'विरोध ज़रूरी है चाहे संक्रमण फैले'... क्या वाकई प्रदर्शनों से बढ़ा कोरोना संक्रमण?

'विरोध ज़रूरी है चाहे संक्रमण फैले'... क्या वाकई प्रदर्शनों से बढ़ा कोरोना संक्रमण?
नस्लवाद विरोधी प्रदर्शनों के दौरान ऐसे संदेश नारे बने.

ज़ाहिर है कि Protests में भारी संख्या में लोग जुटते हैं और एकजुटता दिखाकर अपनी मांगें रखते हैं. तो क्या दुनिया भर के लिए प्रकोप बनी Covid-19 महामारी के दौरान America से Africa तक नस्लवाद के खिलाफ (Anti-Racism) प्रदर्शन करना खतरनाक साबित हुआ, जिसमें हज़ारों लोग एक साथ सड़कों पर उतरे?

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अमेरिका (USA) में 25 मई को एक पुलिस अफसर की ज़्यादती से अश्वेत जॉर्ज फ्लॉयड (George Floyd) की मौत के बाद अमेरिका ही नहीं, Europe और अफ्रीका तक नस्लवाद विरोधी विशाल प्रदर्शनों से महामारी (Pandemic) कितनी फैली? प्रदर्शनों के 20 दिन बाद भी क्या कोई Study सामने आई है जो बता सके कि प्रदर्शनों का संक्रमण (Virus Transmission) की रफ्तार पर क्या असर पड़ा? इसके साथ ही ये भी जानिए कि क्यों विशेषज्ञों ने कहा कि महामारी फैलती है तो फैले, प्रदर्शन ज़रूरी हैं..!

ज़रूरी काम नहीं है तो घर पर रहना ही बेहतर होता है. लेकिन ज़रूरी काम की परिभाषा वैज्ञानिक नहीं बल्कि सामाजिक है... पुलिस की हिंसा का विरोध करना लोगों के लिए ज़रूरी गतिविधि है.
एलेनॉर मरे, बॉस्टन यूनिवर्सिटी में महामारी विशेषज्ञ


WHO ने क्यों किया प्रदर्शनों का समर्थन?
एक हफ्ते पहले विश्व स्वास्थ्य संगठन ने साफ कहा कि 'हम नस्लवाद समेत हर तरह के भेदभाव की निंदा करते हैं और दुनिया भर में रैसिज़्म के खिलाफ चल रहे प्रदर्शनों का समर्थन.' साथ ही WHO ने प्रदर्शनकारियों को सावधानी के तरीके अपनाने और स्थानीय स्वास्थ्य अधिकारियों की सलाह मानने की समझाइश दी. अमेरिका में कई प्रशासनिक इकाइयों ने भी इसी तरह की हिदायतें देकर एक तरह से प्रदर्शनों को ज़रूरी माना. डेनवर, अटलांटा और न्यूयॉर्क में तो प्रदर्शनकारियों के मुफ्त कोविड टेस्ट किए जाने की तक की बात प्रशासन ने कही.



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विशेषज्ञ भी सहमत हैं कि वायरस से ज़्यादा बड़ी महामारी नस्लवाद है.


एक अश्वेत के तौर पर अमेरिका में जीना ही मौत के खतरे को बुलावा देने जैसा है. अगर मैं चुप रहूं और कुछ न करूं तो सिर्फ इसलिए मारी जा सकती हूं कि मैं ज़िंदा हूं! जो अश्वेत प्रदर्शन कर रहे हैं, उन्हें कुछ न करने की कीमत एक वायरस से बढ़कर चुकानी पड़ सकती है.
आयशा लैंगफर्ड, एनवाययू में स्वास्थ्य रिसर्चर


क्या अमेरिका में वाकई बढ़ गया संक्रमण?
महामारी फैलने पर विरोध प्रदर्शनों के असर को देखने के लिए एनवायटी का एक विश्लेषण मददगार साबित होता है, जिसके हिसाब से अमेरिका के 50 में से एक तिहाई से ज़्यादा राज्यों में रोज़ाना आने वाले केसों की संख्या बढ़ी है. वहीं, करीब 20 राज्यों में यह संख्या घटी है. जहां घटी है, उनमें वॉशिंग्टन, न्यूयॉर्क, मिनेसॉटा जैसे राज्य शामिल हैं, जहां हज़ारों की संख्या में प्रदर्शनकारी जुटे थे.

चूंकि कोविड 19 संक्रमण का इन्क्यूबेशन पीरियड 14 दिनों का माना गया है इसलिए 26 मई से शुरू हुए प्रदर्शनों के 15 दिनों बाद अलजज़ीरा ने एक रिपोर्ट तैयार कर बताया कि जिन राज्यों में बड़े और लगातार प्रदर्शन हुए, वहां रोज़ाना आने वाले केसों में किस तरह का अंतर देखा गया. इस स्टडी के मुताबिक अमेरिका में राज्यवार स्थिति को समझना आसान हो जाता है. प्रदर्शन के मुख्य केंद्र बने स्थानों पर पिछले 15 दिनों की तुलना में प्रदर्शनों के 15 दिनों बाद के संक्रमण संबंधी आंकड़े घटे दिखे.

