क्यों अब देश में बहुत तेज़ी से बढ़ रहे हैं कोरोना केस और पीक?

क्यों अब देश में बहुत तेज़ी से बढ़ रहे हैं कोरोना केस और पीक?
देशी में तेज़ी से बढ़ रहे केसों के मुकाबले विशेषज्ञ टेस्टिंग को कम मान रहे हैं.

Lockdown की रणनीति थी कि Covid-19 के प्रकोप से जूझने के लिए देश में स्वास्थ्य सुरक्षा के ढांचे को मज़बूत किया जा सके, लेकिन Unlock के बाद केस अप्रत्याशित तेज़ी से बढ़ रहे हैं और Delhi व Mumbai जैसे महानगरों तक का Health Care System बेहाल साबित हुआ है. जानिए Corona Virus के खिलाफ भारत की पूरी तस्वीर कैसी है.

  • News18India
  • Last Updated: July 13, 2020, 12:54 PM IST
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बीते तीन हफ्तों के भीतर कोरोना Virus Transmission के हालात ऐसे रहे कि India दुनिया के सबसे ज़्यादा प्रभावित देशों की लिस्ट में छठे से तीसरे नंबर पर पहुंच गया. 8 लाख 78 हज़ार से ज़्यादा Confirmed Cases और 23 हज़ार से ज़्यादा मौतों के बाद चिंताजनक स्थिति ये है कि ढाई महीने पहले देश में जितने कुल मरीज़ थे, अब उतने रोज़ बढ़ रहे हैं. दूसरी तरफ, देश का हेल्थकेयर सिस्टम बुरी तरह से चरमराया हुआ नज़र आ रहा है.

महीनों लंबे लॉकडाउन के बावजूद लगातार केसों में इज़ाफा और Health Facility का पर्याप्त इंतज़ाम न हो पाना भारत के लिए मुश्किल हालात की कहानी बयान कर रहा है. COVID 19 के खिलाफ जंग में भारत किस तरह नज़र आ रहा है, यह देखना चाहिए.

देश में महामारी की एक नहीं कई 'पीक'
भारत में केसों के दोगुने होने का समय करीब तीन हफ्ते रह गया है, जो पहले इससे ज़्यादा दिनों का रह चुका. देश में रोज़ाना ढाई लाख से ज़्यादा नमूनों की जांच की जा रही है, लेकिन विशेषज्ञ इसे ताज़ा हालात के मद्देनज़र बहुत कम मान रहे हैं. विशेषज्ञों की नज़र में भारत में महामारी संबंधी 'पीक' को लेकर गलत धारणाएं हैं.
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न्यूज़18 क्रिएटिव


'पीक को लेकर देश में जो हौआ खड़ा किया जा रहा है, वो गलत ढंग का है. अस्ल में भारत में एक नहीं बल्कि पीक की एक पूरी कड़ी है.' बायोएथिक्स और वैश्विक स्वास्थ्य के शोधकर्ता डॉ. अनंत भान जब यह बात कहते हैं तो इसे इस तरह समझना चाहिए कि भारत की राजनीतिक और आर्थिक राजधानियों यानी दिल्ली और मुंबई में हम कई तरह के संकट देख रहे हैं.

दूसरी तरफ, देश के छोटे शहरों में महामारी पैर पसार रही है, जो और खतरनाक स्थिति है क्योंकि छोटे शहरों और गांव तक स्वास्थ्य सुविधाओं का दायरा और सीमित होता चला जाता है. और ये भी कि भारत में कोरोना से कुल मौतों का सही आंकड़ा कभी पता नहीं ​चलेगा, अगर ज़्यादा से ज़्यादा टेस्ट नहीं किए जा सकेंगे.

डेटा विश्वसनीय नहीं!
स्वास्थ्य मंत्रालय ने हाल में कहा कि भारत में हालात 'तुलनात्मक रूप से' काफी बेहतर हैं. कहा गया ​कि अमेरिका में जहां प्रति दस लाख आबादी पर 400 और ब्राज़ील में 320 मौतें हुई हैं, वहीं भारत में सिर्फ 13. वेल्लूर के मेडिकल कॉलेज में महामारी विशेषज्ञ डॉ. जयप्रकाश इस आंकड़े की विश्वसनीयता पर सवाल खड़ा करते हैं. 'कई जगहों पर मौतों की सही रिपोर्ट की व्यवस्था न होने से देश में मौतों का सही आंकड़ा जानना ही मुमकिन नहीं है.'

दूसरी तरफ, कोरोना वायरस से हुई मौतों में से 43% मामलों में आधिकारिक डेटा के हिसाब से 30 से 60 साल की उम्र के लोग थे. जबकि दुनिया में पाया गया कि यह वायरस ज़्यादा उम्र वालों के लिए ज़्यादा जानलेवा रहा. इस डेटा पर डॉ. जयप्रकाश का मानना है कि वृद्धों की मौतों के कई मामलों को वायरस से हुई मौतों से जोड़ने का तंत्र विकसित नहीं रहा या सही कारण पता ही नहीं चल सके.

