बाबरी मस्जिद तोड़ी जा चुकी, तब पूजा से उठे थे नरसिम्हा राव! क्या है दावे का सच?

पूर्व प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव.
पूर्व प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव.

Babri Demolition Case Verdict : देश के कुछ चर्चित नेताओं की किस्मत का फैसला आज यानी 30 सितंबर को सीबीआई अदालत (CBI Court) में सुनाया जाने वाला है. सुबह 11 बजे से दोपहर 1 बजे के बीच फैसला सुनाया जा सकता है. इस बीच जानें तमाम किताबों की ज़ुबानी जानें एक ज़रूरी कहानी.

  • News18India
  • Last Updated: September 30, 2020, 2:51 PM IST
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सीबीआई के स्पेशल जज (CBI Judge) सुरेंद्र कुमार यादव बाबरी विध्वंस कांड (Babri Masjid Case) पर अहम फैसले के बाद आज शाम ही रिटायर होने वाले हैं. सीबीआई स्पेशल कोर्ट (Special Court) के बाहर सुरक्षा चाक चौबंद कर दी गई है. ये भी कहा जा रहा है कि बीजेपी के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी (Lalkrishna Advani), मुरली मनोहर जोशी (Murali Manohar Joshi), उमा भारती (Uma Bharati), महंत नृत्य गोपाल दास और कल्याण सिंह कोर्ट में हाज़िर नहीं होंगे.

कोरोना काल (Corona Virus Pandemic) में आ रहे इस अहम फैसले के दिन आपको उस दिन की वो कहानी बताते हैं, जब बाबरी मस्जिद तोड़ी जा रही थी, तब तत्कालीन प्रधानमंत्री (Former Prime Minister) क्या कर रहे थे.

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बाबरी विध्वंस को लेकर तब बगैर बहुमत के चल रही कांग्रेस सरकार की भूमिका को लेकर सवाल खड़े हुए थे.

'नरसिम्हा राव पूजा खत्म करके ही उठे'
'तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव (PV Narsimha Rao) पूजा के लिए बैठे हुए थे, जब कारसेवकों ने अयोध्या स्थित बाबरी मस्जिद विध्वंस शुरू किया. दिवंगत समाजवादी नेता मधु लिमये ने मुझे बताया था कि इस पूजा के दौरान जब राव के एक सहयोगी ने उनके कान में कहा कि मस्जिद नेस्तनाबूद कर दी गई, तब कुछ ही सेकंडों में पूजा संपन्न कर राव उठे थे.' एक किताब में ये दावा किया गया था, जो उस समय भी काफी चर्चित रहा था. लेकिन सवाल है कि आखिर सच क्या था.



वरिष्ठ पत्रकार और लेखक कुलदीप नैयर ने आत्मकथा 'बियॉंड द लाइन्स' में इस तरह के वाकये लिखते हुए सीधे तौर पर तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव को बाबरी विध्वंस के लिए ज़िम्मेदार ठहरा दिया था. हालांकि उनके दावों को राव के बेटे पीवी रंगा राव ने पूरी तरह नकार दिया था और इन्हें बेबुनियाद करार दिया था. रंगा राव ने कहा था :

ऐसा हो ही नहीं सकता कि मेरे पिता ने ऐसा किया हो. जब बाबरी मस्जिद का ढांचा गिराया गया, तब वो बेहद दुखी थे क्योंकि मुस्लिमों के लिए उनके दिल में प्यार था... उन्होंने हमसे कई बार कहा था कि इस तरह की घटना नहीं होनी चाहिए.


वास्तव में, 6 दिसंबर 1992 को हिंदूवादी संगठनों के कार्यकर्ताओं ने भीड़ के तौर पर जमा होकर बाबरी मस्जिद का ढांचा ढहा दिया था. इसके बाद ऐसे कई आरोप और बयान सामने आए थे, कि केंद्र सरकार या प्रधानमंत्री चाहते तो इस घटना को रोक सकते थे. ये आज़ाद भारत के इतिहास की इतनी बड़ी घटना रही है कि बार-बार इस पर बात की जाती रही है. कुलदीप नैयर की किताब के अलावा भी कुछ​ किताबों में इससे जुड़े वाकये और कई लोगों के बयान भी सामने आए.

