स्कूल ड्रॉपआउट न होते टैगोर तो क्या देश को मिल पाती एक बेहतरीन यूनिवर्सिटी?

विश्व भारती के संस्थापक रबींद्रनाथ टैगोर.

विश्व भारती के संस्थापक रबींद्रनाथ टैगोर.

रबींद्रनाथ टैगोर (Rabindranath Tagore) जब विश्व भारती यूनिवर्सिटी (Visva Bharati University) बना रहे थे, तो वो बगावत ही थी. खास तौर से अंग्रेज़ों की थोपी शिक्षा पद्धति को अंगूठा दिखाकर भारतीय संस्कृति को सींच रही इस संस्था को खड़ा करने वाला क्यों खुद कभी पढ़ाई में दिल नहीं लगा सका?

  • News18Hindi
  • Last Updated: December 24, 2020, 8:06 AM IST
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भारत की सबसे प्रसिद्ध यूनि​वर्सिटियों में शुमार विश्व भारती (Visva Bharati) अपनी औपचारिक स्थापना के 100वें वर्ष में प्रवेश कर रही है. इस मौके पर एक प्रमुख कार्यक्रम (Centenary Celebrations) में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पश्चिम बंगाल के शांतिनिकेतन में स्थित विश्व भारती के शताब्दी वर्ष समारोह में वक्तव्य (PM Narendra Modi Speech) देंगे. गुरुदेव रबींद्रनाथ टैगोर द्वारा स्थापित इस वि​श्वविद्यालय का इतिहास बेहद रोचक और महत्वपूर्ण रहा है. नोबेल विजेता (Nobel Prize Winner) टैगोर द्वारा स्थापित इस संस्थान को 1951 में केंद्रीय विश्वविद्यालय (Central University) का दर्जा मिलने के बाद से देश के प्रधानमंत्री ही यहां के चांसलर होते हैं.

इस यूनिवर्सिटी की स्थापना ज़रूर 1921 में औपचारिक तौर पर हुई, लेकिन इसकी शुरूआत 1863 में तब हो गई थी जब टैगोर सिर्फ 2 साल की उम्र के थे. इस तरह का एक लंबा और रोचक इतिहास इस विश्वविद्यालय के साथ जुड़ा है, लेकिन सबसे दिलचस्प बात यह है कि विश्व भारती को दुनिया के प्रमुख शिक्षण संस्थानों में स्थान दिलाने वाले टैगोर खुद कई बार स्कूल और कॉलेज में पढ़ाई छोड़ते रहे.

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जिसने स्कूल छोड़े, वो खुद बना यूनिवर्सिटी!


जी हां, अगर आप दुनिया या व्यवस्था के नज़रिये से कहें तो टैगोर अच्छे विद्यार्थी नहीं थे. उन्होंने कभी मैट्रिक पास नहीं किया था. इसके बावजूद शांतिनिकेतन आकर खुद ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी ने उन्हें डॉक्टरेट की उपाधि दी थी बल्कि आप जानते ही हैं कि भारत के पहले व्यक्तित्व टैगोर ही थे, जिन्हें नोबेल पुरस्कार से नवाज़ा गया था.

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इस तरह रहा dropout का सिलसिला
टैगोर पहली बार कलकत्ते के ओरिएंटल सेमिनरी स्कूल में भर्ती कराए गए थे, लेकिन 1868 में सात साल के नन्हे बच्चे के रूप में टैगोर इस ज़िद पर अड़ गए कि जिस स्कूल में सज़ा दी जाती थी, स्टूडेंट को छड़ी से पीटा जाता था, उस स्कूल में वो नहीं पढ़ेंगे. अंजाम यह हुआ कि महज़ एक महीने बाद ही टैगोर ने स्कूल छोड़ दिया.

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टैगोर ने सेंट ज़ेवियर स्कूल के समय को भी इसी तरह याद किया था कि 1876 में जब उन्हें वहां भर्ती करवाया गया, तो वहां भी टैगोर छह महीने ही रह पाए और उसके बाद स्कूल छोड़ दिया. लेकिन इस स्कूल की अच्छी यादें हमेशा टैगोर के साथ रहीं. खास तौर से फादर डेपेनरेंडा की हमदर्दी को वो कभी भूल नहीं सके. बाद में सेंट ज़ेवियर के प्रिंसिपल ने बताया था कि 1927 में टैगोर ने अपने स्कूल को जीसस क्राइस्ट की प्रतिमा भेंट की थी.

