नास्तिक चीन और पोप के वेटिकन के बीच कैसे, कितने सुधर रहे हैं रिश्ते?

चीन और वेटिकन के बीच एक डील होने की खबरें हैं. (File Photo)
चीन और वेटिकन के बीच एक डील होने की खबरें हैं. (File Photo)

कम्युनिस्ट सत्ता (Communism) के गढ़ और ईसाइयों (Christianity) की धर्म नगरी (Holy See) के बीच पिछले 70 सालों से जो रिश्ते बिगड़े हुए थे, वो बहाली की तरफ जा रहे हैं. लेकिन इन रिश्तों की बहाली में किस पर क्या दबाव हैं और अमेरिका (USA) क्यों गुस्से में हैं? ये जानना चाहिए.

  • News18India
  • Last Updated: September 23, 2020, 3:38 PM IST
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अमेरिका (United States of America) फिर नाराज़ है. ​नाराज़गी की वजह फिर चीन है. इस बार वजह धर्म से जुड़ी है. वेटिकन और चीन के बीच रिश्ते (China-Vetican Relations) जमे हुए थे, लेकिन अब बर्फ पिघल रही है. अब भी 'प्रायोगिक' तौर पर ही सही, लेकिन पोप (Pope Francis) ने एग्रीमेंट को आगे बढ़ाने की मंज़ूरी दी है. एग्रीमेंट (Vetican-China Agreemnet) के मुताबिक चीन अब पोप की सत्ता स्वीकारेगा और बदले में पोप चीनी बिशपों (Chinese Bishop) को मान्यता देंगे. चीन के विदेश मंत्रालय ने इशारे दिए कि वेटिकन के साथ उसके संबंध सुधर रहे हैं. कैसे? क्या डील है? और क्यों अमेरिका नाराज़ है?

अमेरिका क्यों है इस डील से खफा?
पोप फ्रांसिस लगातार कोशिश में रहे हैं कि चीन के साथ वेटिकन के रिश्ते बेहतर हो सकें ताकि चीन में रहने वाले करीब 1.2 ईसाइयों का भला हो सके. लेकिन ताज़ा कोशिशों से अमेरिका को झटका लगा है क्योंकि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप आगामी चुनावों के मद्देनज़र अपने प्रचार अभियानों में चीन में धार्मिक आज़ादी न होने के मुद्दे पर निशाना साधते रहे हैं.

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ट्रंप के सचिव माइक पॉम्पियो ने ​पिछले दिनों अमेरिका की धार्मिक पत्रिका फर्स्ट थिंग्स में लेख लिखते हुए चीन में सभी धर्मों के अनुयायियों के साथ 'भयानक बर्ताव' किए जाने की बात कहकर कड़ी आलोचना की थी. इस लेख में वेटिकन और चीन के बीच हुई डील को लेकर भी नैतिक आधार पर सवाल खड़े किए गए थे.



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पोप फ्रांसिस. (File Photo)


क्या है ये प्रोविज़नल डील?
चीन और वेटिकन के बीच काफी बहस के बाद 22 सितंबर 2018 को एक अस्थायी समझौता हुआ था, लेकिन इसके बाद भी इस समझौते को गति नहीं मिल सकी थी. अल जज़ीरा की एक रिपोर्ट कहती है कि यह इतनी गुप्त डील है कि इसके बारे में वास्तविक डिटेल्स पता नहीं चले हैं, इसलिए यह रहस्यमयी हो गई है. लेकिन इसका मुख्य बिंदु यही है कि चीन में कैथोलिक बिशपों की नियुक्ति में चीन और वेटिकन दोनों का दखल होगा.



क्यों हुई यह चीन-वेटिकन डील?
चीन में करीब सवा करोड़ कैथोलिक ईसाई पिछले कई दशकों से बंटे हुए थे. कुछ सरकारी मशीनरी के तहत चलने वाली संस्थाओं में शामिल थे, जिनमें नास्तिक कम्युनिस्ट पार्टी पादरियों को चुनती रही और कुछ वेटिकन के वफादार रहकर अनधिकृत ढंग से अंडरग्रांउड रहे और वेटिकन चर्च से जुड़े रहे. इन ईसाइयों को चीन में प्रताड़नाएं भी झेलना पड़ी क्योंकि ये पोप की सत्ता को ही स्वीकारते रहे.

दूसरी तरफ, पिछले दिनों खबरें थीं कि चीन बिशपों की कमी का सामना कर रहा है. 98 धर्मक्षेत्रों में से करीब एक तिहाई में कोई बिशप नहीं है. जितने हैं, वो वृद्ध हो चुके हैं और रिटायरमेंट के करीब हैं.

