Everyday Science : स्क्रीन टाइम बच्चों के ओवरऑल विकास पर कैसे डालता है असर?

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क्या आपका बढ़ता बच्चा (Growing Child) टीवी, मोबाइल फोन (Mobile Phone) और लैपटॉप से चिपका रहता है? आपको पता है कि इसके कितने निगेटिव असर हो सकते हैं और कैसे? जानिए वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों (Scientists and Experts) ने ​अब तक रिसर्चों में क्या पाया है कि कितना स्क्रीन टाइम सही है..

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  • Last Updated: October 27, 2020, 2:54 PM IST
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शारीरिक, मानसिक, इमोशनल, व्यावहारिक और ज्ञान संबंधी डेवलपमेंट (Cognitive Development) के मुद्दे सीधे तौर पर इस सवाल से जुड़ते हैं कि बच्चे कितना समय स्क्रीन के सामने (Screen Time) और किस तरह बिताते हैं. सामान्य तौर पर बच्चे अपने आसपास के वातावरण से सीखते हैं और बड़ों, खास तौर से पैरेंट्स के व्यवहार (Parents Sets Example) से. अव्वल तो स्क्रीन टाइम का नुकसान यही होता ​है कि बच्चे आसपास के परिवेश से कट जाते हैं और उनकी गतिविधियां व बर्ताव स्क्रीन पर देखे गए अभिनय (Virtual Content) से प्रेरित होने लगते हैं, असली जीवन से नहीं. विज्ञान ने इस बारे में कई तरह से अध्ययन किया है.

सामान्य शब्दों में समझें तो एक बच्चा अगर ज़्यादा समय वर्चुअल वर्ल्ड यानी स्क्रीन के सामने बिताता है तो वह खेलकूद, व्यायाम, लोगों से मिलने, बातचीत करने और जीवन में काम आने वाली स्किल्स सीखने के लिए समय कम करता जाता है, जिससे उसका ओवरऑल विकास प्रभावित होता है. साइंटिफिक स्टडीज़ को भी जानेंगे, लेकिन पहले किस तरह विकास प्रभावित होता है, ये देखते हैं.

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भाषा पर असर : भाषा परिवार और समाज से हासिल होने चीज़ है, जिसमें ज्ञान और तौर तरीकों की जानकारी भी शामिल होती है. लेकिन स्क्रीन टाइम भाषा की समझ और भाषा के बरतने के तरीकों को प्रभावित करता है. भाषा के इस्तेमाल के वक्त चेहरे के हाव भाव और बॉडी लैंग्वेज भी स्क्रीन के अभिनय से प्रभावित होती है. स्टडीज़ ये भी कह चुकी हैं कि ज़्यादा स्क्रीन टाइम वाले बच्चों में पढ़ने की कम इच्छा और ध्यान न लगने की समस्या होती है.
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विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि बढ़ते बच्चों के स्क्रीन टाइम पर पैरेंट्स को निगरानी रखना चाहिए.


नींद पर असर : स्क्रीन से निकलने वाली किरणें और खास तौर से ब्लू लाइट से नींद से जुड़ी समस्याएं होती हैं क्योंकि स्लीप हॉर्मोन मेलाटॉनिन के रिसने में रुकावट होती है. धीरे धीरे यह आदत या समस्या कॉग्निटिव डेवलपमेंट को बाधित करता है. शिशुओं से लेकर बढ़ते बच्चों तक यह समस्या देखी जा चुकी है.

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इमोशन पर असर : कई तरह से बच्चे के इमोशनल बर्ताव प्रभावित होते हैं. डिजिटल मीडिया से बच्चे की कल्पना और मोटिवेशन लेवल प्रभावित होता है. बच्चों में इरिटेशन, फ्रस्ट्रेशन, चिंता और इंपल्सिव डिसॉर्डर्स भी स्क्रीन टाइम के नतीजों के तौर पर देखे जा चुके हैं. ये भी होता है कि बच्चे बोलने के सामान्य उतार चढ़ाव और असली एक्सप्रेशनों को समझ नहीं पाते और रियल वर्ल्ड में वो ठीक से कम्युनिकेशन और व्यक्ति की समझ बनाने में नाकाम रहते हैं.

क्यों होता हैं ये निगेटिव असर
वीडियो में बहुत तेज़ी के साथ दौड़ती तस्वीरें और साथ ही रंग भी अपना असर छोड़ते हैं. ज़्यादा स्क्रीन टाइम से आंखें और दिमाग एक तरह से आदी हो जाते हैं और दूसरे ​अर्थ में कुंद होने लगते हैं. स्वास्थ्य संस्थाओं के रिसर्चरों ने एबीसीडी यानी एडोलसेंट ब्रेन कॉग्निटिव डेवलपमेंट स्टडी में दो खास बातें नोट कीं:

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* जिन बच्चों का स्मार्टफोन, टैबलेट और वीडियो गेम्स आदि का टाइम दिन में सात घंटे या उससे ज़्यादा था, उनके एमआरआई स्कैन में देखा गया कि ब्रेन के कुछ हिस्सों में नॉर्मल ब्रेन से काफी अंतर था.
* एक दिन में दो घंटे से ज़्यादा के स्क्रीन टाइम वाले बच्चों को रिसर्चरों ने भाषा और सोच विचार से जुड़े जो टेस्ट दिए थे, उनमें उन्होंने कम स्कोर किया, बजाय उन बच्चों के जिनका स्क्रीन टाइम कम था.

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टीनेज से पहले दो घंटे का स्क्रीन टाइम सही कॉंटेंट के साथ ठीक माना गया है.


तो क्या है इसका हल?
'अति सर्वत्र वर्जयेत' का फॉर्मूला यहां भी लगाएं और पैरेंट्स अपने बच्चों के स्क्रीन टाइम को सीमित करने के साथ ही, यह भी ध्यान रखें कि स्क्रीन पर किस तरह के कॉंटेंट से बच्चे रूबरू होते हैं. संभव हो तो बच्चे के स्क्रीन टाइम के दौरान आप शामिल रहें और कॉंटेंट को लेकर सही समझ देने संबंधी बातचीत करते रहें. कैनेडा में कैलगैरी यूनिवर्सिटी में मनोविज्ञान विशेषज्ञ शेरी मैडिगन की बात को समझें :

जिन बच्चों का स्क्रीन टाइम ज़्यादा रहा, उनका विकास देर से देखा गया. हमें रिसर्च में पता चला कि करीब दो से तीन घंटे एक औसत समय है, जो बच्चे स्क्रीन के सामने बिता रहे हैं, लेकिन बा​ल चिकित्सा की एकेडमी के हिसाब से 5 साल के बच्चों तक के लिए एक घंटे से ज़्यादा स्क्रीन टाइम नहीं होना चाहिए.


विशेषज्ञ कहते हैं कि बढ़ते बच्चों के लिए आप स्क्रीन टाइम को एजुकेशनल प्रोग्राम के साथ अगर जोड़ पाएं तो यह सबसे अच्छा होता है. टीनेज से कम उम्र तक दो घंटे तक का क्वालिटी स्क्रीन टाइम विशेषज्ञ सुझाते हैं. ये खयाल भी रखें कि स्क्रीन टाइम के साथ ऑफलाइन टाइम के बीच संतुलन बनाएं. विशेषज्ञ सलाह देते हैं फैमिली टाइम, बेडटाइम और खाने के वक्त स्क्रीन से बच्चे दूर रहें इसलिए पैरेंट्स को इस समय में स्क्रीन नहीं देखना चाहिए.
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