क्या इस्तीफे के बाद भी नौकरी पर लौट सकते हैं आईएएस? हां, तो कैसे?

आईएएस परीक्षा में टॉपर रह चुके शाह फैसल.

कश्मीर में इस्तीफा देने वाले IAS शाह फैसल (Shah Faesal) के अपनी ही राजनीतिक पार्टी से भी इस्तीफा देने के बाद चर्चा है कि क्या रिज़ाइन के बाद कोई अधिकारी सिविल सेवा उसी तरह दोबारा जॉइन कर सकता है! एक फोरम पर जवाब है कि दोबारा यूपीएससी परीक्षा (UPSC Exam) देना ही विकल्प है, लेकिन ऐसा नहीं है. जानिए तमाम नियम, कायदे और प्रैक्टिस.

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बतौर आईएएस इस्तीफा (IAS Resignation) देने के बाद राजनीति में गए शाह फैसल के अब राजनीति छोड़ देने के बाद चर्चाएं तेज़ हैं कि वो ब्यूरोक्रेसी (Bureaucracy) में लौट सकते हैं. हालांकि अब तक खुद शाह फैसल की तरफ से ऐसा बयान नहीं आया है लेकिन ऐसी अटकलें हैं. अटकलें और संभावनाएं अपनी जगह, लेकिन चूंकि यह एक अहम सरकारी पद (Government Job) है इसलिए जानने की बात यह है कि क्या नियम कायदों के तहत क्या यह मुमकिन है और है तो किस तरह.

बात शाह फैसल के सिविल सेवाओं (Civil Services) में लौटने की ज़रूर है, लेकिन इस बारे में कई तरह के पेंच हैं इसलिए यह सुलझा हुआ मामला नहीं है. कई पहलुओं से इस पर विचार किए जाने की ज़रूरत पेश आती है. नियम कायदों के साथ ही आपको बताते हैं कि इस तरह के मामलों में नौकरी वापसी पर किस तरह विचार किया जा सकता है.

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आईएएस बनने के लिए यूपीएससी द्वारा आयोजित परीक्षा पास करना होती है.


क्या कहते हैं ऑल इंडिया सर्विस रूल्स?
आईएएस या आईपीएस की सेवाओं से जुड़े नियम कायदे इस रूलबुक के अंतर्गत आते हैं. ऑल इंडिया सर्विस अमेंडमेंट रूल्स 2011 के तहत इस्तीफे के बाद वापस नौकरी में आने संबंधी नियम शर्तें तय की गई थीं. इसके मुताबिक मोटे तौर पर कहा गया था : 'कोई अधिकारी अपना इस्तीफा वापस ले सकता है अगर इस्तीफे के पीछे रहे कारणों से उसकी सत्यनिष्ठा, क्षमता और व्यवहार पर आंच न आती हो'.

लेकिन बात इतनी ही नहीं है. कोई अफसर इस्तीफा वापस लेने की कवायद कुछ शर्तों पर ही कर सकता है. अगर किसी अफसर ने इस्तीफा इसलिए दिया था कि उसे किसी व्यावसायिक प्राइवेट कंपनी या कॉर्पोरेशन या सरकार के नियंत्रण वाली किसी कंपनी में जॉइन करना था, या फिर इस्तीफा देकर व​ह किसी राजनीतिक पार्टी या राजनीतिक आंदोलन से जुड़ने वाला था, तो ऐसे में इस्तीफा वापसी की दरख्वास्त केंद्र सरकार द्वारा मंज़ूर नहीं की जा सकेगी.

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क्या और भी कोई नियम कायदा है?
पर्सनेल और ट्रेनिंग विभाग के तहत भी सर्विस से जुड़े कुछ मामले तय और नियंत्रित होते हैं. अगर कोई अधिकारी अपने पद व सेवा से इस्तीफा देता है और कुछ समय के बाद वह सर्विस में दोबारा आना चाहता है तो यह भी एक देखने लायक बिंदु होता है कि उसका इस्तीफा केंद्र द्वारा मंज़ूर किया गया या नहीं. नौकरी में दोबारा आने के लिए अधिकारी के आवेदन पर केंद्रीय प्रशासनिक ट्रिब्यूनल (CAT) सुनवाई करता है.

क्या हैं शाह फैसल के मामले में पेंच?
ऊपर बताए गए नियम शर्तों से तो साफ है कि शाह फैसल का मामला काफी पेचीदा है. कश्मीर में बतौर आईएएस सेवाएं दे रहे शाह फैसल ने साल 2019 की शुरूआत में इस्तीफा दिया था, लेकिन पहली बात यह है कि अब तक उनका इस्तीफा केंद्र द्वारा मंज़ूर नहीं किया गया. दूसरा पेंच यह है कि फैसल ने इस्तीफा सरकार की नीतियों की आलोचना करते हुए दिया था और इस्तीफा देकर अपनी एक राजनीतिक पार्टी बनाई थी.

इतना ही नहीं, तीसरा पेंच यह भी है कि पिछले साल 5 अगस्त को कश्मीर के राज्य स्वरूप में बदलाव के बाद बने हालात के चलते अन्य कई कश्मीरी नेताओं के साथ ही फैसल को भी पब्लिक सेफ्टी एक्ट के तहत गिरफ्तार/नज़रबंद भी किया गया था और करीब दस महीने बाद उन्हें रिहा किया गया. तो फैसल के मामले में सवाल खड़े होते हैं :


1. क्या इस्तीफा देने के मकसद और इस्तीफे के बाद की गतिविधियों को विचाराधीन रखा जाएगा या अब तक इस्तीफा मंज़ूर नहीं हुआ है, इस बात को तवज्जो दी जाएगी?
2. क्या इस्तीफा दे चुके आईएएस की पब्लिक सेफ्टी एक्ट के तहत गिरफ्तारी नौकरी रीजॉइन करने में बाधा हो सकती है?

