महायुद्ध के बाद से मंदी के 12 दौर से अमेरिका कैसे जूझा?

महायुद्ध के बाद से मंदी के 12 दौर से अमेरिका कैसे जूझा?
अमेरिका में मंदी के दौर का लंबा इतिहास रहा है.

दूसरे विश्वयुद्ध के बाद से अमेरिका (America) ने मंदी के कई दौर देखे हैं. 2009 में आखिरी बार मंदी के दौर से गुज़रे अमेरिका के बारे में अर्थशास्त्रियों का अनुमान है कि कोरोना वायरस (Corona Virus) वैश्विक महामारी के कारण अमेरिका के सामने बड़ा ​आर्थिक संकट (Economic Crisis) है, जो एक दशक लंबे आर्थिक विकासरथ के पहिए थाम लेगा.

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अर्थव्यवस्था (Economy) के जानकारों की मानें तो मंदी (Recession) वह समय होता है, जब आर्थिक विकास (Economic Growth) सिकुड़ने लगता है और यह सिकुड़न कम से कम दो तिमाहियों तक जारी रहे, तो इसे मंदी करार दिया जाता है. जानिए कि 1945 में दूसरे विश्वयुद्ध (World War 2) के खत्म होने के बाद से अब तक यानी कोविड 19 (Covid 19) के महामारी बनने से पहले तक 12 बार ऐसे मुश्किल हालात से कैसे अमेरिका (USA) ने सामना किया.

1945: वरदान से अभिशाप तक
दूसरा विश्वयुद्ध जारी था इसलिए अमेरिका ने अरबों डॉलर युद्ध की ज़रूरतों के उत्पादन सेक्टर में लगाए थे, लेकिन 1945 में जर्मनी और जापान के आत्मसमर्पण कर देने से यह पूरा निवेश सूख गया. अर्थव्यवस्था बुरी तरह डूबी और जीडीपी में 11 फीसदी तक की गिरावट दर्ज हुई. बेरोज़गारी की दर 1.9 फीसदी रही लेकिन उत्पादन सेक्टर ने उबरने में आशंका से कम वक्त लिया और 8 महीने में मंदी के दौर पर काबू पा लिया गया.

1948-49: ग्राहकों का धीमा रुख
विश्वयुद्ध खत्म होने के बाद जब जीवन सामान्य हुआ और प्रतिबंध हटे तो अमेरिकियों ने जीवन में लौटने के लिए दिल खोलकर खर्च किया. 1945 से 49 तक अमेरिकियों ने 2 करोड़ फ्रिज, 2.14 करोड़ कारें और 55 लाख स्टोव खरीदे थे. लेकिन, 1948 के अंत तक यह खर्च थमने लगा क्योंकि जीवन सामान्य स्तर पर पहुंच गया था. जीडीपी में 2 फीसदी की गिरावट और अक्टूबर 1949 में बेरोज़गारी की दर 7.9 फीसदी दर्ज हुई.



1953-54: वित्तीय नीति का संकट
जैसा दूसरे विश्वयुद्ध के बाद हुआ था, वैसा ही कोरियाई युद्ध के बाद हुआ यानी अमेरिका ने युद्ध क्षेत्र में जो निवेश किया था, वह शुष्क हो गया. 10 महीने की मंदी के दौर में जीडीपी में 2.2 फीसदी की गिरावट दर्ज हुई तो बेरोज़गारी की दर मई 1954 में 6 प्रतिशत रही. इस मंदी का प्रमुख कारण ब्याज दरों संबंधी फेडरल रिज़र्व की वित्तीय नीतियों को माना गया.

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1957 में महामारी के समय हेलिकॉप्टर से कई स्थानों पर वैक्सीन पहुंचाई गई थी.


