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राष्ट्रपति के पास संसद से पास बिल को रोकने की शक्ति किस तरह होती है?

राष्ट्रपति के पास संसद से पास बिल को रोकने की शक्ति किस तरह होती है?

भारत के राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद.

भारत के राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद.

राष्ट्रपति (President of India) किसी बिल को पास करने के लिए बाध्य नहीं होता. आपको उस घटना के बारे में भी बताते हैं, जब राष्ट्रपति ने अपने विशेष अधिकार का प्रयोग किया था और संसद (Parliament of India) द्वारा पास बिल को रोक दिया था.

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    संसद के दोनों सदनों (Parliament Houses) से पास किए गए कृषि सुधार बिल (Farm Bills) को लेकर घमासान मचा रहा कि इसे राष्ट्रपति की मंज़ूरी मिलेगी या नहीं... और अंतत: राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद (Ramnath Kovind) ने इसे मंज़ूर कर ही लिया. इस बिल से खासा असंतोष जन्मा है और कुछ जगहों पर इसके विरोध (Protest) की चर्चा जारी है. ऐसे में, आपके लिए जानने की बात यह है कि क्या संसद से पास बिल को मंज़ूरी देना राष्ट्रपति के लिए अनिवार्य होता है? यदि नहीं, तो किन शक्तियों (Powers of President) के तहत राष्ट्रपति किस तरह के कदम उठा सकते हैं?

    राष्ट्रपति संसद का ही अंग होता है और कोई भी बिल बिना उसकी अनुमति के सदन में नहीं लाया जा सकता. विधायिका की किसी कार्यवाही को कानून बनने से रोकने की जो ताकत संविधान राष्ट्रपति को देता है, उसे वीटो पावर के नाम से जाना जाता है. आर्टिकल 111 में भारत का संविधान राष्ट्रपति को तीन प्रकार के वीटो देता है.

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    दिल्ली स्थित संसद भवन.


    (1) पूर्ण वीटो – संसद की तयशुदा प्रकिया से पास बिल राष्ट्रपति के पास आने पर (संविधान संशोधन बिल के अलावा) तो वह अपनी मंज़ूरी या नामंज़ूरी दे सकता है, लेकिन यदि अनुच्छेद 368 (सविधान संशोधन) के अंतर्गत कोई बिल आये तो वह उसे नामंज़ूर नहीं कर सकता.

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    हालांकि भारत में अब तक राष्ट्रपति ने इस वीटो का प्रयोग मंत्रिपरिषद के मशवरे के बगैर नहीं किया है. यह भी माना जाता है कि ब्रिटेन की पद्धति का पालन करते हुए भारत में भी इस तरह की सलाह के बगैर राष्ट्रपति ऐसा कर भी नहीं सकता.

    (2) निलम्बनकारी वीटो – संविधान संशोधन या धन बिल के अलावा कोई भी बिल अगर संसद से राष्ट्रपति के पास भेजा गया हो तो राष्ट्रपति इसे पुर्नविचार के लिए संसद को वापस कर सकता है. लेकिन, संसद यदि इस बिल को दोबारा राष्ट्रपति के पास भेज दे, तो राष्ट्रपति को मंज़ूरी देना ही पड़ती है. इस वीटो को राष्ट्रपति अपने विवेक से इस्तेमाल कर सकता है.

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    इस वीटो का प्रयोग संसद सदस्यों के वेतन बिल भत्ते तथा पेंशन नियम संशोधन 1991 के मामले में तब हुआ था जब तत्कलीन राष्ट्रपति रामस्वामी वेंकटरमन ने इस आधार पर इस वीटो का प्रयोग किया था कि यह बिल बगैर उनकी अनुमति के लोकसभा में लाया गया था.

    (3) पॉकेट वीटो – संविधान राष्ट्रपति को बिल मंज़ूर या नामंज़ूर करने के लिए कोई तय समय नहीं देता. यह बहुत अहम बात है. इसका मतलब है कि यदि राष्ट्रपति किसी बिल पर कोई फैसला न देना चाहे (सामान्य बिल, न कि धन या संविधान संशोधन) तो माना जाएगा कि राष्ट्रपति अपने पॉकेट वीटो का इस्तेमाल कर रहा है. यह शक्ति भी राष्ट्रपति के स्वयं के विवेक पर तय होती है.

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    ज्ञानी ज़ैल सिंह और राजीव गांधी का एक दुर्लभ चित्र.


    जब राष्ट्रपति ने किया पॉकेट वीटो का प्रयोग
    भारतीय डाक बिल 1984 के मामले में तत्कालीन राष्ट्रपति ज्ञानी ज़ैल सिंह के पॉकेट वीटो को खासी सुर्खियां मिली थीं. चूंकि इस बिल के कारण प्रैस की स्वतंत्रता बाधित होती दिख रही थी इसलिए सिंह ने इसे बेमियादी ढंग से रोक लेने वाला रास्ता यानी पॉकेट वीटो का इस्तेमाल किया. हालांकि यह राजीव गांधी सरकार द्वारा दोनों सदनों से पास होकर राष्ट्रपति तक पहुंचा था. बहरहाल, 1990 में वीपी सिंह सरकार ने इस बिल को वापस लिया था.

    पंजाब राज्य के गठन संबंधी PEPSU अप्रोप्रिएशन बिल का किस्सा भी दिलचस्प रहा था. पंजाब, हरियाणा और हिमाचल के कुछ हिस्सों को मिलाकर जो प्रांत था, उसे पटियाला एवं पूर्वी पंजाब राज्य संघ यानी PEPSU कहा गया था और 1954 में यहां राष्ट्रपति शासन था. इसी प्रांत के गठन के लिए जब संसद ने बिल भेजा था, तब तक राष्ट्रपति शासन हट चुका था और राज्य का सीमांकन विधानसभा का मामला हो गया था. तब तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने वीटो का इस्तेमाल किया था.

    Tags: Indian Parliament, President of India, Ram Nath Kovind

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