जानिए कैसे हवा में ही राफेल जैसे लड़ाकू विमानों में भरा जाता है ईंधन

जानिए कैसे हवा में ही राफेल जैसे लड़ाकू विमानों में भरा जाता है ईंधन
फ्रांसीसी राफेस लड़ाकू विमान में हवा में ही ईंधन भरने की सुविधा है जो बहुत कम लड़ाकू विमानों में होती है.

राफेल विमान (Rafale plane) को जब भारत लाया गया तो रास्ते में दो बार फ्रांसीसी विमानों ने हवा में उसमें ईंधन (Refuelling) भरा, जो एक जटिल प्रक्रिया है.

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हाल ही में फ्रांस (France) से पांच राफेल जेट्स भारत पहुंचे. 7000 किमी का सफर तय करने के दौरान उनमें दो बाद ईंधन (Fuel) भरा गया. यह ईंधन जमीन से 30 हजार फुट ऊपर भरा गया था. इसके लिए फ्रांस के खास टैंकर (Tanker) का उपयोग किया गया. राफेल लड़ाकू विमानों के आने से भारतीय वायुसेना (IAF) की ताकत बहुत बढ़ गई है. इसमें वहां में ईंधन भरने (Air Refuelling) की क्षमता के भी बहुत फायदे हैं.

दो बार रीफ्यूलिंग हुई इन विमानों की
पाचों राफेल जेट्स ने फ्रांस के बोर्डाक्स शहर के एरपोर्ट के मेरिगनैक एयरबेस से 27 तारीख को उड़ान भरी. इसके सात घंटे के बाद ये राफेल यूएई के अल डाफ्रा एयर बेस उतरे. यह पूरे सफर के दौरान एकमात्र पड़ाव था. इसके बाद ये 29 जुलाई को दोपहर को भारत के अंबाला एयरबेस पर उतरे. इस बीच इन विमानों की रीफ्यूलिंग फ्रांस के ही दो A330 फोनिक्स MRTT रीफ्यूलिंग प्लेन्स के जरिए हवा में दो बार हुई. इनकी तस्वीरें भी सोशल मीडिया में साझा की गई थीं.

क्या फायदा होता है हवा में ही ईंधन भरने से
राफेल विमानों की खासियतें बहुत सारी है जिसकी वजह से उसने हमारी वायुसेना की क्षमताओं में बहुत बड़ा इजाफा किया है. इन खूबियों में से एक यह है कि इन विमानों में हवा में भी ईंधन भरा जा सकता है जिसकी वजह से इसकी 3,700 किमी तक जाने की क्षमता और आगे तक बढ़ सकती है. इसी क्षमता के कारण ही 7000 किमी के सफर में दो बार इन विमानों में ईंधन भरना पड़ा.





किन चीजों की जरूरत होती है इसमें
विमानों में हवा में ही ईंधन भरने को एरियल रीफ्यूलिंग, एयर रीफ्यूलिंग, इन फ्लाइट रीफ्यूलिंग (IFR) या एयर टू एयर रीफ्यूलिंग (AAR) कहा जाता है. इसमें दो विमानों की भूमिका होती है. एक वह जिसमें ईंधन भरा जाना है और दूसरा वह जिससे ईंधन भरा जाना है जिसे टैंकर प्लेन कहते हैं. इसके साथ एक नली (Hose or Pipe), जिसे प्रोब कहा जाता है, की भी जरूरत होती है जिससे ईंधन टैंकर से विमान तक जाता है. इस प्रोब के साथ आखिर में एक बाल्टी (Bucket) जुड़ी होती है जिसे ड्रोग (Drogue) कहते हैं. दोनों को मिला कर प्रोब एंड ड्रोग सिस्टम (Probe and Drogue System)) कहते हैं.

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कैसे भरा जाता है ईंधन
पहले प्रोब को ड्रोग के साथ टैंकर विमान के विंग पॉड से छोड़ा जाता है जिससे यह लड़ाकू विमान तक पहुंच सकते इसकी दूरी 25 मीटर से ज्यादा होती है. इसके बाद अपने विमान के एक छोटा सा प्रोब ड्रोग से जोड़ने के लिए विमान को थोड़ा सा आगे बढ़ाता है जिससे की ईंधन भरा जा सका. एक बार सभी चीजों की स्थितियां सटीक हो जाएं, फ्यूल वाल्व खुल जाता है और ईंधन फाइटर प्लेन में पहुंचना शुरू हो जाता है. टैंक भरने की स्थिति में लड़ाकू विमान अपने गति धीमी करता है और ड्रोग से दूर हो जाता है जिससे फ्यूल वाल्व बंद हो जाता है और दोनों विमानों का संपर्क भी खत्म हो जाता है.

Rafale Jet
भारत ने करीब दो दशक बाद नये बहुद्देशीय पांच राफेल लड़ाकू विमानों की पहली खेप बुधवार को प्राप्त की. (Photo Credit- IAF)


किन बातों का रखा जाता है ध्यान
रीफ्यूलिंग की प्रक्रिया पहले से नियोजित की जाती है, लेकिन आपातकाल में भी अचानक समन्वय करके यह प्रक्रिया की जा सकती है.  इसमें विमानों की गति अहम होती है. दोनों को 20 से 30 फीट की ऊंचाई पर रखा जाता है. लेकिन ऊंचाई की शर्त जरूरी नहीं हैं. राफेल में अन्य ऊंचाइयों पर भी रीफ्यूलिंग संभव है.

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राफेल विमान के ये विमान कुछ महीनों बाद भारत पहुंचने वाले थे, लेकिन भारत चीन के बीच लद्दाख सीमा पर हुए विवाद के बाद भारत ने फ्रांस से इन विमानों की पहली खेप जल्दी देने को कहा जिसे मानते हुए फ्रांस ने पांच विमान बुधवार को भारत तक पहुंचा दिए.
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