हेनेपिन काउंटी, मिनेसॉटा (मेनियापॉलिस) - यहां 26 मई से कई बार प्रदर्शन हुए.
रोज़ाना कन्फर्म केस (10-24 मई): 3360
रोज़ाना कन्फर्म केस (26 मई-9 जून): 2146

वॉशिंग्टन, डीसी - यहां 13 दिनों तक लगातार व्हाइट हाउस के पास हज़ारों प्रदर्शनकारी जुटे.
रोज़ाना कन्फर्म केस (10-24 मई): 1838
रोज़ाना कन्फर्म केस (26 मई-9 जून): 1140

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फ्लॉयड के आखिरी वाक्य #ICantBreathe को विरोध प्रदर्शनों के दौरान दमन की घुटन का प्रतीक का बनाया गया.


न्यूयॉर्क - फ्लॉयड की हत्या के बाद यहां प्रतिक्रिया में हिंसा और लूटपाट की घटनाएं हुई थीं.
रोज़ाना कन्फर्म केस (10-24 मई): 13,706
रोज़ाना कन्फर्म केस (26 मई-9 जून): 8392

कुक काउंटी, इलिनॉइस (शिकागो) - 1 जून को लगाया गया कर्फ्यू यहां 7 जून को हटाया गया था.
रोज़ाना कन्फर्म केस (10-24 मई): 19,355
रोज़ाना कन्फर्म केस (26 मई-9 जून): 8392

हालांकि यह स्टडी पूरी तरह से यह ज़ाहिर नहीं करती कि विरोध प्रदर्शनों के कारण महामारी के प्रसार में कमी आई या तेज़ी क्योंकि एक तो प्रदर्शनकारियों की जो आबादी टेस्टिंग से नहीं गुज़री, उसके आंकड़े पूरी तरह इसमें शामिल हैं या नहीं, यह साफ नहीं है. लेकिन, फिर भी यह एक तस्वीर है, जो कुछ स्थिति साफ करती है.

इनडोर स्थानों की अपेक्षा आउटडोर स्थानों पर वायरस के फैलने का खतरा कम होता है, इस बात के सबूत मिले हैं. ताज़ा हवा में वायरस कमज़ोर हो जाता है इसलिए संक्रमण कम होता है... मामूली हैं लेकिन ऐसे भी सबूत मिल हैं कि धूप के डायरेक्ट संपर्क में आकर वायरस जल्दी मरता है.
आमिर खान, यूके बेस्ड डॉक्टर


संक्रमण से क्या वाकई सुरक्षित रहे प्रदर्शनकारी?
विशेषज्ञों की हिदायतें मानते हुए ज़्यादातर प्रदर्शनकारियों ने मास्क पहने रखा, हाथ सैनेटाइज़ करते रहने का खयाल रखा और एक दूरी बनाए रखने जैसे एहतियात अपनाए. इसके बावजूद बड़े पैमाने पर सभी प्रदर्शनकारियों की टेस्टिंग के बाद ही कोई नतीजा निकाला जा सकेगा. कई विशेषज्ञों से बातचीत पर आधारित वॉक्स की रिपोर्ट यह भी कहती है कि विरोध प्रदर्शनों के कारण ही दुनिया में बहुत कुछ अच्छा हुआ है इसलिए ये गतिविधि ज़रूरी है.

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प्रदर्शनों के दौरान #BlackLivesMatter सोशल मीडिया पर काफी चर्चित रहा.


एक अस्थमा मरीज़ मेरेडिथ ब्लेक ने कहा कि वह अपनी बीमारी को लेकर प्रदर्शनों में जाने को लेकर नर्वस थीं लेकिन उन्होंने कोरोना वायरस से अपनी निजी सुरक्षा के बजाय हज़ारों लाखों जानें बचाने के लिए हो रहे विरोध का हिस्सा बनना चुना. इसी रिपोर्ट में कई विशेषज्ञों के नज़रिये रखे गए. एक इस तरह भी देखें :

एक लोक स्वास्थ्य प्रोफेशनल होने के नाते मेरे लिए कहना मुश्किल है कि उन लोगों को सड़कों से हटा दिया जाए जो 400 साल पुरानी ऐसी महामारी से लड़ रहे हैं जो रंग देखकर फैलती है.
ज़िंज़ी बेली, मियामी यूनिवर्सिटी में महामारी विशेषज्ञ


हालांकि प्रदर्शनों का दौर शुरू होते समय कुछ विशेषज्ञों ने महामारी और संक्रमण तेज़ी से फैलने को लेकर बड़ी चिंताएं व्यक्त की थीं लेकिन मानवीयता को समझने के बाद नज़रिये बदले. कोविड 19 के संक्रमण के दौरान हज़ारों लाखों लोग खतरा मोल लेकर सड़कों पर उतरे हैं, तो अब विशेषज्ञों सहित एक बहुत बड़ी आबादी एक बेहतर अमेरिका की उम्मीद कर रही है.

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