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केंद्रीय स्तर पर तालमेल नहीं
भारत में लोक स्वास्थ्य सेक्टर राज्यों की व्यवस्था के अधीन है इसलिए ऐसी स्थिति है कि कुछ राज्यों में बेहतर हालात हैं तो कई राज्यों में बदतर. उदाहरण के लिए जहां भारत का पहला कोरोना पॉज़िटिव केस पाया गया था, उस केरल ने कोविड के खिलाफ जिस तरह जंग लड़ी, उसे मॉडल माना गया. दूसरी तरफ, दिल्ली की व्यवस्था राज्य के साथ ही केंद्र के अधीन है और यहां के हालात पूरी कहानी बताते हैं.

लॉकडाउन में ढील के बाद तेज़ी से राष्ट्रीय राजधानी में केस बढ़े. कोविड डेडिकेटेड अस्पतालों से मरीज़ों को मना किए जाने के बाद उनकी मौत होने के मामले सामने आए. अस्पतालों की क्षमताओं को लेकर सवाल खड़े हुए. केंद्रीय गृह मंत्रालय को दखल देना पड़ा और फिर इस दखल को ​लेकर विवाद होते रहे. कुल मिलाकर, दिल्ली में राज्य और केंद्र के बीच तालमेल को लेकर बड़ा झमेला रहा.

'सेंट्रल कॉर्डिनेशन की कमी खलती रही. नीतिगत फैसलों में डेटा का सही ढंग से इस्तेमाल नहीं किया जाना भारत की अक्षमता दर्शाता रहा. कहा गया कि महामारी ने हमारे सिस्टम की कई दरारों को उघाड़कर रख दिया लेकिन अब यह कहना सही है कि ये दरारें नहीं बल्कि गहरी खाइयां हैं.'
जिश्नु दास, जॉर्जटाउन यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर


केंद्र में है ही नहीं महामारी?
अर्थव्यवस्था की चिंता केंद्र विचार में है. इसके लिए केंद्र सरकार हर संभव कोशिश कर रही है. दूसरी तरफ, चीन के साथ सीमा पर तनाव की स्थिति भी प्राथमिकता का विषय है. विशेषज्ञों की मानें तो कई मोर्चों पर एक साथ जूझ रही केंद्र सरकार के सामने लॉकडाउन से बढ़ी बेरोज़गारी, वंचित वर्गों तक पहुंची महामारी और पलायन के बाद मज़दूरों के सामने खड़ी हुई समस्याएं प्राथमिकता में नहीं हैं.

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भारत में महामारी की ताज़ा स्थिति पर केंद्रित सीएनबीसी की रिपोर्ट में कहा गया है कि यह भी अब तक स्पष्ट नहीं है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी किस तरह विकराल हो रहे संक्रमण और मौतों के साथ डील करने वाले हैं.

दुनिया भर की जंग में भारत की भूमिका?
कोविड 19 के खिलाफ दुनिया भर में टीके की खोज को लेकर तेज़ी का माहौल है, जो भारत में भी नज़र आ रहा है. देश में कम से कम सात टीके क्लीनिकल ट्रायल के स्तर पर हैं, जिनमें से एक भारत बायोटेक कंपनी और देश की शीर्ष मेडिकल रिसर्च संस्था आईसीएमआर मिलकर बना रहे हैं. इस टीके को लेकर जल्दबाज़ी किए जाने को लेकर पिछले दिनों काफी विवाद खड़ा हुआ.

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देश के आधिकारिक डेटा यानी नीति आयोग के दावों की मानें तो भारत रोज़ाना करीब 1000 वेंटिलेटर और 6 लाख पीपीई किट का निर्माण कर रहा है और इन आंकड़ों के लिहाज़ से चीन के बाद भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा किट मेकर है. सरकारी आंकड़े ये भी कह रहे हैं कि देश में रिकवरी रेट 63 फीसदी के करीब पहुंच गई है.

लेकिन, विशेषज्ञों की चिंता और सवाल यही है कि आंकड़ों के विश्वसनीय न होने, डेटा के अपर्याप्त होने और टेस्टिंग समेत कई स्वास्थ्य सुविधाओं के ज़रूरत से बहुत कम होने के बीच इस तरह के आंकड़ों का औचित्य कितना है. महामारी को पहली प्राथमिकता पर रखते हुए देश को पूरी शिद्दत से इसके खिलाफ जुटना होगा, तभी आने वाले बड़े संकट पर कुछ काबू की उम्मीद की जा सकेगी.
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