SURVEY: अब भी फंसे हैं 67% प्रवासी कामगार, 55% तुरंत घर जाना चाहते हैं

SURVEY: अब भी फंसे हैं 67% प्रवासी कामगार, 55% तुरंत घर जाना चाहते हैं
अपने घरों को पैदल लौटते प्रवासी मज़दूर. फाइल फोटो.

Shramik Special ट्रेनों के बारे में लगातार खबरें आप तक पहुंच रही हैं, लेकिन असहाय कामगारों (Stranded Workers) की समस्याएं सुलझाने के लिए बने एक एक्शन नेटवर्क ने अपनी ताज़ा रिपोर्ट में जो खुलासे किए हैं, उनके मुताबिक Trains में सुविधाएं न के बराबर हैं और ऐसे कई मज़दूर हैं, जो एक वक्त के खाने के लिए भी मजबूर हो गए हैं.

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Coronavirus के चलते हुए Lockdown की मार झेलने पर मजबूर प्रवासी मज़दूरों (Migrant Workers) के लिए एक तरफ सरकार श्रमिक ट्रेनों को राहत करार दे रही है तो दूसरी तरफ Report है कि 67% फीसदी अब भी फंसे हैं. ये लोग घरों को लौटना चाहते हैं लेकिन इनके पास कोई साधन नहीं. इन प्रवासी कामगारों से लगातार संवाद और मदद कर रही एक संस्था ने ताज़ा रिपोर्ट में इन मज़ूदरों से जुड़े मौजूदा संकटों (Crisis) को आंकड़ों के तौर पर बताया गया है.

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ट्रेनों की व्यवस्था होने के बावजूद ये लोग इतने परेशान क्यों हैं? इसका जवाब स्वान की रिपोर्ट में मज़दूरों की शिकायतों के हवाले से इस तरह दिया गया है कि मज़दूरों के मालिकों और यात्रा को लेकर अनिश्चितता है, ट्रेनों को लेकर कोई पूर्व सूचना नहीं है, यात्रा रजिस्ट्रेशन और प्रवासी शेल्टरों में मुश्किलें हैं, ट्रेनों में पानी और खाने को लेकर सुविधाएं न के बराबर हैं, कई जगहों के लिए ट्रेनें हैं ही नहीं और फिर टिकटों की कीमतें.



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रिपोर्ट : 74% प्रवासी कामगारों के पास अब कोई रोज़गार नहीं है. फाइल फोटो.

100 रुपए भी नहीं, कैसे जूझ रहे हैं प्रवासी मज़दूर?
प्रवासी मज़दूरों के मौजूदा संकटों पर Stranded Workers Action Network (SWAN) की तीसरी और ताज़ा रिपोर्ट के मुताबिक 7 बिंदुओं में स्थितियां देखिए.

1. 15 मई से 1 जून तक संस्था ने देश भर में 5911 प्रवासी मज़दूरों से संपर्क किया तो पाया कि 80% को अब सरकारी राशन नहीं मिल सका. 63 फीसदी लोग तो ऐसे हैं जिनके पास 100 रुपए से भी कम बचे.
2. रिपोर्ट तैयार किए जाने तक मिली सूचनाओं के मुताबिक कहा गया ​कि करीब 57% लोगों के पास पैसे या राशन नहीं था और वो पिछले वक्त का भोजन नहीं कर सके थे.
3. लॉकडाउन की घोषणा के वक्त, 67% प्रवासी जहां थे, वहीं फंसे हुए हैं. जो लोग फंसे हुए हैं, उनमें से 55% फौरन अपने घरों को लौटना चाहते हैं.
4. काम के लिए अपने घरों को छोड़कर आए जो लोग फंस गए हैं, उनमें से 74% के पास अब कोई रोज़गार नहीं है.

85% को घर जाने के लिए पैसे देने पड़े!
5. जिन प्रवासी मज़दूरों ने यात्रा की, उनमें से 85% से ज़्यादा लोगों को यात्रा के लिए कीमत चुकाना पड़ी. इनमें से दो तिहाई लोगों को 1000 रुपए से ज़्यादा चुकाने पड़े.
6. जो लोग यात्रा पर निकले, उनमें से 44% को बसें लेना पड़ीं और 39% को श्रमिक स्पेशल ट्रेनों में जगह मिली. 11% लोगों ने ट्रकों, लॉरियों व अन्य साधनों के ज़रिये यात्रा की. वहीं, 6% को पैदल ही चलते रहना पड़ा.
7. स्वान ने सर्वे में पाया कि 1559 वर्करों में से 80% को लॉकडाउन के दौरान गुज़ारे के लिए कर्ज़ लेना पड़ा. इनमें से करीब 15% को 8000 रुपए से ज़्यादा का कर्ज़ लेना पड़ा.

SWAN ने की 34 हज़ार कामगारों से बातचीत
शहरों और महानगरों में बेरोज़गार हो जाने के बाद लॉकडाउन के हालात में अपने घरों को निकले और अपनी जगहों पर ही फंस गए प्रवासी मज़दूरों के हालात जानने के लिए SWAN ने देश भर में करीब 34 हज़ार ऐसे लोगों से संपर्क करने के बाद लगातार रिपोर्ट्स प्रकाशित की हैं. सरकारी दावों के बरक्स इन रिपोर्टों के हवाले से इन मज़ूदरों की स्थितियां वाकई दुखद दिखती हैं.

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रिपोर्ट: 85 फीसदी प्रवासी कामगारों को घर की यात्रा के लिए कीमत चुकाना पड़ी. फाइल फोटो.


पैदल सफर क्यों? ट्रेनों में क्या रही कसर?
जिनके पास काम और पैसा नहीं बचा, उनमें से जिन 11% लोगों ने ट्रकों, लॉरियों आदि से सफर किया, उनका कहना था कि ट्रेनों में इतनी भीड़ थी कि उससे सफर करना मुमकिन नहीं था. वहीं, 6% पैदल सफर ​पर मध्य प्रदेश, झारखंड, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, हरियाणा, राजस्थान, कनार्टक और उत्तर प्रदेश के लिए निकले क्योंकि इनके पास कोई अन्य साधन नहीं बचा था.

दूसरी तरफ, सरकार ने आरोग्य सेतु एप अनिवार्य तो यिका लेकिन रिपोर्ट में कहा गया कि लोग जब ट्रेनों से घरों को पहुंचे तो किसी तरह की स्वास्थ्य संबंधी स्क्रीनिंग नहीं हुई. इसके अलावा, सरकार ने प्रवासी मज़दूरों को समय समय पर भोजन और ज़रूरी चीज़ें देने का वादा किया था लेकिन सड़कों पर मिले लोगों से बातचीत के आधार पर कहा गया कि 80% को सरकारी राशन नहीं मिला था.

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