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तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव पर आरोप था कि वो चाहते तो बाबरी विध्वंस रोक सकते थे, लेकिन उन्होंने कदम नहीं उठाए.


सीतापति ने कहा था नैयर के दावों को झूठ
विनय सीतापति ने अपनी किताब 'हाफ़ लायन' में कुलदीप नैयर के दावों को झूठा करार देते हुए साफ लिखा था कि राव पर मनगढ़ंत आक्षेप लगाए गए. सीतापति के मुताबिक 'मस्जिद गिरने के समय राव के पूजा करने के दौरान क्या कुलदीप नैयर वहां स्वयं मौजूद थे? नैयर ने कहा कि उनको ये जानकारी मधु लिमये ने दी थी और उनको ये बात पीएमओ में उनके एक 'सोर्स' से पता चली थी. लेकिन वो सोर्स कौन था? उसका नाम नहीं बताया.'

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सीतापति ने अपने शोध के हवाले से कहा था कि मस्जिद गिराए जाने के समय राव के सोते रहने या पूजा करते रहने की कहानियां गलत हैं. 'नरेश चंद्रा और गृह सचिव माधव गोडबोले ने यह पुष्टि की थी कि मस्जिद ढहाए जाने की घटना के वक्त राव उनसे लगातार संपर्क में थे और पल-पल की सूचना ले रहे थे.

'राव ने मस्जिद गिरने दी थी क्योंकि..'
नरसिम्हा राव के मीडिया सलाहकार रह चुके के प्रसाद ने भी एक किताब लिखी थी, जिसमें कहा था कि 'मस्जिद गिराए जाने के बाद तीन पत्रकारों निखिल चक्रवर्ती, प्रभाष जोशी और आरके मिश्र ने राव से मेरी मौजूदगी में पूछा था कि 6 दिसंबर को राव ने ऐसा क्यों होने दिया. तब राव ने कहा कि क्या आप लोगों को लगता है कि मुझे राजनीति नहीं आती?'

राव के इस बयान के बारे में विश्लेषकों ने माना था कि उन्होंने राजनीतिक दृष्टिकोण अपनाते हुए ये सोचा था कि अगर मस्जिद गिर गई तो भाजपा की मंदिर मुद्दे की राजनीति खत्म हो जाएगी. इसलिए उन्होंने मस्जिद ढहाए जाने तक सोच समझकर कदम उठाए थे, जिनमें रामालय ट्रस्ट बनवाना भी शामिल था.


अर्जुन सिंह ने लिखा, 'राव बुत बने बैठे थे'
अर्जुन सिंह ने अपनी आत्मकथा 'ए ग्रेन ऑफ़ सैंड इन द आर ग्लास ऑफ़ टाइम' में मस्जिद ढहाए जाने के बाद हुई कांग्रेस के प्रमुख नेताओं की बैठक का किस्सा दर्ज किया था. 'पूरी बैठक के दौरान राव हैरानी में थे. सबकी निगाहें जाफ़र शरीफ़ की तरफ इस तरह थीं कि वही कुछ कहें. शरीफ़ ने कहा था कि देश, सरकार और कांग्रेस को इस घटना की भारी कीमत चुकानी पड़ेगी. माखनलाल फ़ोतेदार उसी समय रोने लगे थे, लेकिन राव बुत बने चुप बैठे रहे.'

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सीबीआई की विशेष अदालत बाबरी विध्वंस पर 30 सितंबर को फैसला देने वाली है.