क्या है चीन में धार्मिक स्थिति?
कम्युनिस्ट पार्टी की सत्ता में चीन घोषित रूप से एक नास्तिक देश है, लेकिन यहां कई संप्रदायों के अनुयायी रहते हैं. इस बारे में कई सर्वे हो चुके हैं, जिनमें से सबसे प्रामाणिक CFPS के 2014 के सर्वे को माना जाता है. इसके मुताबिक चीन में 15.87% लोग बौद्ध, 5.94% अन्य धर्मों, 0.85% ताओवादी, 2.53% ईसाई (2.19% प्रोटेस्टैंट और 0.34% कैथोलिक) और 0.45% लोग मुस्लिम हैं.

इसके अलावा, प्यू रिसर्च सेंटर के 2010 के सर्वे की मानें तो 21.9% चीनी आबादी क्षेत्रीय धर्मों को मानती है, तो 18.2% बौद्ध, 5.1% ईसाई और 1.8% इस्लाम में विश्वास रखती है. इसी तरह, फिल ज़करमैन के सर्वे में कहा गया था कि 1993 तक 59% चीनी आबादी धार्मिक नहीं थी. जबकि साल 2005 में 8% से 14% ही नास्तिक बचे. इन तमाम सर्वेक्षणों के बाद भी समय समय पर चीन पर धार्मिक दमन के आरोप लगते रहे हैं.

इस डील से क्या नतीजा?
संबंध सुधार की दिशा में इस डील के बाद फौरन पोप फ्रांसिस ने उन 8 चीनी बिशपों को मान्यता दी, जिन्हें कम्युनिस्ट पार्टी ने बगैर वेटिकन की मंज़ूरी के ही नियुक्त किया था. दूसरी तरफ, दुनिया के करीब 1.3 अरब ईसाइयों के प्रमुख धार्मिक नेता पोप की सहमति के बाद चीन में 2 नये बिशपों की नियुक्ति भी की गई. पिछले 70 सालों में यह भी पहली बार इसी साल हुआ कि चीनी और वेटिकन के विदेश मंत्री सार्वजनिक तौर पर मिले.

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पोप फ्रांसिस ने चीनी बिशपों का स्वागत किया था, तब यह तस्वीर चर्चित हुई थी.


कितने सुधर गए संबंध?
चीन की सरकार पर नास्तिक होने और अन्य धर्मों के प्र​ति दमन के कठोर रवैये अपनाने के आरोपों के साये में इस डील से चीन और वेटिकन के संबंध कितने बेहतर हो गए या हो सकते हैं? इस बारे में कैथोलिक चर्च के विशेषज्ञ फादर बर्नार्डो सर्वेलेरा ने इसी महीने एक धार्मिक न्यूज़ एजेंसी को बताया था कि इस डील से फिलहाल मामूली सा ही फर्क दिख रहा है.

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बर्नार्डो ने यह भी उम्मीद जताई थी कि चीन के साथ समझौते करने में वेटिकन थोड़ा दबदबे वाला रवैया अपनाएगा और अपनी बात मनवाने की कोशिश करेगा. इसकी वजह यह है कि हाल में, खबरों में कहा गया था कि पोप फ्रांसिस ने चीन की ओर से नियुक्त पादरियों को मान्यता इस डर के बावजूद दी कि चीन इसका इस्तेमाल आधिकारिक चर्च से असंबद्ध श्रद्धालुओं की पहचान कर कार्रवाई में कर सकता है. दूसरी तरफ, पोप के करीबियों ने भी माना है कि अब तक डील से कोई बड़ा नतीजा सामने नहीं आया है.

कैसे रहे चीन-वेटिकन संबंध?
चीन में कम्युनिस्ट सत्ता आने के दो साल बाद, 1951 से ही चीन और वेटिकन के बीच कूटनीतिक संबंध बहुत खराब होने लगे थे. दोनों के बीच संबंध सुधार की जो कवायद चल भी रही थी, वो इसलिए भी बाधित होती रही क्योंकि वेटिकन ने ताईवान के साथ कूटनीतिक संबंध बनाए रखने की बात जारी रखी.

यह बहुत महत्वपूर्ण बात है कि पूरे यूरोप में सिर्फ ​वेटिकन के साथ ही ताईवान के कूटनीतिक संबंध हैं क्योंकि कई देश ताईवान को स्वतंत्र सत्ता मानने के बजाय चीन का ही हिस्सा मानते हैं, चीन के दबाव के कारण ही. बहरहाल, अब इस डील के बाद एक तरफ पोप फ्रांसिस के राइट हैंड कहे जाने वाले पीट्रो पैरोलिन के मुताबिक कैथोलिक चर्च का बड़ा मकसद यही है कि चीन में चर्च को जितना संभव हो, बहाल किया जा सके.
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