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1918 की महामारी के दौरान कैसे सम्मानित दवा बन गई थी व्हिस्की?

स्पैनिश फ्लू के दौरान व्हिस्की की लोकप्रियता के बाद इस तरह ब्रांड अपना ​प्रचार करते थे. चित्र सीएनएन से साभार.

स्पैनिश फ्लू के दौरान व्हिस्की की लोकप्रियता के बाद इस तरह ब्रांड अपना ​प्रचार करते थे. चित्र सीएनएन से साभार.

पिछले दिनों हमने देखा कि कोरोना वायरस (Corona Virus) के चलते लॉकडाउन (Lockdown) के दौरान देश में कई जगह शराब दुकानें (Liquor Shops) खोली गईं तो किस तरह के हालात बने. महामारी के दौरान प्रतिबंधों के चलते शराब की मांग किया जाना नई बात नहीं है. एक सदी पहले भी यही हुआ था और जानिए कि तब शराब दवा (Medicine) के तौर पर किस कदर चर्चित हुई थी.

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    एशियन फ्लू (Asian Flu), दुनिया में मनुष्यों के सामने संकट बनकर खड़ी हुई अब तक की सबसे बड़ी महामारी थी. पहले विश्वयुद्ध (World War) के आखिर आखिर यानी 1918 में फैली इस इन्फ्लुएंज़ा (Influenza) महामारी के वक्त अमेरिका में इसका इलाज किस तरह खोजा गया था? व्हिस्की (Whiskey)! जी हां, बस एक ही मुश्किल थी कि जब तक इस इलाज को लेकर लहर बनी, तब तक अमेरिका (USA) के कई राज्य प्रतिबंध लगा चुके थे और कानूनी तौर पर व्हिस्की ​हासिल करना कई जगह नामुमकिन हो गया था. जानिए इतिहास (History) के पन्नों से एक दिलचस्प कहानी.

    हममें से कुछ अफ़ीम के ज़रिये रास्ता खोजते हैं और कुछ ईश्वर के ज़रिये, हममें से कुछ व्हिस्की में ही हल पाते हैं तो कुछ प्यार में. क्या ये सब एक जैसे रास्ते हैं, जो कहीं नहीं पहुंचते?
    डब्ल्यू सॉमरसेट मॉगहम, प्रसिद्ध कवि व लेखक


    प्रतिबंधों के चलते राज्य ड्राय स्टेट बन चुके थे लेकिन लोग व्हिस्की के लिए तड़प रहे थे, गिड़गिड़ा रहे थे. इस तरह के दृश्यों को देखकर कुछ अधिकारियों ने रास्ता यह निकाला था कि प्रतिबंध के बाद से जो गैरकानूनी शराब ज़ब्त की गई थी, उसे कई स्टोरों के ज़रिये मुहैया करवाया जाए.

    क्यों बढ़ी थी ​व्हिस्की की मांग?
    व्हिस्की की रातों रात इस लोकप्रियता की वजहें थीं, कुछ अमेरिकी अखबारों की वो खबरें, जिनमें कहा गया कि आर्मी कैंपों में सैनिकों को फ्लू की मार से बचाने के लिए मिलिट्री डॉक्टर ज़ब्त की हुई व्हिस्की के सेवन की सलाह दे रहे हैं. और ये खबरें ज़िक्र करती थीं कि डॉक्टर ऐसे निर्देश आयवा में दे रहे हैं, जहां 500 सैनिक मारे जा चुके थे और सैकड़ों को फ्लू के जोखिम के चलते लौटाया गया था.

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    व्हिस्की और शराब की लोकप्रियता को लेकर इस तरह की खबरें और विज्ञापन 1918-19 में छप रहे थे.


    आर्मी पर खड़े हुए सवाल?
    सेना पर इस बारे में सवाल खड़े हुए तो सेना ने चुप्पी साध ली. दूसरी ओर प्रतिबंधों के समर्थक खेमों ने दावा किया कि अगर अखबारों की इस तरह की कहानियां पूरी तरह झूठ नहीं हैं तो बढ़ा चढ़ाकर ज़रूर रची गई हैं. इन कहानियों को 'जर्मनों का प्रोपेंगेंडा' भी कहा गया ताकि अमेरिकी सैनिक अल्कोहल से बीमार हो जाएं.

