महात्मा गांधी पर जारी विवादों के बीच जानिए उनके बारे में 15 खास बातें

उनके निधन को 70 साल हो चुके हैं. लेकिन इतने सालों बाद भी गांधी मजबूती से हमारे बीच बने हुए हैं. आखिर कौन थे गांधीजी? कैसा था उनका व्यक्तित्व? कितने पहलू थे उनके?

Sanjay Srivastava | News18Hindi
Updated: May 19, 2019, 1:34 PM IST
Sanjay Srivastava
Sanjay Srivastava | News18Hindi
Updated: May 19, 2019, 1:34 PM IST
महात्मा गांधी को लेकर हाल के बरसों में लगातार तमाम तरह के बयान और टिप्पणियां आती रही हैं. कुछ उनके पक्ष में कुछ उनके खिलाफ. उनके निधन को 70 साल हो चुके हैं. इतने सालों बाद भी गांधी जी मजबूती से हमारे बीच बने हुए हैं. आखिर कौन थे गांधी जी? कैसा था उनका व्यक्तित्व? इस देश को उन्होंने क्या दिया?

गांधी को लोगों ने अलग-अलग चश्मे से देखा. उनके इतने इतने सारे पहलू हैं कि शायद पूरी तरह समेट पाना आसान नहीं है. मौजूदा विवादों के बीच हमारी विनम्र कोशिश उन गांधी को जानने की होगी, जिनके बारे में जानने के लिए युवा अब कहीं ज्यादा आतुर हैं.



1. माता-पिता कट्टर हिंदू
महात्मा गांधी का जन्म 02 अक्टूबर 1869 को गुजरात के पोरबंदर नामक स्थान पर हुआ था. उनके माता-पिता कट्टर हिंदू थे. पिता करमचंद गांधी गुजरात की एक छोटी सी रियासत पोरबंदर में दीवान थे. वो कुशल प्रशासक थे. उन्हें सनकी राजकुमारों, उनकी दुखी प्रजा और सत्तासीन कट्टर ब्रिटिश अधिकारियों के बीच अपना रास्ता निकालना आता था. बाद में वो राजकोट (काठियावाड़) और वांकानेर में भी दीवान रहे.

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2. सत्य, अहिंसा और सत्याग्रह पर मां का असर था
गांधी जी की मां पुतलीबाई थीं. वह करमचंद गांधी की चौथी पत्नी थीं. करमचंद की तीन पत्नियों के जल्दी-जल्दी निधन के बाद उन्होंने अपने से उम्र में छोटी पुतलीबाई से शादी की थी. जो बहुत धार्मिक थीं. गांधी जी यानी मोहनदास अपने पिता की इन्हीं चौथी पत्नी की आखिरी संतान थे. मां के व्रत और धार्मिकता का असर गांधी जी पर बहुत ज्यादा पड़ा. उनके जीवन में सत्य, अहिंसा और सत्याग्रह की बातें शायद बचपन में मां के प्रभाव से ही आईं. मां से सीखीं ये बातें उन्होंने जीवनभर पकड़कर रखीं.
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3. तब उन्हें अंग्रेजी में बहुत दिक्कत होती थी
गांधी जी पढ़ने में कोई खास नहीं थे. वो औसत छात्र थे. कुछ विषयों में औसत से भी नीचे.. 1887 में मोहनदास ने जैसे-तैसे 'बंबई यूनिवर्सिटी' की मैट्रिक की परीक्षा पास की. भावनगर स्थित 'सामलदास कॉलेज' में दाख़िला लिया. अंग्रेज़ी भाषा समझने में उन्हें दिक्कत होती थी. वो डॉक्टर बनना चाहते थे, लेकिन वैष्णव परिवार में चीरफाड़ पर निषेध था लिहाजा बड़े भाई ने उन्हें बैरिस्टर बनाने का फैसला किया.

गांधी जी जब कॉलेज में पढ़ने लगे तो उन्हें अंग्रेजी में बहुत दिक्कत होती थी. इसे उन्होंने बाद में अपनी मेहनत से दूर किया


4. मोटा कर्ज लेकर पढ़ाई के लिए भेजा गया ब्रिटेन
उन्हें पढ़ाई के लिए इंग्लैंड भेजा गया. हालांकि इसका खर्चा गांधी जी के परिवार ने काफी मोटा कर्ज लेकर पूरा किया. चूंकि वो समुद्र से दूर देश जा रहे थे, जो उन दिनों धार्मिक तौर पर अच्छा नहीं समझा जाता था, लिहाजा उनके परिवार को जाति से बहिष्कृत करने की भी धमकी दी गई.