1957-58: एशियन फ्लू महामारी
1957 में एशियन फ्लू महामारी हांगकांग से भारत होते हुए अमेरिका और यूरोप में फैली, जिसके चलते कम से कम दस लाख मौतें हुई थीं. इस महामारी से वैश्विक मंदी का दौर आया था. फिर एक बार फेड ने महंगाई से लड़ने के लिए ब्याज दरें बढ़ाईं जिससे ग्राहकों में असंतोष पैदा हुआ और अमेरिकी अर्थव्यवस्था ने फिर आठ महीने की मंदी देखी. जीडीपी में 3.3 फीसदी की गिरावट और बेरोज़गारी दर 6.2 फीसदी दर्ज हुई. लेकिन, कंस्ट्रक्शन और इन्फ्रास्ट्रक्चर पर निवेश के चलते इस मंदी से निजात पाई गई.

1960-61: कैनेडी की जीत निक्सन की हार
सिर्फ दो साल बाद ही अमेरिका ने एक और मंदी देखी. रिचर्ड निक्सन ने आरोप लगाया कि अगर वह चुनाव जीतते तो ऐसा नहीं होता. इस बार मंदी के दो कारण बताए जाते हैं. पहला ये कि विदेशी वस्तुओं का मार्केट बढ़ा तो अमेरिकी उद्योगों खासकर आटोमोबाइल सेक्टर 'रोलिंग एडजस्टमेंट' पर गईं, जिससे लाभ कुछ समय के लिए घटा. दूसरा कारण फेड का फिर ब्याज दरें बढ़ाना रहा.

दस महीने की इस मंदी में जीडीपी 2.4 फीसदी टूटी और बेरोज़गारी की दर करीब 7 फीसदी रही. कैनेडी ने सामाजिक सुरक्षा और बेरोज़गार भत्तों जैसे कदम उठाकर निक्सन पर मंदी का ठीकरा फोड़कर उबरने का क्रेडिट लिया.

1969-70: महंगाई का नतीजा
मंदी के पिछले दौर के बाद से करीब एक दशक में महंगाई 5 फीसदी तक बढ़ गई थी, जिसके कारण फेड के फिर ब्याज दरें बढ़ाने से एक और मंदी का दौर आया. हालांकि इस बार करीब साल भर की मंदी बहुत खतरनाक नहीं रही. जीडीपी में 0.8 फीसदी की गिरावट दर्ज हुई और बेरोज़गारी 5.5 फीसदी रही. फेड ने 1970 में जब ब्याज दरें घटाईं तब जाकर अर्थव्यवस्था पटरी पर लौटी.

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1973 में मंदी के दौर में फिलाडेल्फिया के एक रेस्तरां ने यह कागज़ चस्पा कर रेस्तरां बंद किया कि ऊर्जा संकट के कारण बंदी के आदेश हैं.


1973-75: तेल ने निकाला तेल
ग्रेट डिप्रेशन के बाद से यह मंदी का सबसे लंबा दौर रहा. ओपेक यानी तेल निर्यात करने वाले अरब देशों के व्यापारिक अवरोध के चलते अमेरिका में ऊर्जा संकट पैदा हुआ. इसी वक्त राष्ट्रपति निक्सन ने महंगाई पर काबू के लिए कीमत निर्धारण के तरीके अपनाए जिससे उद्योगों ने कर्मचारियों को नौकरी से निकाला. इसका नतीजा यह हुआ कि मुद्रास्फीति से मंदी पैदा हुई और अगली पांच तिमाहियों पर खराब असर देखा गया. 16 महीनों की इस मंदी में जीडीपी 3.4 फीसदी गिरी तो बेरोज़गारी की दर 8.8 फीसदी पहुंच गई.

1980: ऊर्जा संकट और महंगाई
ईरानी क्रांति के चलते दुनिया भर में तेल की मांग बढ़ी और तेल की कीमतें आसमान पर पहुंच गई. अमेरिका फिर मंदी की चपेट में था. महंगाई 13.5 फीसदी बढ़ गई तो फेड ने फिर ब्याज दरें बढ़ा दीं. 1970 के दशक में दिखा आर्थिक बूम थम गया. छह महीनों की इस मंदी में जीडीपी 1.1 फीसदी गिरी और बेरोज़गारी की दर 7.8 फीसदी रही.