इन सवालों के जवाब के लिए कुछ उदाहरणों से प्रैक्टिस को समझना ज़रूरी है.

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एक सामान्य केस
शिमला में नियुक्त रही एक महिला रेवेन्यू सर्विस अधिकारी के केस में कुछ साल पहले खबर थी कि उन्होंने 2008 में स्वास्थ्य और रिलेशनशिप के खराब दौर के चलते इस्तीफा दिया था और तीन साल बाद वह वापस सेवा में आना चाहती थीं. लेकिन उनके आवेदन को खारिज करते हुए कहा गया कि इस्तीफा मंज़ूर किया गया और 90 दिनों को रिलेक्सेशन पीरियड भी जा चुका इसलिए उनकी अर्ज़ी मान्य नहीं है.

आईएएस कन्नन का विशेष केस
केंद्र सरकार द्वारा जम्मू कश्मीर को विभाजित कर दो अलग केंद्र शासित प्रदेशों में बांटने के फैसले का विरोध कर, इस फैसले को जम्मू कश्मीर के लोगों की आज़ादी पर हमला बताकर और सोशल मीडिया पर सरकार के खिलाफ मुखर होकर अगस्त 2019 में इस्तीफा देने वाले आईएएस कन्नन गोपीनाथन के मामले में दिलचस्प यह है कि उनका इस्तीफा भी सरकार ने मंज़ूर नहीं किया था.

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सरकार की नीतियों के विरोध में आईएएस से इस्तीफा देने वाले कन्नन गोपीनाथन.


यही नहीं, इसी साल अप्रैल में सरकार ने एक पत्र जारी कर कन्नन को सेवा में लौटने का आदेश भी दिया. हालांकि कन्नन ने सेवा में लौटने से इनकार करते हुए खुद कहा था 'चूंकि मैं खुद आईएएस के पद से इस्तीफा दे चुका हूं इसलिए अब मुझे आईएएस अफसर कहा नहीं जा सकता और इसी कारण मुझे वही सैलरी और अन्य आर्थिक लाभ मिल सकते हैं.'

कितने समय में इस्तीफा होता है मंज़ूर?
तय नहीं है. चूंकि यह सरकारी प्रक्रिया है इसलिए हर मामले के लिए इसमें समय अलग ढंग से लग सकता है. किसी आईएएस का इस्तीफा एक हफ्ते के भीतर भी मंज़ूर हो सकता है तो किसी का एक साल में भी नहीं. इस बारे में विशेषज्ञों से बातचीत पर आधारित एक रिपोर्ट कहती है कि इस्तीफा मंज़ूर करना या न करना सरकार की एक 'प्रेशर तरकीब' होती है, जिसके ज़रिये किसी आईएएस अफसर पर कई तरह से दबाव बनाए जा सकते हैं.

आसान तरीके से ऐसे समझें कि ओडिशा कैडर की अपराजिता सारंगी मामले में क्या हुआ था! सारंगी ने 2018 में इस्तीफा देकर भाजपा जॉइन की थी और फिर वह भुबनेश्वर से लोकसभा चुनाव जीती भी थीं. उनका इस्तीफा कुछ ही दिनों में मंज़ूर किया गया था. इसी तरह, पहले 2005 बैच के अधिकारी ओपी चौधरी के मामले में एक हफ्ते के भीतर इस्तीफा मंज़ूर हुआ था, जिन्होंने इस्तीफे के बाद भाजपा जॉइन की थी.

इसी रिपोर्ट के मुताबिक आईएएस अफसर मानते हैं कि इस्तीफा मंज़ूर किए जाने में चार से पांच महीने तक का वक्त लगना तो ठीक है. लेकिन कन्नन और फैसल जैसे मामलों में एक साल के वक्त तक इस्तीफा मंज़ूर नहीं हुआ.

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शाह फैसल के बारे में अटकलें हैं कि वो आईएएस के तौर पर वापसी कर सकते हैं.


फैसल केस को कैसे देखा जाए?
आखिरकार सवाल वहीं है कि शाह फैसल केस में नियम कायदों के तहत क्या संभावनाएं हो सकती हैं. विशेषज्ञों के मुताबिक भले ही फैसल एक राजनीतिक पार्टी से जुड़े हों लेकिन तकनीकी रूप से अब भी केंद्र सरकार के कर्मचारी ही हैं, लेकिन इस्तीफे और पीएसए के तहत गिरफ्तारी के बावजूद केंद्र का उन्हें रिलीव न किया जाना समझ के बाहर है.

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विशेषज्ञों के हवाले से एक ताज़ा रिपोर्ट में कहा गया है कि फैसल के दोबारा आईएएस के तौर पर जॉइन करने में सिविल सेवा कंडक्ट रूल्स आड़े आएंगे. 'अगर उन्हें सेवा में वापस लिया गया तो केंद्र सरकार की तरफ से गलत उदाहरण होगा'. सिविल सेवा कोई ऐसी जगह नहीं है कि आप जब चाहें छोड़ दें और अपनी मर्ज़ी से वापस चले आएं. दोबारा एंट्री बहुत गंभीर विषय होता है.

ये भी कहा गया है कि फैसल ने राजनीतिक पार्टी बनाने के लिए लोगों से फंड इकट्ठा किया, जिसका कोई स्पष्ट ब्योरा नहीं है और फिर उनकी गिरफ्तारी अपने आप में ही सर्विस कंडक्ट रूल्स के खिलाफ जाती है. माना जा रहा है कि इस मामले में सरकार के रुख से आगे के लिए उदाहरण बनेंगे.

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