जानिए बुध ग्रह की लंबी पूंछ का रहस्य, इसे क्यों उपयोगी मानते हैं वैज्ञानिक

बुध ग्रह (Mercury) की लंबी पूंछ (Long Tail) बहुत से लोगों के लिए एक रहस्य है. (प्रतीकात्मक तस्वीर: Pixabay)

बुध ग्रह (Mercury) की लंबी पूंछ (Long Tail) बहुत से लोगों के लिए एक रहस्य है. (प्रतीकात्मक तस्वीर: Pixabay)

बुध ग्रह (Mercury) के बारे में बहुत कम लोग जानते हैं कि उसकी भी धूमकेतुओं (Comet) की तरह एक लंबी पूंछ (Long Tail) दिखाई देती है. वैज्ञानिक इस पूंछ के जरिये बुध के बारे में काफी कुछ जान सकते हैं.

  • News18Hindi
  • Last Updated: January 7, 2021, 8:37 PM IST
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आम धारणा है कि अंतरिक्ष (Space) दिखाई देने वाले पिंडों में से पूंछ (Tails) केवल धूमकेतु (Comet) की होती है. लेकिन कई बार कुछ पिंडों को देखने पर लगता है कि उनकी पूंछ है जबकि ऐसा होता नहीं है तो कई बार कुछ की पूंछ उसी प्रक्रिया से बनती है जिससे धूमकेतु की बनति है. ऐसा ही कुछ बुध ग्रह के साथ हो रहा है. खगोलविदों को बुध ग्रह (Mercury) की पूंछ दिखाई दे रही है.

लाखों किलोमीटर तक जाती है पूंछ

बुधग्रह की यह पूंछ एक धूमकेतु की पूंछ सी दिखाई देती है जो इस ग्रह से लाखों किलोमीटर दूर जाती दिखाई देती है. इस पूंछ का रंग हलकी पीले-नारंगी रोशनी के जैसा दिखाई देता है. वैज्ञानिकों के अनुसार इसमें कोई बहुत बड़ा रहस्य नहीं हैं. इसकी वजह सौरमंडल में उसकी स्थिति है.

सौर विकिरण और सौर पवन की बारिश
बुधग्रह हमारे सौरमंडल का सबसे पहले और सूर्य के सबसे नजदीक का ग्रह है.  उसकी सूर्य से दूरी हमारी पृथ्वी और सूर्य के बीच की दूरी की आधी से भी कम है. यह औसत दूरी 58 करोड़ किलोमीटर की है. इतनी दूरी पर छोटे घनी और पथरीले ग्रह पर लागातार सौर विकिरण और सौर पवनों की बारिश होती रहती है.

बुध के हालात भी

इस तथाकथित पूंछ के निर्माण के लिए केवल इतना ही काफी नहीं है. बुध ग्रह का भार पृथ्वी के भार का 5.5 प्रतिशत है. गुरुत्वाकर्षण के तौर पर यह बहुत ताकतवर पिंड नहीं है. ना ही इसकी मैग्नेटिक फील्ड में कोई उल्लेखनीय ताकत है. यह भी पृथ्वी की  मैग्नेटिक फील्ड की एक ही प्रतिशत है. यही वजह है कि इस ग्रह में वायुमंडल जैसी कोई चीज नहीं के बराबर है.



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बुध ग्रह (Mercury) की लंबी पूंछ (Long Tail) की एक वजह सूर्य के उसके बहुत पास होना भी है. (प्रतीकात्मक तस्वीर: Pixabay)


बुध का बाह्यमंडल

बुध के बाह्यमंडल (Exosphere) में मुख्यतया ऑक्सीजन, सोडियम, हाइड्रोजन, हीलियम और पोटैशियम के परमाणु सौर पवनों से टकराते रहते हैं और साथ ही उन पर महीन उल्कापिंडों (micrometeoroid) की बौछार भी होती रहती है. यह बाह्यमंडल ग्रह के गुरुत्व से तो बंधा है, लेकिन यह इतना बिखरा और विरल है कि यह गैस जैसे बर्ताव देखने को नहीं मिलते. इन सबसे यह कहा जा सकता है कि बुध की सतह को सौर विकिरण और पवनों से ना के बराबर सुरक्षा मिलती है.

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कैसे बनती है धूमकेतु की पूंछ

सौर विकिरण का दबाव पड़ता है. इस दबाव का उपयोग अंतरिक्ष यानों की यात्रा के लिए भी किया जाता है. यही विकिरण ही धूमकेतुओं को उनकी पूंछ देता है. जब धूमकेतु सूर्य के पास आते हैं, तो धूमकेतु के अंदर की बर्फ को साफ करते हुए उसकी धूल को धूमकेतु से दूर ले जाती है. इसी धूल से से पूंछ का निर्माण होता है, जहां गैस को आकार सौर पवनों के मैग्नेटिक फील्ड से मिलता है और पूंछ सूर्य से दूर जाती दिखाई देती है. यह धूमकेतु का खुद का चरित्र नहीं बल्कि उसके तारे के पास आने से होता है.

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इस पूंछ (Tail)से बुध ग्रह (Mercury) के बारे में बहुत सारी जानकारी मिल सकती है. (प्रतीकात्मक तस्वीर: Pixabay)


तो बुध पर कैसे बनती है पूंछ

बुध ग्रह पर भी बर्फ है लेकिन उसकी वजह से यह पूंछ नहीं बनती. इसकी पूंछ का प्रमुख कारण सोडियम के परमाणु हैं ये परमाणु तब चमकते हैं जब सूर्य के पराबैंगनी विकिरण इन्हें आयनीकृत कर देते हैं. बिलकुल इसी तरह की प्रक्रिया पृथ्वी के वायुमंडल में ऑरोर का निर्माण करती है. बुध पर यही प्रक्रिया उसके धूमकेतु के जैसे दिखने का कारण है जिसकी पूंछ 35 लाख किलोमीटर लंबी दिखाई देती है.

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वैसे तो शुक्र और चंद्रमा की भी पूंछ दिखाई देती है, बुध की पूंच खास है क्योंकि अलग अलग मौसम में इसके अध्ययन से बुध के बाह्यमंडल के मौसम की जानकारी मिल सकती है. इसके अलावा सौर ज्वाला और कोरोनल मास इजेक्शन (CME) के बुध पर प्रभाव से ग्रह के बारे में जानकारी निकाल सकते हैं. वैज्ञानिकों को लगता है कि इससे बाह्यग्रहों का अध्ययन करने में भी मदद मिल सकती है.
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