1981-82: डबल डिप मंदी
1980 की मंदी के तुरंत बाद आने की वजह से मंदी के इस दौर अमेरिकियों ने डबल डिप मंदी कहा. पिछले एक दशक में तीसरी बार तेल संकट मंदी की वजह रहा. फेड ने 1982 में कठोरता से ब्याज दरें 21.5 फीसदी तक बढ़ा दीं. लेकिन, आर्थिक संकट तो 16 महीनों में आया ही और जीडीपी में 3.6 फीसदी उतार दिखा और बेरोज़गारी दर बेतहाशा यानी 10 फीसदी तक बढ़ी.

1990-91: वित्तीस संस्थाएं फिर बनीं वजह
1980 के दशक के अंत तक बचत और कर्ज संबंधी हज़ारों संस्थाएं नाकाम हो गईं और गिरवी पर कर्ज का बाज़ार बेहद प्रभावित था. अमेरिका को फिर मंदी में धकेलने के लिए यह कारण काफी था कि तभी इराक ने कुवैत पर हमला बोल दिया तो खाड़ी युद्ध के कारण तेल की कीमतें दोगुनी हो गईं. अमेरिका में 1989 अक्टूबर में स्टॉक मार्केट में 'मिनी क्रैश' देखा गया. आठ महीने की इस मंदी में बेरोज़गारी दर 6.8 फीसदी रही और जीडीपी 1.5 फीसदी गिरी. बुरा प्रभाव यह ​कि अगली कई तिमाहियों में विकास दर बहुत धीमी रही.

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1990 की मंदी के दौरान बेरोज़गार माइक का यह चित्र काफी चर्चित हुआ था. इस कहानी की सभी तस्वीरें हिस्ट्री.कॉम से साभार.


2001: 9/11 और डॉट कॉम क्रैश
1990 के दशक में एक अनजान बाज़ार यानी इंटरनेट पर बेतहाशा निवेश हुआ जिससे यह नकली बूम उस स्तर तक बढ़ गया, जहां इसे बचाना नामुमकिन हुआ. डॉट कॉम बबल 2001 मे फटा और नैसडैक का मूल्य 75 फीसदी तक गिर गया. जो कसर बची थी, वह सितंबर के आतंकी हमले ने पूरी कर दी और अमेरिका फिर मंदी की चपेट में आया.

हालांकि यह मंदी तेज़ दिखी थी, लेकिन हल्की रही और इस दौरान जीडीपी में मामूली गिरावट दर्ज हुई और बेरोज़गारी दर 5.5 फीसदी दिखी. इसके बाद हाउसिंग सेक्टर में मज़बूती से इस मंदी पर काबू पाया गया.

2007-09: आखिरकार महामंदी
अमेरिका में मंदी के रिकॉर्ड पर आधारित हिस्ट्री.कॉम की रिपोर्ट पर आधारित इस लेख में अंतत: जानिए कि ग्रेट डिप्रेशन के बाद अब तक की सबसे बड़ी मंदी का दौर यही था और इसकी वजह खुद अमेरिका ही था. अमेरिका में हाउसिंग सेक्टर का जो गुब्बारा फुलाया जा रहा था, आखिर में वह फट गया और इससे बड़े निवेशकों को बड़ा नुकसान हुआ. नतीजतन, एसएंडपी 500 और डाउ जोन्स ने अपना आधा मूल्य गंवा दिया.

18 महीने लंबे इस मंदी दौर में बेरोज़गारी दर 10 फीसदी पर पहुंची और जीडीपी में 4.3 फीसदी का नुकसान हुआ. बैंकों और दुबक गई अर्थव्यवस्था में जान फूंकने के लिए डेढ़ ट्रिलियन डॉलर के राहत पैकेजों के बाद किसी तरह अर्थव्यवस्था को उबारा जा सका.

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