किस चोर बाज़ार में बिक रही है रानी की वो मूर्ति? जो मुंबई के वीटी स्टेशन पर लगी थी

मुंबई के छत्रपति शिवाजी महाराज टर्मिनस को एक सदी तक वीटी यानी विक्टोरिया टर्मिनस के तौर पर पहचाना जाता रहा. यूनेस्को की विश्व धरोहरों की सूची में शामिल इस इमारत पर लगे ऐतिहासिक स्मारक के गायब होने की कहानी चौंकाने वाली है.

News18Hindi
Updated: June 20, 2019, 4:44 PM IST
किस चोर बाज़ार में बिक रही है रानी की वो मूर्ति? जो मुंबई के वीटी स्टेशन पर लगी थी
मुंबई स्थित छत्रपति शिवाजी महाराज टर्मिनस. फाइल फोटो.
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Updated: June 20, 2019, 4:44 PM IST
मुंबई के छत्रपति शिवाजी महाराज टर्मिनस से आप वाकिफ न हों, ऐसा नहीं हो सकता. ये हो सकता है कि इसे आप सीएसटी या वीटी के नाम से जानते हों. ये भी हो सकता है कि आप कभी मुंबई न गए हों, लेकिन फिल्मों, टीवी, मीडिया में कहीं न कहीं इस स्टेशन की तस्वीरें आपने ज़रूर देखी होंगी. ज़रा इस रेलवे स्टेशन की तस्वीर अपनी याद में ताज़ा कीजिए, और गौर कीजिए कि इस बेहतरीन इमारत में लगी घड़ी के नीचे एक जगह खाली दिखाई देती है? ज़रा सोचिए क्यों?

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इस खाली जगह पर लंबे समय तक रानी विक्टोरिया की एक शानदार कारीगरी वाली प्रतिमा हुआ करती थी. 1887 में आज ही के दिन यानी 20 जून को जब बॉम्बे के विक्टोरिया टर्मिनस को लोगों के लिए शुरू किया गया था, तबसे कई सालों तक यह स्टैच्यू घड़ी के नीचे मौजूद था, लेकिन फिर इस स्टैच्यू को हटा दिया गया और ये जानकर आपको ताज्जुब होगा कि वो स्टैच्यू कहां गया? इस सवाल का जवाब किसी विभाग के पास नहीं है.

अब मुंबई के इस स्टेशन को छत्रपति शिवाजी महाराज टर्मिनस कहा जाता है, लेकिन तकरीबन एक सदी तक इसे वीटी यानी विक्टोरिया टर्मिनस के तौर पर ही पहचाना जाता रहा. बेमिसाल कारीगरी, पुरातात्विक और ऐतिहासिक विरासत होने की वजह से ये स्टेशन यूनेस्को की विश्व धरोहरों की सूची में शामिल है. इसके बावजूद इस इमारत पर लगाए गए ऐतिहासिक स्मारक का गायब हो जाना वाकई चौंकाने वाला है. लापता हो चुकी रानी विक्टोरिया की उस मूर्ति की पूरी कहानी पढ़िए.

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सीएसएमटी की इमारत में घड़ी के नीचे की जगह खाली है, यहीं रानी विक्टोरिया की प्रतिमा लगाई गई थी.


आज़ादी के बाद हटवाई गई थी मूर्ति
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देश को ब्रिटिश राज से आज़ादी मिली, तो कुछ सालों बाद देश भर में लगे अंग्रेज़ों के पुतले, प्रतिमाएं और मूर्तियां हटाने की कवायद शुरू हुई. इसी सिलसिले में विक्टोरिया टर्मिनस की इमारत के सामने वाले हिस्से में घड़ी के नीचे लगी रानी विक्टोरिया की मूर्ति भी हटवाई गई. सवाल ये था कि ​हटाकर इसे रखा कहां जाएगा?

