क्या 1947 में मिली थी भारत को आज़ादी? क्या 15 अगस्त है स्वतंत्रता दिवस?

क्या 1947 में मिली थी भारत को आज़ादी? क्या 15 अगस्त है स्वतंत्रता दिवस?
15 अगस्त 1947 को भारत और पाकिस्तान दो ब्रिटिश उपनिवेश बने थे.

Independence Day: भारत की आज़ादी के इतिहास (Freedom History of India) के पन्ने कहते हैं “भारत को उपनिवेश दर्जे पर ऐतराज़ सिर्फ ब्रिटिश संसद में ही नहीं हुआ था, बल्कि कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, न्यूज़ीलैंड और दक्षिण अफ्रीका जैसे उपनिवेशों (Dominions) के नेताओं ने भी ऐतराज़ जताया था क्योंकि वो नहीं चाहते थे कि 'अश्वेत भारत' को 'श्वेतों' के साथ बराबरी का दर्जा मिले.

  • News18India
  • Last Updated: August 18, 2020, 12:53 PM IST
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पाठ्यपुस्तकों (Textbooks) की बात हो या मौखिक तौर पर छोटों को सामान्य ज्ञान (General Knowledge) देने की, यही बताया जाता है कि भारत को आज़ादी (Freedom of India) 15 अगस्त 1947 को मिली थी. प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू (Pt. Jawaharlal Nehru) ने आधी रात को आज़ादी का यादगार भाषण (Tryst With Destiny) लाल किले से दिया था. लेकिन न तो यह सवाल उठता है और न ही आम तौर से सोचा जाता है कि जब भारत आज़ाद हो गया था, तो एक अंग्रेज़ यानी लुइस माउंटबैटन (Lord Mountbatten) भारत का गवर्नर जनरल क्यों था?

क्या सच में इस तारीख को भारत आज़ाद हो गया था? कहा तो जा सकता है, लेकिन तकनीकी रूप से यह मानना गलत ही है. 15 अगस्त 1947 वो तारीख थी, जब भारत को ब्रिटेन के स्वतंत्र उपनिवेश का दर्जा मिला था, जिसे भारतीय संघ या भारतीय उपनिवेश कहा गया. क्यों ऐसे में भारत को आज़ाद नहीं माना जा सकता था? उपनिवेश होने से क्या फायदा हुआ और क्या मुश्किलें खड़ी हुईं?

वास्तव में, भारतीय स्वाधीनता एक्ट 1947 के तहत ये प्रावधान हुए थे और भारत का संविधान बनाए जाने की राह खुली थी. जब तक संविधान नहीं बना, तब तक भारत ब्रिटिश कॉमनवेल्थ देशों में एक उपनिवेश के तौर पर शामिल रहा. 26 जनवरी 1950 को भारत का संविधान बनने से ही सही मायनों में भारत को आज़ाद देश के तौर पर पहचान मिली. इतिहास और कायदों के मुताबिक इस किस्से को समझना दिलचस्प है.



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1947 में नेहरू का पीएम के तौर पर शपथ दिलाने के दौरान माउंटबैटन. (तस्वीर विकिकॉमन्स से साभार)

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क्या होता है उपनिवेश?
आसान शब्दों में उपनिवेश एक स्वाधीन समुदाय तो होता है, लेकिन आखिरकार उसके सिर पर 'एक राजा या ताज' का साया बना रहता है. भारत के मामले में ताज के प्रतिनिधि के तौर पर गवर्नर जनरल की हैसियत से माउंटबैटन रहे थे. ब्रिटिश राज में परंपरागत रूप से रहा वायसराय का पद और दफ्तर 15 अगस्त 47 से खत्म हो गया था. 47 से 50 तक नेहरू ही प्रधानमंत्री रहे, लेकिन उपनिवेश के.

उपनिवेश के अर्थ के तौर पर बगैर चुने हुए लोगों ने प्रशासन संभाला और ब्रिटिश राजा के नाम पर शपथ ग्रहण की थी. उपनिवेश के दौरान भारतीय आर्मी का प्रमुख ब्रिटिश फील्ड मार्शल रहा और हाई कोर्ट व संघीय कोर्ट के जजों की नियुक्ति ब्रिटिशों के हाथ में रही. संविधान लागू होते ही भारत को एक संप्रभुता वाले लोकतांत्रिक गणराज्य का दर्जा मिला और वह ब्रिटिश राजशाही से पूरी तरह मुक्त हुआ. लेकिन इस दौरान ये उपनिवेश कई मायनों में अहम रहा.

