Everyday Science : आखिर प्लास्टिक को कितनी बार रीसाइकिल किया जा सकता है?

प्रतीकात्मक तस्वीर Pixabay से साभार.
प्रतीकात्मक तस्वीर Pixabay से साभार.

प्लास्टिक आप कहां फेंकते हैं? रीसाइकिल किए जाने वाले कचरे के नीले रंग के डस्टबिन (Blue Dustbin) में? तमाम फैक्ट्स जानिए और ये भी याद रखिएगा कि भारत में प्लास्टिक रीसाइकिलिंग (Plastic Recycling Plant) की सुविधाएं बहुत कम और बहुत मामूली दर्जे की हैं.

  • News18Hindi
  • Last Updated: October 22, 2020, 3:00 PM IST
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आप जानते हैं कि प्लास्टिक पर्यावरण के लिए नुकसानदायक (Anti Environment) है. कई शहरों, राज्यों और कुछ देशों ने भी इस तरह की पहल की है कि प्लास्टिक के इस्तेमाल (Plastic Use) पर प्रतिबंध लगाए गए हैं. समुद्री कचरे (Oceanic Waste) से जलीय जीवन (Aqua Culture) को प्लास्टिक से खतरा हुआ है तो धरती पर भी मनुष्यों की सेहत (Health) से लेकर जानवरों तक को प्लास्टिक से नुकसान होने की बात आपको समय-समय पर पता चलती रही है. कई लोग मानते हैं कि प्लास्टिक तो बार बार रीयूज़ (Plastic Reuse) हो सकता है, ऐसा है तो फिर यह एनवायरनमेंट फ्रेंडली (Eco Friendly) क्यों नहीं है?

प्लास्टिक पॉलीमरों (Polymers) से बना होता है यानी आपस में जुड़े हुए बिल्डिंग ब्लॉक्स जैसी संरचना वाले मोनोमरों (Monomers) के द्वारा, जो लंबी और बार बार दोहराई जा सकने वाली परमाणुओं की चेन बनाते हैं. पॉलीमर को रीयूज़ेबल बनाने वाले ये मोनोमर वास्तव में हाइड्रोजन, कार्बन और आक्सीजन के परमाणुओं की तुलना में छोटी चेन बनाते हैं. अब होता यह है कि उत्पादन की प्रोसेस में इसमें पिगमेंट्स, रिटार्डेंट्स और एंटीऑक्सीडेंट्स जैसे केमिकल मिलाए जाते हैं ताकि प्लास्टिक को मनचाहे आकार, रंग और तापमान पर प्रोसेस किया जा सके.

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कितना रीसाइकिल हो सकता है प्लास्टिक?
अब ये समझिए कि प्लास्टिक रीसाइकिल कैसे किया जाता है. ज़्यादातर रिसाइकिलंग प्लांट्स प्लास्टिक वेस्ट को बारीक टुकड़ों में तोड़कर पिघलाते हैं ताकि इसे दोबारा किसी प्रोडक्ट में ढाला जा सके. लेकिन इस प्रक्रिया के बाद यानी रीसाइकिल हुआ प्लास्टिक क्वालिटी में कमज़ोर हो जाता है. इसके पीछे भी वैज्ञानिक कारण है.

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न्यूज़18 ग्राफिक्स


रीसाइकिलिंग प्रोसेस में पहले तो पॉलीमर टूटते हैं और दूसरे प्लास्टिक में पहली बार जो केमिकल या मिलावट की गई होती है, रीसाइकिलिंग के दौरान उसमें से वो मिलावट करना तकरीबन असंभव हो जाता है इसलिए वो अपने ओरिजनल रूप में रीसाइकिल होता ही नहीं है.

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अब होता ये है कि रीसाइकिल किए हुए प्लास्टिक को उपयोग लायक बनाने के लिए इसमें फिर वर्जिन मटेरियल मिलाया जाता है. इस तरह कोई प्रोडक्ट तैयार होता है. इसका मतलब यह हुआ कि प्लास्टिक को जब दो या तीन बार रीसाइकिल किया जाता है, तो उसके बाद उसकी क्वालिटी इतनी खराब हो जाती है कि वह इस्तेमाल के लायक नहीं रह जाता.

साइंस कर रहा है रिसर्च
प्लास्टिक के उलट कांच और एल्युमीनियम में ऐसा नहीं होता. रीसाइकिल प्रोसेस के दौरान इनकी क्वालिटी खराब नहीं होती और इन्हें अनगिनत बार यानी हर बार रीसाइकिल किया जा सकता है. प्लास्टिक को भी बार बार रीसाइकिल किए जाने लायक बनाने के लिए वैज्ञानिक ऐसे फॉर्मूले को ढूंढ़ने के लिए काम कर रहे हैं, जिससे प्लास्टिक के ओरिजनल मोनोमर बचे (इस प्रोसेस को ‘depolymerisation’ कहते हैं) रह सकें.

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दूसरी रिसर्च इस पर भी चल रही है कि प्लास्टिक पॉलीमर के उस तरह के नये टाइप खोजे जाएं, जिनमें से केमिकल ए​डिटिव्स या मिलावटों को आसानी से दूर किया जा सके. फिलहाल तो कई प्लास्टिक ऐसे हैं, जिन्हें एक बार भी रीसाइकिल नहीं किया जा सकता. बहरहाल, अगर ये रिसर्च रंग लाईं तो हो सकता है कि कांच, एल्युमीनियम और धातुओं की तरह प्लास्टिक को भी बार बार रीसाइकिल किया जा सकेगा.

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प्लास्टिक वेस्ट न केवल भारत बल्कि कई देशों के लिए बड़ा सिरदर्द बना हुआ है.


कागज़ की रीसाकिलिंग भी लिमिटेड है
प्ला​स्टिक के अलावा, कागज़ के साथ भी ऐसी गलतफहमी जुड़ी है कि इसे भी कई बार रीसाइकिल किया जा सकता है. जबकि कागज़ के साथ भी ऐसा ही होता है कि रीसाइकिल प्रोसेस में यह कमज़ोर होता जाता है. कागज़ फाइबरों से बनता है इसलिए रीसाकिलिंग के दौरान ये फाइबर कमज़ोर और छोटे होते जाते हैं.

कुल मिलाकर एक प्रिंटर पेपर को पांच से सात बार तक रीयूज़ किया जा सकता है. इसके बाद फाइबर इतने छोटे और कमज़ोर हो जाते हैं कि इस्तेमाल के लायक नहीं रह जाते. हालांकि इसके बाद यह पेपर पेस्ट के तौर पर रीयूज़ होता है, जिसका इस्तेमाल कार्टनों के लिए रॉ कागज़ तैयार करने या रद्दी की और चीज़ों में हो सकता है.
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