अंतरिक्ष को जानने के लिए वैज्ञानिक क्यों उपयोग करते हैं अलग-अलग टेलीस्कोप

अंतरिक्ष को जानने के लिए वैज्ञानिक क्यों उपयोग करते हैं अलग-अलग टेलीस्कोप
वैज्ञानिक टेलीस्कोप के माध्यम से ही अंतरिक्ष के बारे में जानकारी हासिल कर पा रहे हैं.

अंतरिक्ष और खगोलीय पिंडों (Astronomical objects) के बारे में जानने के लिए वैज्ञानिक अलग-अलग टेलीस्कोप (Telescope) का उपयोग करते हैं जो उन्हें अलग-अलग जानकारी देते हैं.

  • Share this:
नई दिल्ली:  अंतरिक्ष (Space) के बारे में हम कितना कुछ जान चुके हैं. इसमें से बहुत ही कम ऐसी जानकारी है जो हमें पृथ्वी से बाहर जाकर मिली है. धरती पर से ही ऐसे जानकारी हासिल करना बहुत गहरे शोध का विषय है. यह सैकड़ों सालों से जमा की जानकारी का ही नतीजा है कि हम अपने ब्रह्माण्ड (Universe) के बारे में इतना जान सके हैं. इस ज्ञान के पीछे सबसे अधिक योगदान टेलीस्कोप Telescopes) का है. आज हम तरह तरह के टेलीस्कोप का उपयोक कर एक ही खगोलीय पिंड के बारे में बहुत सी जानकारी हासिल कर सके हैं. टेलीस्कोप की कहानी भी कम रोचक नहीं है.

केवल एक ही तरीके से समझा जा सकता है अंतरिक्ष को
अंतरिक्ष को समझने का हमारे पास एक ही तरीका है. वहां से आने वाले प्रकाश का अध्ययन. लेकिन एक ही प्रकाश को देखने समझने के लिए हमें एक से ज्यादा तरह के टेलीस्कोप देखने की जरूरत होती है. अंतरिक्ष में स्थित तारे, गैलेक्सी, ब्लैकहोल सभी को समझने के लिए खगोलविदों को उनसे निकलने वाले इलेक्ट्रोमैक्नेटिक विकिरण से बहुत उम्मीदें हैं. खगोलीय अध्ययन में बहुत से सवालों के जवाब अलग अलग टेलीस्कोप से मिली स्वीरों से पता चलती हैं अलग-अलग टेलीस्कोप खास तरह के इलेक्ट्रोमैग्नेटिक स्पैक्ट्रम का वही हिस्सा समझ पाते हैं, जिसके लिए वे बने हैं. इस तरह हमारे पास साधारण टेलीस्कोप से लेकर रेडियो इंफ्रारेड, एक्स रे, गामा रे टेलीस्कोप तक उपलब्ध हैं.

अंतरिक्ष से आने वाले किरणों से वैज्ञानिकों को वहां कैी जानकारी मिलती है.

एक साथ सारी जानकारी नहीं मिल सकती


इन टेलीस्कोप के साथ समस्या ये है कि ये सभी एक ही समय एक ही घटना की जानाकरी एकत्र नहीं कर सकते. कई बार किसी घटना का अवलोकन करने का समय भी नहीं होता जैसे गामा किरणों को विस्फोट. जो कुछ ही सेकेंड्स तक में खत्म हो सकता है. टेलीस्कोप के पास खगोलीय पिंडों से निकली इलेक्ट्रोमैग्नेटिक तरंगों का ही अध्ययन करने का विकल्प होता है लेकिन अलग अलग तरंगों के लिए अलग टेलीस्कोप होते हैं. जिनका विकास धीरे धीरे ही हुआ.