कैसे हुआ था उपनिवेश पर विचार?
भारत को आज़ाद किस तरह से किया जाए, इसे लेकर उपनिवेश के विचार पर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और ब्रिटिश सरकार कई बार उलझती रही और दोनों अपने मत कई बार बदलते रहे. भारत के उपनिवेश बनाए जाने पर बहस पहले विश्व युद्ध के समय से ही शुरू हो गई थी और 1927 में कांग्रेस के मद्रास अधिवेशन में साइमन कमीशन के विरोध के चलते तय हुआ था कि भारत का अपना संविधान बनाने के लिए एक समिति बनेगी.

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हालांकि कांग्रेस के साथ ही 1928 में सर्वदलीय सम्मेलन में इस बात पर रज़ामंदी बनी कि भारत का लक्ष्य आज़ादी है, लेकिन उपनिवेश को लेकर कोई आम सहमति नहीं बन सकी. पहले मोतीलाल नेहरू ने उपनिवेश को आज़ादी का दूसरा नाम कहकर इसे अपनाने की बात कही, लेकिन कांग्रेस अध्यक्ष बनते ही जवाहरलाल नेहरू ने इसका विरोध करते हुए कहा कि जब तक सेना और अर्थव्यवस्था हाथ में नहीं आती, भारत पूरी तरह आज़ाद नहीं कहलाएगा.

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15 अगस्त 1947 को भाषण देते लुइस माउंटबैटन. (तस्वीर विकिकॉमन्स से साभार)


कैसे बनी उपनिवेश पर सह​मति?
कई बार सहमति असहमतियों के रास्ते से होकर जब भारत स्वतंत्रता के द्वार के पास खड़ा हुआ था, तब कांग्रेस ने उपनिवेश के दर्जे पर सहमति दी. इसका कारण बताते हुए वैधानिक इतिहासकार रोहित डे ने अपने शोधपत्र में लिखा कि इस दर्जे से भारत को अपने संविधान निर्माण और गणतांत्रिक रचना के लिए समय मिल रहा था. साथ ही, भारत को कई शाही रियासतों को जोड़कर 'एक भारत' बनाने के लिए भी वक्त मिलता.

दूसरी तरफ, दूसरे वर्ल्ड वॉर के बाद ब्रिटिश भी हिल चुके थे. 1946 में नेवी और वायु सेना में विद्रोह हो रहा था, पूरे भारत में जगह जगह सांप्रदायिक दंगे व तनाव के हालात बन रहे थे. ऐसे में, ब्रिटिशों का आत्मविश्वास कमज़ोर था. पश्चिमी शक्तियों के विरोध के बावजूद यूके के प्रधानमंत्री क्लमेंट एटली को 30 जून 1948 को भारत को 'पूर्ण स्वराज' का दर्जा देना पड़ा और 21 जून 1948 को माउंटबैटन की जगह चक्रवर्ती राजगोपालाचारी को गवर्नर जनरल बनाया गया.

उपनिवेश से क्या कोई फायदा हुआ?
राजगोपालाचारी के गवर्नर जनरल बनने के बाद भी माउंटबैटन संविधान निर्माण प्रक्रिया की निगरानी करते रहे थे. करीब ढाई साल के उपनिवेश समय में भारत को फायदा यही हुआ कि एक मज़बूत राष्ट्र बनाने में मदद मिली. इंडियन एक्सप्रेस के लिए एक लेख में कॉलमिस्ट मेघनाद देसाई ने भी माना था ब्रिटिशों की इस परंपरा से भारत को मदद ही मिली.

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अस्ल में एक मज़बूत गणतंत्र और देश बनाने के लिए काफी शक्तियों की ज़रूरत थी और उपनिवेश व्यवस्था ने भारतीय नेताओं को वो शक्तियां मुहैया करवाईं. हालांकि इसमें कानूनी अधिकार क्षेत्रों से ज़्यादा भी ताकत का इस्तेमाल हुआ, लेकिन उसकी आलोचना भी होती रही. एक्सप्रेस की ही रिपोर्ट के मुताबिक कांग्रेस ने कुछ मौकों पर उन्हीं ब्रिटिश दमनकारी नीतियों व कानूनों का इस्तेमाल भी किया, जिसका कभी विरोध किया जाता था.

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संविधान पर दस्तखत करते हुए पहले पीएम जवाहरलाल नेहरू. (तस्वीर विकिकॉमन्स से साभार)


“ये आज़ादी झूठी है”, कम्युनिस्ट पार्टी ने उस वक्त कांग्रेस के रवैये पर यह आलोचना की थी. फिर भी, एक राष्ट्र बनाने में शाही रियासतों के एकीकरण में कांग्रेस नेताओं ने जिस तरह की ताकतों का इस्तेमाल किया, वह उपनिवेश व्यवस्था का सबसे बड़ा योगदान रहा. दूसरी तरफ, पाकिस्तान 1956 तक उपनिवेश के तौर पर रहा.
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