सितंबर 1888 में वो पानी के जहाज़ पर सवार हुए. जब वो इंग्लैंड से बैरिस्टर की पढ़ाई पूरी करके वापस लौटे तो यहां वकालत करने की कोशिश की. गांधी जी का व्यक्तित्व उन दिनों ऐसा था और बोलने में उन्हें इतनी झिझक होती थी कि उनकी वकालत भारत में ठप हो गई.

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5. दक्षिण अफ्रीका ने बना दिया नेता
तभी उन्हें दक्षिण अफ्रीका से एक मुस्लिम गुजराती व्यापारी ने अपनी फर्म का मुकदमा लड़ने के लिए वहां बुलाया. सही अर्थों में गांधी जी को दक्षिण अफ्रीका ने ही नेता और सत्याग्रही बना दिया. वो प्रिटोरिया जा रहे थे. पहली श्रेणी के डिब्बे में तब अंग्रेजों के लिए जगह खाली करनी पड़ती थी, बेशक आपके पास वाजिब टिकट हो. ऐसा जब उनके साथ हुआ और उन्होंने विरोध किया तो उनका सामान रेलवे के प्रथम श्रेणी के डिब्बे से बाहर फेंक दिया गया. उन्होंने स्टेशन पर ठिठुरते हुए रात बिताई.

6. आंदोलन किए, जीत हासिल की और पहचान बनाई
यात्रा के अगले चरण में उन्हें एक घोड़ागाड़ी के चालक से पिटना पड़ा, क्योंकि उन्होंने पायदान पर यात्रा करने से मना कर दिया था. उनके यूरोपीय लोगों के लिए सुरक्षित होटलों में जाने पर रोक लगाई गई. हालांकि ये अपमान वहां रह रहे भारतीय व्यापारियों और श्रमिकों के लिए रोजाना के जीवन का हिस्सा था.

दक्षिण अफ्रीका दरअसल गांधी जी के जीवन का सबसे बड़ा टर्निंग प्वाइंट था, जिसने उन्हें आत्मविश्वास भी दिया और अन्याय के खिलाफ संघर्ष करना सिखाया


गांधी जी को ये खराब लगा तो उन्होंने इसका कानून के अनुसार विरोध करना शुरू किया. दक्षिण अफ्रीका में उन्होंने ज्यादती के खिलाफ कई लड़ाइयां लड़ीं. आंदोलन किए और जीत हासिल की. गांधी कुछ ही सालों में वहां प्रसिद्ध हो गए.

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7. आम जनता से जुड़ने वाले नेता बने
देखते ही देखते उनके कामों की प्रसिद्धी भारत पहुंचने लगी.1915 में गांधी पूरे तौर पर भारत आ गए. उनका लक्ष्य भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में साथ निभाना था. पहले साल वो पूरे भारत की यात्रा करते रहे. उसे समझते रहे.

हालांकि उनकी कोशिशों को तत्कालीन कांग्रेस नेताओं से बहुत सहयोग नहीं मिला. लेकिन जब उन्होंने चंपारण में नील की खेती करने वाले अंग्रेजों के खिलाफ आंदोलन शुरू किया. किसानों को जीत दिलाई तो देशभर में उनकी पहचान बनी. इसके बाद गांधी देश के ऐसे नेता बन गए, जो आम जनता के नेता थे. यही उनकी सफलता थी. उन्होंने अहिंसा का नया मंत्र दिया.

8. पूरी दुनिया में हर साल उन पर छपता है ढेरों साहित्य
गांधी जी के निधन के सात दशक बीत जाने के बाद भी उनका जीवन और विरासत अब भी चर्चा के केंद्र में है. उन पर कई ऐसे देशों में काम किया जाता है, जिनके बारे में गांधी जानते तक नहीं थे. पूरी दुनिया में उनके विचारों की तारीफ होती है. गांधी के वैश्विक महत्व का पता हर साल बड़े पैमाने पर दुनियाभर में उन पर प्रकाशित होने वाली पुस्तकों से चलता है.

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9. यकीनन उनमें विसंगतियां भी हैं लेकिन
गांधी ने लंबा जीवन जिया. उनकी मृत्यु के बाद शायद ही कभी उनकी प्रसिद्धी कम हुई बल्कि ये बढ़ती ही जा रही है. विद्वानों और आम आदमी दोनों के लिए वह बहुत दिलचस्प व्यक्तित्व हैं. यकीनन उनमें विसंगतियां भी थीं. कई बार वो असांसारिक संत के रूप में व्यवहार करते थे. कई बार राजनीति में डूबे नेता की तरह. उनके जीवन के इतने पहलू और रंग हैं कि वो हैरत में भी डाल देते हैं.