सबसे पहले टेलीस्कोप ने क्या किया कमाल
खगोल विज्ञान को शायद सबसे पुराने विज्ञानों में से एक कहा जाए तो गलत नहीं होगा. सैकड़ों सालों तक इंसान अपने आकाश के तारों का अध्ययन बिना किसी उपकरण के करता रहा और बहुत सी जानकारी हासिल करने में कामयाब भी हो गया. लेकिन सबसे पहला टेलीस्कोप ऑप्टिकल टेलीस्कोप ही था जो आज से 400 साल पहले बनाया गया था. इसे गैलीलियो ने 1570 में बनाया था जिसकी वजह से बृहस्पति के चार प्राकृतिक उपग्रह खोजे जा सके थे. यह टेली स्कोप भी प्रकाश का केवल वही हिस्सा देख सकता था, जो हम देख सकते थे, लेकिन इससे दूर की चीजें पास दिख सकती थीं.

कुछ टेलीस्कोप पृथ्वी से काम नहीं कर सकते.


ऑप्टिलकल टेलीस्कोप आज भी हैं बहुत काम के
ऑप्टिकल टेलीस्कोप में सुधार हुए और ये लंबे होते चले गए और इनकी लंबाई 140 फीट तक पहुंच गई. लेकिन 17वीं सदी में न्यूटन रिफलेक्टिंग टेलीस्कोप बनाकर टेलीस्कोप को लंबा होने से रोक दिया. आज अंतरिक्ष में स्थापित हबल टेलीस्कोप दुनिया का बेहतरीन ऑप्टिकल टेलीस्कोप है.

रेडियो टेलीस्कोप ने दी जानकारी
इसके बाद रेडियो तरंगों की खोज के बाद रेडियो टेलीस्कोप ने अंतरिक्ष से आने वाली रेडियो तंरगों का पढ़ना शुरू किया. रेडियो टेलीस्कोप बड़े आकार के होते हैं क्योंकि उन्हें आसपास की रोडियो तरंगों से बचना होता है जिसे रेडियो नॉइज (Radio Nosie) कहते हैं.

धरती पर नहीं लगाए जा सकते हैं ये टेलीस्कोप
इसके बाद इंफ्रारेड टेलीस्कोप की बारी आई. लेकिन धरती पर ये नहीं लगाए जा सकते क्योंकि हमारा वायुमंडल इनके लिए बहुत बाधाएं पैदा करता है. इसी लिए या तो इन्हें बहुत ही ऊंचाई पर या फिर अंतरिक्ष में लगाया जा सकता है. ऐसा ही कुछ एक्स रे और गामा रे टेलीस्कोप का भी होता है. 1970 में अमेरिका ने पहला एक्स रे टेलीस्कोप अंतरिक्ष में स्थापित किया जबकि उससे पहले ही साल 1961 में पहला गामा रे टेलीस्कोप भी अंतरिक्ष में भेजा गया था.

क्या मिल सकती है एक टेलीस्कोप से सारी जानकारी
अगल-अलग टेलीस्कोप अलग तरह की घटनाओं की जानकारी भी देते हैं. ब्लैकहोल के बारे में रेडियो तरंगों से ज्यादा जानकारी मिलती है. वहीं गामा किरणों के विस्फोट तो गामा रे टेलीस्कोप से ही पता चल सकता है. लेकिन भी तक कोई ऐसा टेलीस्कोप नहीं बना जो सभी तरह की किरणों को एक बार में पकड़ सके. इसकी वजह यह है कि हर तरह किरणों को पड़ने के तरीका अलग अलग है.

यह भी पढ़ें:

वैज्ञानिकों को दिखा एक गैलेक्सी में X आकार, जानिए क्या है उस आकार की सच्चाई

अब मंगल पर भी रहना होगा मुमकिन! वैज्ञानिकों ने ढूंढ ली है वहां सुरक्षित जगह

दिमाग के महीन संकेतों को लगातार कम्प्यूटर को बताएगा टैटू, यह करेगा कमाल

जानिए क्या है डार्क मैटर और क्यों अपने नाम की तरह है ये रहस्यमय
अगली ख़बर

फोटो

टॉप स्टोरीज