जानें भूकंप के बड़े झटके की दस्‍तक तो नहीं बार-बार आ रहे हल्‍के झटके?

जानें भूकंप के बड़े झटके की दस्‍तक तो नहीं बार-बार आ रहे हल्‍के झटके?
दिल्‍ली-एनसीआर में दोे महीने के भीतर भूकंप के 8 झटके महसूस किए गए हैं. इनमें शुक्रवार रात आया पहला झटका सबसे ज्‍यादा तीव्रता का था. (सांकेतिक तस्वीर(

लॉकडाउन के दौरान दिल्‍ली-एनसीआर (Delhi-NCR) में महसूस किए गए भूकंप के झटकों (Earthquake) ने कोरोना वायरस के कारण घरों में कैद लोगों का डर बढ़ा दिया है. इन हल्‍के झटकों के बाद सवाल ये उठता है कि क्‍या जोन-4 में मौजूद दिल्‍ली-एनसीआर में कभी भी भूकंप का बड़ा झटका आ सकता है.

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दिल्‍ली-एनसीआर (Delhi-NCR) समेत देश के कई इलाकों में शुक्रवार की रात एक घंटे में दो बार भूकंप (Earthquakes) के झटके महसूस किए गए. पहला झटका रिक्टर स्‍केल पर 4.6 मापा गया. भूकंप का केंद्र दिल्ली से 65 किमी दूर हरियाणा के रोहतक (Rohtak) में जमीन के नीचे करीब 3.3 किमी था. वहीं, दूसरे भूकंप की तीव्रता 2.9 थी, जो जमीन के नीचे 5 किमी रहा. इसके एक दिन पहले यानी 28 मई को भी दिल्ली में भूकंप आया था, जिसकी तीव्रता 2.5 थी. भू-वैज्ञानिकों के मुताबिक, भूकंप के मामले में दिल्‍ली बेहद संवेदनशील है. लॉकडाउन (Lockdown) के दौरान दिल्‍ली-एनसीआर में 8 बार आ चुके भूकंप ने कोरोना वायरस (Coronavirus) के कारण घरों में कैद लोगों का डर बढ़ा दिया है. अब सवाल ये उठता है कि बार-बार आ रहे भूकंप के ये हल्‍के झटके कहीं बड़े भूकंप की दस्‍तक तो नहीं हैं.

फॉल्‍ट लाइन प्रेशर से आए हल्‍के झटके बड़े भूकंप की आहट
अमेरिका (US) में पिछले साल जनवरी में एक के बाद एक आए दो भूकंप के झटकों के बाद के बर्कले की भूकंप विज्ञान प्रयोगशाला (Seismology Lab) की ओर से कहा गया था, 'इस तरह के छोटे-छोटे झटकों के आधार पर पुख्‍ता तौर पर ये नहीं कहा जा सकता है कि कोई बड़ा झटका आने वाला है. अब तक ऐसे छोटे-छोटे झटकों की श्रृंखलाओं के बाद किसी बड़े झटके का कोई प्रमाणिक उदाहरण नहीं मिलता है.' हालांकि, प्रयोगशाला ने ये भी कहा था कि अगर भूकंप के ये छोटे-छोटे झटके किसी फॉल्‍ट-लाइन प्रेशर के कारण आ रहे हैं तो ये बड़े झटके की दस्‍तक माने जा सकते हैं. बता दें कि पूरी धरती पर कई फॉल्ट जोन हैं. इसका मतलब है क‍ि धरती पर कई जगह प्लेट्स एक-दूसरे से मिलती हैं. इन प्‍लेटों के आगे-पीछे या ऊपर-नीचे खिसकने पर भूकंप आता है. भारत को भूकंप के जोखिम के हिसाब से चार जोन में बांटा गया है. भू-वैज्ञानिकों ने दिल्ली और इसके आसपास के इलाके को जोन-4 में रखा है यानी यहां 7.9 तीव्रता तक का भूकंप आ सकता है.

भू-वैज्ञानिकों ने दिल्ली और इसके आसपास के इलाके को जोन-4 में रखा है यानी यहां 7.9 तीव्रता तक का भूकंप आ सकता है.




'फॉल्‍ट लाइन प्रेशर की वजह से नहीं आया दिल्‍ली में भूकंप'


नेशनल सेंटर फॉर सिस्‍मोलॉजी (NCS) के आपरेशंस हेड जेएल गौतम ने 12 और 13 अप्रैल के भूकंप के बाद कहा था, ऐसा नहीं लगता है कि भूकंप के ये हल्‍के झटके फॉल्‍ट-लाइन प्रेशर की वजह से आए थे. इन लोकल और कम तीव्रता वाले भूकंपों के लिए फॉल्‍ट लाइन की जरूरत नहीं है. धरातल के नीचे छोटे-मोटे एडजस्‍टमेंट्स होते रहते हैं. इससे कभी-कभी झटके महसूस होते हैं.' भू-वैज्ञानिकों के मुताबिक, बड़े भूकंप फॉल्‍ट लाइन के किनारे आते हैं. बता दें कि टेक्‍टोनिक प्‍लेट्स (Tectonic Plates) के जुड़ने वाली जगह को फॉल्‍ट लाइन कहा जाता है. प्लेट्स जहां-जहां जुड़ी होती हैं, वहां-वहां टकराव ज्यादा होता है और उन्हीं इलाकों में भूकंप ज्यादा आता है. दिल्ली में यमुना तट के करीबी इलाके, पूर्वी दिल्ली, शाहदरा, मयूर विहार, लक्ष्मी नगर, गुड़गांव, रेवाड़ी और नोएडा के नजदीकी क्षेत्र भूकंप की आशंका वाले इलाकों में शामिल हैं.