स्कूल के बाद भी औपचारिक शिक्षा में टैगोर का मन नहीं लगा. टैगोर के पिता देबेंद्रनाथ टैगोर चाहते थे कि रबींद्रनाथ बैरिस्टर बनें इसलिए उन्हें इंग्लैंड में 1878 में ईस्ट ससेक्स स्थित एक पब्लिक स्कूल में भर्ती कराया गया था. वहां कई महीने गुज़ारने के बाद टैगोर ने कुछ समय के लिए लंदन के यूनिवर्सिटी कॉलेज में पढ़ाई की, लेकिन फिर स्कूल छोड़ दिया.

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अभी सिलसिला खत्म नहीं हुआ था. टैगोर को प्रेसिडेंसी कॉलेज में भी एडमिशन दिलाया गया था, लेकिन सिर्फ ​एक दिन कॉलेज जाने के बाद टैगोर ने फिर कॉलेज का रुख नहीं किया. आखिर इस पूरी प्रवृत्ति का मतलब क्या था? क्या टैगोर को कोई मानसिक तकलीफ थी या फिर कारण कुछ और था?

आखिर क्यों टैगोर छोड़ते रहे स्कूल?
ओरिएंटल स्कूल में टीचर मनोज भट्टाचार्य और अंग्रेज़ी के टीचर चंदिका प्रसाद घोषाल के शब्दों में टैगोर के स्कूल छोड़ने के संस्मरणों में इस तरह की बातें कही गईं.

शायद बचपन से ही टैगोर को औपचारिक शिक्षा में, खासतौर से चार दीवारी में की जाने वाली पढ़ाई से कोफ्त रही थी... रबींद्रनाथ ने अगर अपनी औपचारिक शिक्षा पूरी की होती तो शायद वो सबसे बेहतरीन आईसीएस बनते. इस अर्थ में देश और दुनिया का नुकसान तो हुआ लेकिन यह भी है कि उनके औपचारिक शिक्षा पूरी न करने से फायदा ज़्यादा हुआ.


नोबेल पुरस्कार जीतने के 27 साल बाद 1940 में ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी खुद शांतिनिकेतन पहुंची थी और टैगोर को मानद उपाधि से सम्मानित किया था. वास्तव में टैगोर को खुले वातावरण में​ शिक्षा का​ विचार ज़्यादा सटीक लगता रहा. वो मानते थे कि चार दीवारी में पढ़ाई से दिमाग बंद होता है, खुलता नहीं है. दूसरी तरफ, वो शिक्षा की पश्चिमी पद्धति से भी सहमत नहीं थे, जो ​अंग्रेज़ों ने भारत में चला रखी थी.

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टैगोर का शिक्षा को लेकर विचार यही था कि हर व्यक्ति जीनियस है इसलिए सभी छात्रों को एक तरह से एक साथ नहीं शिक्षित किया जा सकता. उन्होंने विश्व भारती ने शिक्षण की नई तकनीकें खोजी थीं, जहां छात्र के मन और संतुष्टि के मुताबिक कोर्स, परीक्षा और व्यवस्थाएं तय की गई थीं. खुद टैगोर के शब्दों में 'मुझे याद नहीं कि मुझे क्या शिक्षा दी गई, लेकिन यह याद है कि मैंने क्या सीखा'.

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पढ़ाई से ज़्यादा सीखने वाली शिक्षा पद्धति पर ज़ोर देने वाले टैगोर ने भले ही स्कूल और कॉलेज छोड़े, लेकिन उन्होंने अपने आप साहित्य, कला और संस्कृति को लेकर इस दर्जे का अध्ययन किया कि उनकी विद्वता का लोहा विद्वानों को मानना पड़ा. कवि, संगीतकार, चित्रकार, विचारक और शिक्षाविद के साथ ही समाज सुधारक और राजनीतिक चिंतक के रूप में आप टैगोर को जानते ही हैं.
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