्ज़ी..!
आखिरकार मनुष्य प्रकृति के खिलाफ है, प्रकृति का दुश्मन बना है और अब इसका खमियाज़ा खुद भुगत रहा है. सवाल ये है कि अब विज्ञान के सहारे मनुष्य बच पाएगा या वो होनी होगी, जो मनुष्य के लिए अनहोनी हो? साल 1960 में आसमान काला हो गया था और सूरज भी नहीं दिख रहा था... वो याद करते हुए उत्तर पूर्व केन्या के 68 वर्षीय किसान अली बिला वाको के हवाले से बीबीसी ने लिखा -

'टिड्डियों ने ज़्यादातर फसल चट कर दी जो उनसे बच गई, वो सूख गई. बहुत दुख होता है क्योंकि हमने अपनी आंखों से फसल देखी थी लेकिन हम उसे इस्तेमाल नहीं कर पाए... ये भगवान की सेना है, यही उनकी मर्ज़ी है..!'

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