जानें 7 दशक से लॉकडाउन में बसर कर रहे 254 गांवों के 70 हजार लोगों की कहानी

जानें 7 दशक से लॉकडाउन में बसर कर रहे 254 गांवों के 70 हजार लोगों की कहानी
भारत और बांग्‍लादेश की सीमा पर नो मेंस लैंड में बसे 254 गांव के 70 हजार से ज्‍यादा लोग बंटवारे के बाद से लॉकडाउन की स्थिति में जी रहे हैं. (फोटो साभार: DW)

कोरोना वायरस (Coronavirus) को फैलने से रोकने के लिए भारत में 52 दिन से लॉकडाउन (Lockdown) लागू है. इतने दिनों के बाद अब लोग घरों से निकलने को बेचैन होने लगे हैं. वहीं, भारत और बांग्‍लादेश सीमा पर नो मेंस लैंड में रहने वाले ऐसे हजारों लोग हैं, जो बंटवारे के समय से लॉकडाउन के हालात में जी रहे हैं.

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कोरोना वायरस (Coronavirus) के फैलने की रफ्तार पर ब्रेक लगाने के लिए केंद्र सरकार ने 24 मार्च की रात 12 बजे से पूरे देश में लॉकडाउन (Lockdown) की घोषणा कर दी थी. लॉकडाउन को आज 52 दिन हो चुके हैं. इस बीच लोगों को रोजमर्रा के सामान की खरीदारी समेत मेडिकल सुविधा हासिल करने के लिए छूट भी मिलती रही. इसके अलावा कई दूसरे जरूरी काम होने पर भी छूट दी गई. धीरे-धीरे पाबंदियां घटाई जा रही हैं और ढील में इजाफा किया जा रहा है. इसके बाद लोग भी अब घरों से निकलने को बेचैन होने लगे हैं. इस बीच हम आपको बता रहे हैं 254 गांवों के 70 हजार से ज्‍यादा ऐसे लोगों की कहानी, जो सिर्फ 52 दिन से नहीं बल्कि सात दशक से लॉकडाउन के हालात में जीवन जी रहे हैं. ये 254 गांव बंटवारे के बाद बने भारत (India) और पूर्वी पाकिस्‍तान (अब बांग्लादेश) की सीमा पर मौजूद नो मेंस लैंड पर बसे हैं. इनके हालात बंटवारे के बाद भी नहीं बदले हैं.

बाड़ में बने गेट से आते-जाते हैं नो मेंस लैंड के लोग
भारत और बांग्‍लादेश (Bangladesh) के बीच अंतरराष्ट्रीय सीमा पर कंटीले तारों की बाड़ बनाई गई है. नो मेंस लैंड में बसे इन 254 गांवों के लोग तय समय पर ही बाड़ में बने गेट के जरिये आवाजाही कर सकते हैं. अब कोरोना वायरस की वजह से उनके बाहर निकलने पर ही पाबंदी लगा दी गई है. बहुत ही ज्‍यादा जरूरी होने पर सीमा सुरक्षा बल (BSF) के लोग उन्‍हें बाहर निकलने देते हैं. भारत-पाकिस्‍तान विभाजन के समय खींची गई रेखा के कारण बंगाल और बांग्लादेश की सीमा पर बसे 254 गांवों के 70 हजार से ज्‍यादा लोग साल के 365 दिन लॉकडाउन जैसी स्थिति में रहते हैं. रेडक्लिफ आयोग के प्रमुख सर रेडक्लिफ के अजीबोगरीब तरीके से सीमाओं का बंटवारा करने का खामियाजा आज तक लोगों को भरना पड़ रहा है. कई गांवों में तो हालत ये हो गई कि उनके कुछ घरों का आगे का दरवाजा भारत में और पीछे का बांग्‍लादेश में खुलता था.

रेडक्लिफ आयोग के प्रमुख सर रेडक्लिफ के अजीबोगरीब तरीके से सीमाओं का बंटवारा करने का खामियाजा आज तक नो मेंस लैंड में आए गांवों के लोगों को भरना पड़ रहा है.

