क्या सच में भारत में चार महीने में कंट्रोल हो जाएगा कोरोना? 7 अहम बातें

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सरकार ने विशेषज्ञों की कमेटी (Government Panel) बनाई थी, उसने अपनी रिपोर्ट में दावा किया कि Covid-19 का सबसे भयानक समय बीत चुका है और त्योहार हों या सर्दियां, उतना कहर अब नहीं टूटेगा, जितना टूट चुका, लेकिन शर्तों पर.

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  • Last Updated: October 19, 2020, 12:55 PM IST
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क्या ये सच है कि भारत में कोरोना वायरस (Corona Virus) के कहर का जो सबसे खराब दौर था, वो गुज़र चुका? करीब एक तिहाई आबादी में एंटीबॉडी डेवलप हो चुकी है? क्या ये यकीन करने लायक है कि अगले करीब चार महीनों के देश के भीतर कोविड-19 पर काबू (Corona Control) पा लिया जाएगा? सरकार ने वैज्ञानिकों की जो एक कमेटी (Committee of Scientists) बनाई थी, उसकी मानें तो फरवरी 2021 तक महामारी का समय पूरा हो जाएगा, अगर हमने तमाम हिदायतों (Precautions) का ठीक से पालन किया. अब ये दावा कितना सही है और कैसे इस निष्कर्ष तक पहुंचा गया, इसके लिए आंकड़ों की गवाही (Covid Statistics) ज़रूरी है.

आईआईटी हैदराबाद के प्रोफेसर एम विद्यासागर के नेतृत्व में कमेटी ने देश में कोरोना संक्रमण की महामारी की पूरी चाल को समझने का एक नया मॉडल इस्तेमाल किया. इस अध्ययन में पाया गया ​कि सितंबर के महीने में कोरोना अपने पीक पर रह चुका और पिछले करीब एक महीने से उसके उतार का दौर शुरू हो चुका है. इस अध्ययन में यह भी कहा गया कि भले ही त्योहारों और सर्दियों का मौसम सामने हो, लेकिन सितंबर वाले पीक की तुलना में अब केस कम ही सामने आएंगे.

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देश के विज्ञान और तकनीक मंत्रालय ने एक महीने पहले यह कमेटी बनाई थी, जिसने कोरोना के खिलाफ सरकारी नीतियों को सही और सटीक करार दिया है.

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दूसरी तरफ, स्वास्थ्य मंत्रालय ने भी कोविड के खिलाफ अपनाई गई रणनीति को कारगर बताया. आंकड़े क्या कह रहे हैं? कैसे इस कमेटी के दावों पर यकीन किया जा सकता है और किस तरह महामारी के ट्रेंड को समझा जा सकता है? इन सवालों के जवाब 7 पॉइंट्स में समझें.
कमेटी में शामिल आईआईटी कानपुर के प्रो मनींद्र अग्रवाल के मुताबिक लोगों को सावधानियां बरतना जारी रखना होगा. केरल में ओणम फेस्टिवल के बाद केस एकदम से बढ़े, इसलिए सबक लेकर मास्क, सोशल डिस्टेंस और साफ सफाई का खयाल रखने से ही आगामी त्योहारी और सर्दी के मौसम में महामारी से बचाव संभव होगा. अगर पूरी सावधानी रखी गई तो फरवरी तक देश में हालात कंट्रोल में आ जाएंगे.
कमेटी ने ये भी कहा कि अगर मार्च में लॉकडाउन नहीं किया गया होता तो बहुत कम समय में देश के हेल्थकेयर सिस्टम की सांस फूल जाती. लॉकडाउन न होता तो करीब 26 लाख मौतें होतीं, जबकि लॉकडाउन मई में होता तो मौतों का आंकड़ा 10 लाख होता. मार्च में लॉकडाउन से ही मौतें 1 लाख के आसपास रहीं. इसी तरह, लॉकडाउन न होता तो संक्रमण केस 1.4 करोड़ होते. कमेटी ने माना कि लॉकडाउन से कर्व फ्लैटन हुआ.
कमेटी ने ये भी माना कि मार्च में लॉकडाउन के फौरन बाद बड़ी संख्या में लोगों का जो माइग्रेशन हुआ, उसका असर संक्रमण फैलने के लिहाज़ से बहुत मामूली रहा. कमेटी के मुताबिक माइग्रेंट के लौटने पर जो क्वारंटाइन रणनीति अपनाई गई, वो बेहद कारगर रही. कमेटी के हिसाब से भारत में कोरोना के खिलाफ लड़ाई बेहतर ढंग से लड़ी गई.
सितंबर के मध्य में जहां 80 से 90 हज़ार केस तक प्रतिदिन देखे जा रहे थे, वहीं इस महीने पिछले हफ्ते में औसतन करीब 70 हज़ार नए केस रोज़ रह गए. पिछले हफ्ते प्रतिदिन केसों की संख्या 18 अक्टूबर को 61871, 17 को 62212, 16 को 63371, 15 को 67708, 14 को 63509, 13 को 55342, 12 को 66732 और 11 को 74383 केस की रही. माना जा सकता है कि सितंबर के मुकाबले रोज़ नए केस काफी कम हुए हैं.
अब देखिए कि आंकड़े क्या कह रहे हैं. दुनिया की एक बटे छह आबादी भारत में बसती है और यहां दुनिया के कुल कोरोना केसों का करीब छठा हिस्सा ही भारत में भी रहा. लेकिन कोरोना से जितनी मौतें दुनिया में हुईं, उनमें से 10 फीसदी भारत में हुईं. यही नहीं, यह मृत्यु दर केसों के लिहाज़ से सिर्फ 2% रही, जो दुनिया में सबसे कम दर के आंकड़ों में शुमार है. इसके कई कारण पहले बताए जा चुके हैं.
कोरोना के ताज़ा आंकड़ों के मुताबिक देश में 1 लाख 14 हज़ार से ज़्यादा मौतें हो चुकी हैं और करीब 75 लाख केस सामने आ चुके हैं. हेल्थ मिनिस्ट्री की मानें तो पिछले डेढ़ महीने में पहली बार पिछले हफ्ते कुल एक्टिव केसों की संख्या 8 लाख से कम रही. स्वास्थ्य मंत्रालय ने कम मृत्यु दर, ज़्यादा रिकवरी और एक्टिव केसों के घटने को नीतिगत उपलब्धि करार दिया.
दुनिया भर में कोरोना के करीब 4 करोड़ केस हैं जिनमें से भारत में करीब 75 लाख. दुनिया भर में मौतें 11 लाख से ज़्यादा हुईं तो भारत में 1 लाख से ज़्यादा. अमेरिका में करीब 82 लाख केस और 2 लाख 19 हज़ार मौतें हुईं तो ब्राज़ील में 52 लाख से ज़्यादा केसों पर 1 लाख 53 हज़ार से ज़्यादा मौतें हुईं. वहीं, भारत में करीब 75 लाख केसों पर 1 लाख 14 हज़ार के आसपास मौतें हुईं.
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