भायखला में रानी बाग के भीतर डॉ. भाउ दाजी लाड म्यूज़ियम में हटवाई गई तमाम मूर्तियों को रखा जाना था. ये मूर्ति भी रानी बाग में काफी समय तक रखी रही. इसके बाद हुआ ये कि शहर में उद्योगों और बड़े भवनों का निर्माण शुरू हुआ तो ज़मीनों के आवंटन इधर से उधर हुए. इसी उठापटक में कुछ ही समय में ये मूर्ति गायब हो गई. इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक एक आरटीआई आवेदन दाखिल कर इस मूर्ति के बारे में पूछा गया था तो रेलवे प्रशासन ने इस बारे में कुछ भी पता होने से इनकार कर दिया. यहां तक कि इसे हटवाए जाने का भी कोई रिकॉर्ड नहीं होने की बात कही.

वहीं, दशकों पहले सीएसटी में पदस्थ रह चुके एक रेलवे अधिकारी ने बताया कि 1950 के दशक में मूर्तियां हटवाए जाने की कवायद चली थी. इस अधिकारी का दावा रहा कि उसने भायखला के चिड़ियाघर मैदान में खुले में रानी विक्टोरिया की वो मूर्ति 1980 तक रखी देखी थी, लेकिन इसके बाद से उसका कुछ पता नहीं.

आखिर गई कहां वो मूर्ति?
मीडिया में पहले आई खबरों में सेंट्रल रेलवे के अफसर के हवाले से कहा जा चुका है कि वीटी या सीएसएमटी स्टेशन के रखरखाव और मरम्मत के कामों के दौरान इमारत में सजावट के लिहाज़ से लगे कई शिल्पों का रिकॉर्ड मेंटेन नहीं किया गया, लेकिन इस अहम स्टैच्यू का रिकॉर्ड ज़रूर रखा जाना चाहिए था. वहीं, म्यूज़ियम के पास कुछ मूर्तियों के रिकॉर्ड हैं, लेकिन विक्टोरिया की उस मूर्ति का नहीं. तो फिर ये मूर्ति गई कहां?

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दावे के मुताबिक 1910 में ली गई इस तस्वीर में घड़ी के नीचे रानी की प्रतिमा (लाल बॉक्स में) दिखाई देती है.


डॉ. भाउ दाजी लाड म्यूज़ियम में एमडी रहे और कला इतिहासकार डॉ. तस्नीम ज़कारिया मेहता सहित कुछ और इतिहासकारों का भी अंदेशा रहा है कि वीटी स्टेशन की इमारत से हटी विक्टोरिया की वो मूर्ति या तो बेच दी गई या उसकी तस्करी हो चुकी. इतिहासकार बेचे जाने का अंदेशा कम जताते हैं और तस्करी का ज़्यादा. ज़्यादा लॉजिकल लगने वाला अंदेशा तस्करी का ही है. इसका बड़ा कारण वीटी का इतिहास भी बताता है.

वीटी स्टेशन जहां बनाया गया था, तब उस जगह बोरीबंदर बड़ा बंदरगाह हुआ करता था, जहां से भारत का समुद्री कारोबार होता था. अब भी पोर्ट इस स्टेशन से बहुत दूर नहीं है. आज़ादी के बाद भी कई सालों तक बोरीबंदर प्रमुख बंदरगाह के तौर पर जाना जाता रहा. वहीं, 1960 से 1980 के दशक के बीच बॉम्बे अंतर्राष्ट्रीय तस्करी के लिए मुफीद जगह भी बन चुका था.

क्या होगी अब उस मूर्ति की कीमत?
अगर ये मान लिया जाए कि विक्टोरिया की वो मूर्ति अंतर्राष्ट्रीय तस्कर बाज़ार के हाथों लग चुकी थी, तो यकीनन अब वो दुनिया के किसी बड़े चोर बाज़ार में बतौर बेहतरीन एंटीक बिक रही होगी या बिक चुकी होगी. हालांकि ठीक अनुमान तो कोई नहीं लगा सकता, लेकिन 132 साल से ज़्यादा पुरानी, तराश और बेहतरीन नक्काशी वाली और रत्न जड़ी उस मूर्ति की कीमत 100 करोड़ रुपये से ज़्यादा होने का अंदाज़ा आसानी से लगाया जा सकता है. अगर आप मुंबई जाएंगे, तो वहां के कुछ पुराने और पेशेवर गाइड भी आपको ये आंकड़ा बता सकते हैं.

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First published: June 20, 2019, 4:34 PM IST
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