भू-वैज्ञानिक हल्‍के के बाद बड़े भूकंप को लेकर एकराय नहीं
बर्केले की भूकंप विज्ञान प्रयोगशाला के अध्‍ययनों की मानें तो छोटे झटकों के बाद बड़े झटके के बारे में स्‍पष्‍ट तौर पर कुछ नहीं कहा जा सकता है. अगर ये फॉल्‍ट लाइन प्रेशर की वजह से हैं तो कभी भी बड़ा झटका आ सकता है और सामान्‍य एडजस्‍टमेंट की स्थिति में लंबे समय तक ऐसी कोई घटना नहीं होगी. वहीं, वैज्ञानिक एक और थ्‍योरी पर भी बात करते हैं. उनका मानना है कि ये छोटे झटके फॉल्‍ट लाइन प्रेशर को कम करने के लिए आ सकते हैं. इससे भूकंप के बड़े झटके आने की आशंका घट जाती है. हालांकि, कुछ वैज्ञानिक इसे सिर्फ भ्रम मानते हैं. अमेरिका के भू-विज्ञानी बर्गमैन के मुताबिक, हो सकता है कि ये बड़े भूकंप से पहले आने वाले छोटे झटके हों. ऐसे ही झटके बड़े झटकों के बाद भी महसूस किए जाते हैं. हालांकि, वह कहते हैं कि इस बारे कोई भी अनुमान लगाना नामुमकिन है.

हल्‍के झटकों के बाद हफ्तेभर के अंदर उनसे थोड़ी ज्‍यादा तीव्रता के भूकंप की 10 फीसदी आशंका बनी रहती है.


हल्‍के झटकों के बाद हफ्ते भर में भूकंप की होती है आशंका
बर्गमैन कहते हैं कि भूकंप के हल्‍के झटके बड़े झटके के बाद के हालात से निपटने की तैयारी कर लेने का संकेत देते हैं. हल्‍के झटकों के बाद हफ्तेभर के अंदर उनसे थोड़ी ज्‍यादा तीव्रता के भूकंप की 10 फीसदी आशंका बनी रहती है. इन छोटे झटकों से घबराने की जरूरत नहीं है, लेकिन इनके बाद आपको अलर्ट हो जाना चाहिए. भूकंप आने का कारण जानने के लिए धरती की बनावट को समझना जरूरी है. धरती की बनावट को चार हिस्सों इनर कोर, आउटर कोर, मेटल और क्रस्ट में बांटा जा गया है. इसमें क्रस्ट धरती की सबसे ऊपरी परत होती है, जो आंखों से दिखाई देती है. नदियां, समंदर, पर्वत, पहाड़, पठार सब इसी क्रस्ट का हिस्सा हैं. समंदर के नीचे की जमीन भी इसी क्रस्ट का हिस्सा है.

आखिर क्‍यों आते हैं भारतीय उपमहाद्वीप में विनाशकारी भूकंप
प्लेट टेक्टॉनिक थ्योरी के मुताबिक, इस क्रस्ट में मौजूद प्लेट्स आपस में जुड़ी होती हैं. इन्‍हीं को टेक्टॉनिक प्लेट्स कहा जाता है. संख्या में ये एक दर्जन से ज्यादा हैं. टेक्‍टोनिक प्‍लेट्स हिलती-डुलती रहती हैं. अगर ये थोड़ा बहुत हिलती हैं तो किसी को पता भी नहीं चलता है, लेकिन अगर ये ज्यादा हिलती हैं तो भूकंप आता है. प्लेट्स के जुड़ने की जगह पर टकराव ज्यादा होता है और उन्हीं इलाकों में भूकंप भी ज्यादा आता है. ये प्लेट्स आमने-सामने तो कभी ऊपर-नीचे टकराती हैं. कभी-कभी ये प्‍लेट्स आड़ी-तिरछी भी टकरा जाती हैं. भारतीय उपमहाद्वीप में विनाशकारी भूकंप आते रहे हैं. गुजरात के कच्छ में 2001 में आए भूकंप में हजारों लोगों की जान गई थी. भारत साल करीब 47 मिमी खिसक रहा है. टेक्टॉनिक प्लेट्स में टक्कर के कारण ही भारतीय उपमहाद्वीप में अकसर भूकंप आते हैं. हालांकि, भूजल में कमी से टेक्टॉनिक प्लेट्स की गति धीमी हुई है.

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First published: May 30, 2020, 12:31 PM IST
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