समाज के भले के लिए समाज के साथ मिलकर समाज से कैसे लड़ीं सावित्रीबाई?

न्यूज़18 ​​क्रिएटिव

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Savitribai Phule Death Anniversary : बात लड़कियों की शिक्षा (Girls' Education) की रही हो, महिलाओं के अधिकारों (Women Rights) की, मानवीय संवेदनशीलता की, महामारी से जूझने की या फिर कुरीतियों के खिलाफ खड़े होने की, सावित्रीबाई फुले ने हमेशा निडरता दिखाई.

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  • Last Updated: March 10, 2021, 8:55 AM IST
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भारत की पहली फेमिनिस्ट आइकॉन (First Feminist of India) मानी जाने वाली सावित्रीबाई फुले भारत के सामाजिक सुधार आंदोलन (Social Reforms Movement) की अहम नायिका रहीं. खास तौर से महाराष्ट्र में उन्होंने जिस क्रांति का बिगुल फूंका था, उसे आज तक धरोहर के तौर पर सहेजा जाता है. समाज सुधार में ऐतिहासिक पुरुष ज्योतिबाराव फुले (Jyotiba Rao Phule) ने जब पहला कन्या विद्यालय (Girls School) खोला, तब सावित्रीबाई फुले ने वहां अध्यापन किया इसलिए उन्हें देश की पहली महिला शिक्षिका (First Female Teacher) का खिताब भी हासिल है.

जातिवाद और पुरुष प्रधान सामाजिक व्यवस्था को ललकारते हुए उन्होंने बालिका शिक्षा को समाज के लिए बड़ी ज़रूरत बताया था. जातिगत भेदभाव, अत्याचार और बाल विवाह जैसी कुरीतियों के खिलाफ सावित्रीबाई ने न केवल शिक्षा और सामाजिक कामों के ज़रिये जागरूकता पैदा की बल्कि कविताएं लिखकर खुद को बतौर कवयित्री भी स्थापित किया.

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अपना पूरा जीवन महिलाओं के अधिकारों और शिक्षा की लड़ाई में होम कर देने वाली सावित्रीबाई का नाम और चरित्र आज भी देश दुनिया की कई महिलाओं को प्रेरणा देता है. 66 साल की उम्र में ब्यूबोनिक प्लेग महामारी ने समाज सुधारक को समाज से छीन लिया था. महामारी के खिलाफ निर्णायक लड़ाई के दौर में सावित्रीबाई के वो फैक्ट जानना प्रासंगिक है, जिनकी वजह से वो भारत की महान महिलाओं की लिस्ट में शुमार हैं.
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1. ज्योतिबाराव जब 13 साल के थे, तब 10 साल की सावित्रीबाई की शादी उनसे हो गई थी. बाद में दोनों ने बाल विवाह की कुरीति को खत्म करने के लिए लड़ाई लड़ी.

2. बावजूद इसके कि उन्हें जात बाहर कर दिया गया था, सावित्रीबाई ने महिलाओं की शिक्षा का लक्ष्य छोड़ा नहीं. अपने पति के साथ मिलकर पहली कन्या शाला के बाद दोनों ने 18 और बालिका स्कूल खोले थे.



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3. 1848 में पहले गर्ल्स स्कूल में केवल 9 छात्राएं रजिस्टर हुई थीं. सावित्रीबाई यहां सिर्फ पढ़ाती ही नहीं थीं बल्कि लड़कियां शिक्षा लें और पढ़ाई बीच में ही न छोड़ें, इसके लिए उन्हें आर्थिक रूप से मदद भी देती थीं.

4. सावित्रीबाई महाराष्ट्र के सातारा ज़िले के नैगांव में एक किसान परिवार में जन्मी थीं, जहां शिक्षा को लेकर कोई खास जागरूकता नहीं थी.

5. भारत की आधुनिक फेमिनिस्टों में पहली मानी जाने वाली सावित्रीबाई ने उस समय में विधवाओं के सिर के बाल मुंडवाए जाने की प्रथा का भरपूर विरोध किया था.

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6. 1998 में भारत ने सावित्रीबाई के सम्मान में डाक टिकट जारी कर उन्हें श्रद्धांजलि दी थी.

7. बलात्कार की वजह से पीड़िताओं के मां बनने की नौबत आती थी इसलिए उनके शिशु के जन्म के लिए बहिष्कार झेलना पड़ता था. उस समय में सावित्रीबाई ने इन पीड़िताओं के लिए केयर सेंटर खोले थे.

8. पुणे में ब्यूबोनिक प्लेग महामारी की चपेट में आने वालों के इलाज के लिए सावित्रीबाई ने अपने गोद लिये बेटे यशवंत के साथ मिलकर 1897 में क्लीनिक खोला था. होनी थी कि सेवा करते हुए वो खुद इस महामारी की चपेट में आ गईं.

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9. समाज जिन लोगों को अछूत कहकर बहिष्कार करता था, उनके लिए सावित्रीबाई ने अपने घर में कुआं खुदवाया था, जिससे कोई भी पानी ले और पी सकता था.

10. बगैर पंडों, पुरोहितों और दहेज के खास तौर से अंतर्जातीय विवाह करवाने के लिए सावित्रीबाई ने अपने पति के साथ मिलकर सत्यशोधक समाज की स्थापना की थी.
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