    लेकिन शराब चीज़ ही ऐसी है कि...
    प्रतिबंधों के समर्थक कुछ कर पाते, इससे पहले ही अधिकारियों ने गैरकानूनी व्हिस्की को नागरिक अस्पतालों तक भी पहुंचा दिया था. ओमाहा, नेब्रास्का के अस्पतालों को 500 गैलन शराब मुहैया करवाई गई. देखा देखी वॉशिंगटन के कमिश्नर ने भी नॉर्थ कैरोलिना में ज़ब्त व्हिस्की मुहैया करवाने के आदेश दे दिए.

    फिर छिड़ी डॉक्टरों की बहस
    जब व्हिस्की को लेकर इतनी बहस प्रशासनिक स्तर पर हो रही थी, तब डॉक्टरों के बीच बहस छिड़ी कि व्हिस्की की औषधि गुणवत्ता क्या है और कैसे तय की जाए. एक खेमा था, जो 1916 में ही व्हिस्की, ब्रांडी और वाइन को औषधि के एजेंट के तौर पर अपनाए जाने से खारिज कर चुका था. अमेरिकन मेडिकल एसोसिएशन ने भी ज़बरदस्त सिफारिश की थी कि अलकोहल को औषधि के क्षेत्र में बिलकुल तवज्जो नहीं दी जाना चाहिए.

    विशेषज्ञों का दूसरा खेमा इसके पक्ष में था. इस बारे में बहस लंबी चली थी और 1922 में जब एसोसिएशन ने डॉक्टरों के बीच सर्वे कराया था तो 51 फीसदी ने माना था कि व्हिस्की थैरेपी एजेंट के तौर पर उपयुक्त है. यानी एक खेमा कहता था कि बीमारों में अलकोहल से हृदय और श्वास तंत्र उद्दीप्त होने में मदद मिलती है जबकि दूसरा खेमा मानता था कि अलकोहल में नशे के असर से मरीज़ कुछ देर राहत महसूस करते हैं.


    फिर चले डॉक्टरों के प्रेस्क्रिप्शन के किस्से
    नैशविले में डॉक्टरों के प्रेस्क्रिप्शनों के आधार पर स्थानीय अधिकारियों ने व्हिस्की के 10 हज़ार हाफ पाइंट नागरिकों को मुहैया करवाए. यही नहीं, प्रेस्क्रिप्शनों को लेकर धंधा शुरू हुआ. 1919 में पिट्सबर्ग में चार डॉक्टरों को बेवजह व्हिस्की का डोज़ देने वाले जाली प्रेस्क्रिप्शन जारी करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया. ये डॉक्टर फर्जी परचों की आड़ में हर बोतल पर 1 डॉलर कमा रहे थे और मेडिकल स्टोर वालों को हर बोतल पर 5 डॉलर मिल रहे थे. अखबारों में तब इस धांधली को लेकर खूब खबरें आती थीं.

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    अनकॉमनवेल्थ ने स्पैनिश फ्लू के दौरान पुलिस ​मुख्यालय में व्हिस्की मुहैया करवाने टेलिग्राम लिखा गया था.


    अलकोहल से मिला दवाओं को मुनाफा
    दवाइयां बनाने वालों को इस पूरे प्रकरण से पैसा कमाने की तरकीब सूझ चुकी थी. इन्फ्लुएंज़ा के लिए जो दवाएं बाज़ार में उतारी जा रही थीं, उनका विज्ञापन इस तरह किया गया कि दवा में अलकोहल है. मसलन मास्टर मेडिसिन के रूप में शोहरतयाफ्ता दवाई टैनलैक के बारे में दावे किए गए थे कि इसमें 17% अलकोहल है जबकि एक और पेटेंट दवा पेरुना के बारे में विज्ञापन था कि इसमें 28 फीसदी अलकोहल था.

    यानी व्हिस्की की​ डिमांड और दवा के तौर पर उस समय में बनी सनसनी को दवा बाज़ार ने पूरी तरह भुनाने की कसर नहीं छोड़ी. हिस्ट्री.कॉम के लेख पर आधारित इस कहानी के अंत में गौर करें तो महामारी के समय में जो भी मुद्दा सनसनी बनता है, उसे भुनाने के लिए एक पूरा तंत्र कोशिश करता ही है, जैसे अब भी हो रहा है.

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