सुप्रीम कोर्ट की वो रूलिंग, जिसके तहत रेप विक्टिम की पहचान ज़ाहिर करना जुर्म है

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हाथरस गैंगरेप केस (Hathras Gang Rape Case) की सुर्खियों के बीच संवेदनशील खबर यह है कि दिग्विजय सिंह (Digvijay Singh), स्वरा भास्कर (Swara Bhaskar) और अमित मालवीय को रेप पीड़ित की पहचान उजागर करने के मामले में नोटिस भेजे जा चुके हैं.

  • News18India
  • Last Updated: October 7, 2020, 3:50 PM IST
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सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court of India) इस स्थिति पर अफसोस ज़ाहिर कर चुका है कि बलात्कार पीड़िताओं को समाज में अछूतों जैसा बर्ताव सहन करना पड़ता है. पीड़िताओं से हमदर्दी जताते हुए शीर्ष कोर्ट की सख्त हिदायत है कि किसी भी सूरत में बलात्कार या यौन शोषण पीड़िता (Rape or Sexual Assault Victim) की पहचान को उजागर नहीं किया जा सकता, पीड़िताओं की मृत्यु के बाद भी और किसी सांकेतिक तरीके से भी नहीं. बलात्कार के मामलों को सनसनीखेज़ तरीके से पेश करने के लिए मीडिया को भी शीर्ष अदालत चेता चुकी है.

उत्तर प्रदेश के हाथरस में कथित दलित समुदाय से ताल्लुक रखने वाली एक युवती के साथ ​वीभत्स बलात्कार और नृशंस हत्याकांड के दौरान कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह, अभिनेत्री स्वरा भास्कर और अमित मालवीय पर पीड़िता की पहचान ज़ाहिर करने के आरोप लगे हैं. इन खबरों के बीच जानना ज़रूरी हो जाता है कि अगर ये आरोप साबित होते हैं तो सुप्रीम कोर्ट के किन निर्देशों और कायदों का सीधे उल्लंघन का मामला बनता है.

पीड़िता की स्थिति पर कोर्ट की हमदर्दी
कोर्ट ने दुख जताया था कि ऐसे मामलों में पीड़िता की कोई गलती न होने के बावजूद समाज उसका तिरस्कार और बहिष्कार करता है बजाय ऐसे जघन्य अपराध के अपराधी के. बेंच ने यह भी कहा था 'कुछ मामलों में तो परिवार तक पीड़ित को अपनाने से इनकार कर देता है. कड़वा सच तो यह है कि कई बार रेप के मामलों में रिपोर्ट तक नहीं की जाती क्योंकि पीड़ित के परिवार को तथाकथित 'इज़्ज़त' और प्रतिष्ठा की चिंता होती है.'
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हाथरस सामूहिक बलात्कार मामले के विरोध में ​प्रदर्शनों का दौर जारी है.


पहचान को लेकर सख्त हिदायतें
सुप्रीम कोर्ट के जजमेंट के मुताबिक 'कोई भी व्यक्ति प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक या सोशल मीडिया आदि किसी भी प्लेटफॉर्म से रेप पीड़ित की पहचान ज़ाहिर नहीं कर सकता और न ही ऐसी कोई जानकारी जिससे पीड़ित को पहचाने जाने की संभावना या रास्ता बनता हो.' पुलिस के लिए हिदायत थी कि जिन पर पीड़िता के नाम या पहचान संबंधी ज़िक्र हो, ऐसे दस्तावेज़ों का या तो सीलबंद रखा जाए या फिर इनकी नकल बनवाकर और उनमें से नाम व पहचान आदि मिटाकर दस्तावेज़ इस्तेमाल में लाए जाएं.

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पीड़िता की मौत की स्थिति में तब ही उसकी पहचान उजागर की जा सकती है, जब ऐसा किया जाना बेहद ज़रूरी और संगत प्रतीत हो, और इस बारे में निर्णय लेने का अधिकार सेशन जज के स्तर या उससे आगे के स्तर के अधिकारियों को है.

मीडिया को ज़िम्मेदार होने के निर्देश
मीडिया का काम है कि मामले को उजागर करे लेकिन उसका यह फर्ज़ भी है कि वो किसी भी हाल में पीड़िता की पहचान की गोपनीयता कायम रखे, अवयस्क पीड़िताओं के मामले में भी... जस्टिस मदन बी ठाकुर और जस्टिस दीपक गुप्ता की बेंच ने करीब दो साल पहले एक मामले की सुनवाई करते हुए मीडिया व पुलिस आदि संस्थाओं से मुखातिब होकर कहा था कि ऐसे मामलों को पब्लिक डोमेन में नहीं रखना चाहिए.

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मीडिया को यह हिदायत भी है कि रेप के मामलों की रिपोर्टिंग के समय पीड़िता से ज़्यादा या बार बार बातचीत नहीं की जानी चाहिए क्योंकि हर बार उसे ट्रॉमा से गुज़रना होता है. मीडिया को समझदारी और हमदर्दी के साथ ऐसे मामलों में रिपोर्टिंग करना चाहिए क्योंकि सनसनी से टीआरपी भले ही मिल जाए, विश्वसनीयता नहीं मिलती.

तमाम अफसरों के लिए फर्ज़
कोर्ट ने कहा था कि केस से जुड़े दस्तावेज़ जिन जिन विभागों और अधिकारियों के सामने पहुंचते हैं, उनका फर्ज़ है कि वो पीड़ित की पहचान को गोपनीय रखें. जिन रिपोर्टों में पीड़ित का नाम उजागर करना हो, उन्हें सीलबंद ढंग से जांच एजेंसियों या कोर्ट तक पहुंचाएं.

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कब ज़ाहिर हो सकती है पहचान?
इस बारे में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि अवयस्क पीड़ित के मामले में या केस POCSO के तहत दर्ज होने वाले मामलों में अगर पहचान उजागर करने से पीड़िता का कोई हित जुड़ा हो, तो स्पेशल कोर्ट इस बारे में अनुमति दे सकती है. बेंच ने उन मांगों को खारिज कर दिया था, जिनमें अवयस्क पीड़िता की मौत के बाद उसकी पहचान उजागर करने की बात कही गई थी.

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कोर्ट के मुताबिक मौत हो जाने का मतलब यह नहीं ​है कि पीड़िता के मान सम्मान से समझौता किया जा सकता है. सुप्रीम कोर्ट इस बात की भी आलोचना की थी कि पहली बार 1961 में ऐसा हुआ था और तबसे अब तक भी कभी कभी अदालतें तक पीड़ित की पहचान उजागर करने की भयानक गलती कर देती हैं.

शीर्ष अदालत ने ये भी कहा था कि अगर रेप पीड़ित वयस्क है और खुद अपनी मर्ज़ी से, बगैर किसी दबाव के अपनी पहचान ज़ाहिर करने का निर्णय ले, तो इस बारे में किसी को कोई आपत्ति नहीं हो सकती.

गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने रेप पीड़ित की पहचान सार्वजनिक न किए जाने को लेकर आईपीसी के 228 A के प्रावधानों के तहत कई गाइडलाइंस तय की हैं, जिनके तहत ऐसे मामलों में पीड़ित की पहचान का खुलासा करना दंडनीय अपराध है, जिसकी सज़ा दो साल कैद तक हो सकती है.
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