कैदियों जैसे हैं हालात, कोरोना संकट ने बढ़ाई दिक्‍कत


नो मेंस लैंड में वैसे तो कोई रह नहीं सकता, लेकिन यहां हजारों लोग रहते हैं. रहन-सहन, बोली औऱ संस्कृति में काफी हद तक समानता के कारण पता भारतीय और बांग्‍लादेशी नागरिक में अंतर करना मुश्किल है. इन लोगों में सीमा पार से शादी-ब्याह भी सामान्य सी बात है. भौगोलिक स्थिति की वजह से इस मामले में न तो सीमा सुरक्षा बल के जवान कोई हस्तक्षेप कर पाते हैं और न ही बार्डर गार्ड्स बांग्लादेश (BGB) के लोग कुछ कहते हैं. इन गांवों में रहने वाले लोग सीमा के दोनों तरफ बाजारों में आसानी से आवाजाही करते हैं. फिर भी इनके हालात कैदियों से कम नहीं हैं. अब कोरोना की वजह से हालात और खराब हैं. डीडब्‍ल्‍यू की रिपोर्ट के मुताबिक, नो मैंस लैंड में रहने वाले जैनुल अबेदिन कहते हैं कि जीरो लाइन पर रहना तलवार की धार पर रहने जैसा है. हमें कोई सरकारी सहायता नहीं मिलती. वहीं, बांग्लादेशी अपराधी भी हमें परेशान करते रहते हैं.

पांच साल पहले हुई कोशिश ठंडे बस्‍ते में डाल दी गई
नदिया जिले के झोरपाड़ा गांव के बीचो-बीच इच्छामती नदी बहती है. गांव के अनिरुल कहते हैं कि हमारे लिए क्या लॉकडाउन और क्या खुला? हमारी तो कई पीढ़ियां लॉकडाउन में ही गुजर गईं. साल 2015 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कोशिशों के बाद थल सीमा समझौते के समय भी इन गावों को स्थानांतरित करने का मुद्दा उठा था. इसमें कई समस्याएं होने की वजह से यह मुद्दा ठंडे बस्ते में डाल दिया गया. लोग नो मेंस लेंड में मौजूद अपने घरों और खेतों को छोड़ने के लिए तैयार नहीं हैं. अनिरुल कहते हैं कि यहां तो हम खेती से गुजर-बसर कर लेते हैं, लेकिन मुआवजा नहीं मिलने पर हम पुरखों की जगह छोड़कर दूसरी जगह कैसे जा सकते हैं? नो मेंस लैंड के काफी बच्‍चे पढ़ने के लिए बांग्‍लादेश के स्‍कूलों में जाते हैं तो काफी लोग इलाज के लिए भी वहीं जाते हैं.

बीएसएफ के जवान तय समय पर कंटीली बाड़ में लगे गेटों को खोलते हैं. इसके बाद ये लोग भारत की सीमा में आकर अपना काम निपटाकर नो मेंस लैंड में लौट जाते हैं.


आधे भारत में तो आधे बांग्‍लादेश में हैं कई घर-कुएं
भारत से लगी बांग्लादेश की 4,096 किमी लंबी सीमा में 2,216 किमी अकेले बंगाल के उत्तर से दक्षिण तक फैले 10 जिलों से सटी हुई है. सीमा पर कंटीले तारों की बाड़ लगाने के बाद 254 गांवों के 70 हजार लोग बाड़ के दूसरी ओर ही रह गए. सात दशक से इन हजारों लोगों के लिए ये बाड़ में लगे गेट निश्चित समय पर ही खुलते हैं. जलपाईगुड़ी के हल्दीबाड़ी इलाके में कई कुएं ऐसे हैं, जिनका आधा हिस्सा बांग्लादेश में है. सड़कों का भी यही हाल है. टमाटर की पैदावार के लिए मशहूर इस इलाके में ज्यादातर घर ऐसे ही हैं, जिनका मुख्यद्वार भारत में खुलता है तो पिछला बांग्लादेश में खुलता है. कोलकाता से सटे उत्तर 24-परगना जिले से लेकर दक्षिण दिनाजपुर औऱ कूचबिहार तक ऐसे गांव भरे पड़े हैं.

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