यकीनन उनमें विसंगतियां भी रही होंगी. लेकिन मानवता और सत्य की राह पर वो हमेशा डटे रहे, इसमें कई बार ऐसे मौके आए जब उन्हें गलत समझा गया, खुद उन्हीं के साथियों ने उनका विरोध किया


10.  वो कृष्ण के अनन्य भक्त थे
उन्होंने कई भूमिकाएं भी निभाईं. वह धर्मविज्ञानी थे. कृष्ण के अनन्य भक्त. न्यायकर्ता. आदर्श ग्रामीण. सफाई व्यवस्था के लिए आवाज उठाने वाले. खानपान में अपने तरीके से प्रयोग करने वाले. खुद को इसका विशेषज्ञ मानने वाले. चिकित्सक, जिसके तरीके से बेहद देसी और जमीन से जुड़े थे. दलितों के उद्धारक. शांतिदूत. उम्दा लेखक. पत्रकार. दर्शनशास्त्री. जबरदस्त आग्रही. वो आम जनता के सबसे बड़े नेता थे. वो जोशीले भाषण नहीं देते थे लेकिन जो भी बोलते थे, उसे गंभीरता से सुना जाता था.

11. वो दौर जिसमें एक ओर गांधी थे दूसरी ओर लेनिन
गांधी के दौर में एक और शक्तिशाली राजनीतिक शख्सियत ने दुनिया पर गहरी छाप छोड़ी. वह लेनिन थे. गांधी और लेनिन एकदम अलग थे. दोनों क्रांतियों के जन्मदाता थे. एक का विश्वास हिंसक तांडव में था तो दूसरे का अहिंसा से रास्ता बनाने में.

एक ने मानव जाति के अपने शत्रुओं को बेरहमी से कुचला तो दूसरे ने मानव और मानवता से प्यार किया. गांधी ने अहिंसा के जरिए कहीं अधिक टिकाऊ विजय का रास्ता खोला. उन्होंने सिखाया कि कठोर तानाशाहियां भी अहिंसक प्रतिरोध का सामना नहीं कर सकतीं.

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12.  कैसे पिता थे
यकीनन गांधी जी को एक बुरे पिता के तौर पर पेश किया जाता है, क्योंकि उन्होंने अपने बच्चों पर कभी तरीके से ध्यान नहीं दिया. बेटों की पढ़ाई और शादी पर अपने विचार जबरदस्ती लादने की कोशिश की. इससे उनका बड़ा बेटा हरिलाल विद्रोही भी हो गया. ये भी सही है कि गांधी विरोधाभासों का मिश्रण थे. अक्सर वो विरोध बर्दाश्त नहीं कर पाते थे. वो नम्र थे पर गर्वीले थे, नए विचारों के प्रवर्तक थे. हालांकि अपने जीवन में उन्होंने कभी परंपरा का दामन नहीं छोड़ा.

गांधीजी सच्चे हिंदू थे. ईश्वर में आस्था रखते थे. अक्सर वो अपने डॉक्टरों से कहते थे कि मैं अपनी हल्की फुल्की बीमारियां तो रामचरित मानस के श्लोकों को पढ़कर ही ठीक कर लेता हूं


13. सच्चे हिंदू और रामचरित मानस पर भरोसा करने वाले
आमतौर पर इतिहास को प्रभावित करने वाले लोग बहुआयामी व्यक्तित्व और खासियतों से मिलकर बने होते हैं. गांधी जी ऐसे ही थे. खासे धार्मिक और ईश्वर को मानने वाले. वो हमेशा खुद को सच्चा हिंदू कहते थे. लेकिन ऐसा हिंदू जो दूसरे धर्मों का भी उतना ही आदर करता है. जीवन के अंतिम दिनों में अपनी पूजा-पाठ और रामचरित मानस के मंत्रों पर उन्हें इस कदर भरोसा था कि उन्हें महसूस होता था कि वह अपनी बीमारियों का निदान इसी से कर लेंगे.

14. मशीनों से नफरत करते थे
मशीनों से वह नफरत करते थे. उन्हें लगता था कि ये मशीनें पूंजीवाद की वाहक हैं, हालांकि उनके करीबियों में पूंजीपतियों की कोई कमी नहीं थी. पर वह देश को देशज तरीकों से ही आत्मनिर्भर बनाने के पैरोकार थे.

15. प्रसिद्धी के शिखर पर भी शौचालय साफ करते थे
अपनी प्रसिद्धी औऱ प्रभाव के शिखर पर भी उन्हें शौचालय साफ करने में आनंद मिलता था. उनकी सरलता ही उनका कवच थी. जब उन्हें गोली मारी गई तो वह एक व्यक्ति नहीं रह गए थे बल्कि एक किवदंती बन चुके थे.

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