फ़ोतेदार ने लिखा था, राव ने कुछ नहीं किया
माखनलाल फ़ोतेदार ने आत्मकथा 'द चिनार लीव्स' में राव के साथ हुई बातचीत का वाकया लिखा था. फ़ोतेदार के मुताबिक 'मैंने राव से अनुरोध किया कि वो फ़ैज़ाबाद में तैनात चेतक हेलीकॉप्टरों से कारसेवकों को हटाने के लिए आंसू गैस का प्रयोग करें. लेकिन, राव ने कहा था, 'मैं ऐसा कैसे कर सकता हूं?' फिर मैंने विनती की थी, 'राव साहब एक गुंबद तो बचा लीजिए. ताकि बाद में हम भारत के लोगों को बता सकें कि मस्जिद को बचाने की हमने पूरी कोशिश की थी. तब राव चुप रहने के बाद बोले, मैं आपको फिर फ़ोन करूंगा.'

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फ़ोतेदार ने ये भी ज़िक्र किया था कि मस्जिद ढहाए जाने की घटना के बाद राष्ट्रपति शंकरदयाल शर्मा भी रोए थे और कैसे कैबिनेट मंत्रियों के सामने उन्होंने सीधा आरोप लगाकर कहा था कि इस घटना के लिए राव सीधे तौर पर ज़िम्मेदार हैं, वो चाहते तो रोक सकते थे.

और खुद राव ने क्या कहा अपनी किताब में?
बाबरी विध्वंस के सालों बाद राव ने इस घटना पर केंद्रित एक किताब '6 दिसंबर 1992' लिखकर पूरी घटना पर न केवल अपना पक्ष रखा बल्कि एक और एंगल सामने आया. राव ने लिखा कि उत्तर प्रदेश के राज्यपाल की ज़िम्मेदारी थी कि वो केंद्र को स्थिति ठीक बताते, तभी केंद्र से राष्ट्रपति शासन लगाए जाने जैसा अहम कदम उठाया जा सकता था. इस पूरे एपिसोड को राव ने ऐसे दर्ज किया.

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कई किताबों में बाबरी विध्वंस के समय नरसिम्हा राव की भूमिका का ज़िक्र किया गया.


"6 दिसंबर 1992 से करीब एक हफ्ते पहले राज्यपाल की रिपोर्ट ने केंद्र को बताया कि बड़ी संख्या में कारसेवक अयोध्या पहुंच रहे हैं, लेकिन हालात शांतिपूर्ण हैं. कानून व्यवस्था को कोई खतरा नहीं है. इस रिपोर्ट के आधार पर राज्य के मुख्यमंत्री कल्याण सिंह को बर्खास्त करना या राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाने जैसे कदम उठाना मेरे लिए उचित नहीं था. इसके अलावा राव ने ​ये भी लिखा था कि 'एक्शन मत लीजिए' वाली राज्यपाल की रिपोर्ट के अलावा सुप्रीम कोर्ट की कुछ गाइडलाइंस भी कारण थीं कि केंद्र कुछ न कर पाने के लिए मजबूर था क्योंकि इन निर्देशों ने भी काफी हद तक केंद्र के हाथ बांध रखे थे."

आप खुद समझें कि क्या हुआ था
कुछ और पत्रकारों सहित पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी जैसे नेताओं की किताबें भी इस मुद्दे पर बातें रखती हैं. कोई कहता है कि ये घटना राव के 'राजनीतिक मिसकैलकुलेशन' का नतीजा थी, तो किसी का मानना है कि ये राव और उनकी सरकार की बड़ी असफलता थी. किसी का मानना है कि राव पर भाजपा के साथ सांठ-गांठ की थ्योरी कांग्रेस ने राव को साइडलाइन करने के लिए ईजाद की तो किसी का मानना है कि राव हिंदू भावना के समर्थक थे. इन तमाम किताबों और उस समय के नेताओं की भूमिकाओं व राजनीतिक समीकरणों को समझकर आप खुद तय कर सकते हैं कि वास्तविकता क्या रही होगी.
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