दिल्ली को खतरनाक भूकंप से बचना है तो जापान से सीखने लायक क्या है?

दिल्ली को खतरनाक भूकंप से बचना है तो जापान से सीखने लायक क्या है?
कर्नाटक में भूकंप के तेज झटके

पिछले तीन हफ्तों के दौरान Delhi और उसके आसपास कुल 11 भूकंप के झटके महसूस किए जा चुके हैं. एक्सपर्ट चेतावनी दे रहे हैं कि दिल्ली को निकट भविष्य में बड़े Earthquake का सामना करना पड़ सकता है. दिल्ली ऐसी किसी स्थिति के लिए कितनी तैयार है? जानिए दिल्ली के सामने भूकंप से जुड़ा खतरा कितना बड़ा है.

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भूकंप विज्ञान (Seismology) के राष्ट्रीय केंद्र ने पिछले पांच दिनों में तीन और बीते 12 अप्रैल से 29 मई के बीच Delhi-NCR में भूकंप के दस झटके (Tremors) रिकॉर्ड किए हैं. 3 जून की देर शाम 3.2 मैग्नीट्यूड का भूकंप नोएडा (Noida) के पास महसूस किया गया, जिसके झटके दिल्ली और आसपास भी दर्ज हुए. जानकार कह रहे हैं कि दिल्ली ​में आने वाले दिनों में बड़े भूकंप का खतरा है. ऐसे में क्या सवाल खड़े होते हैं? दिल्ली भूकंप के लिए कितनी तैयार है? क्या करना और सीखना ज़रूरी है? तमाम पहलुओं को टटोलना ज़रूरी है.

तो कब आने वाला है बड़ा भूकंप?
'समय नहीं बताया जा सकता.' विज्ञान और तकनीक के केंद्रीय मंत्रालय के तहत हिमालयीन भू विज्ञान संबंधी एक स्वायत्त संस्था वाडिया इंस्टिट्यूट के प्रमुख डॉ. कलाचंद साएन के हवाले से खबरों में कहा गया, 'जगह, समय और तीव्रता की भविष्यवाणी नहीं की जा सकती, लेकिन एनसीआर क्षेत्र में ज़मीन के भीतर लगातार भूकंप जैसी हरकतें हो रही हैं इसलिए दिल्ली में एक बड़े भूंकप की आशंका तो है.'

दिल्ली में कैसा है भूकंप का खतरा?



जानकारों के मुताबिक हल्के और मामूली दर्जे के भूकंप से जानोमाल को न के बराबर नुकसान होता है. रिक्टर स्केल पर 5 से कम मैग्नीट्यूड का भूकंप कोई खास नुकसान नहीं करता, अगर बहुत ही खराब संरचनाएं न हों तो. दूसरी तरफ, दिल्ली भारत के भूकंप नक्शे में ज़ोन चार में है. ज़ोन चार और पांच में नुकसान की बड़ी आशंका वाले स्थानों को रखा गया है.



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दिल्ली में बड़ा भूकंप आया तो इमारतों समेत जानोमाल को भारी नुकसान होने की आशंका है. फाइल फोटो.


क्यों नहीं होता दिल्ली को नुकसान?
दिल्ली के अतीत में कई भूकंपों का ज़िक्र आपको मिलेगा लेकिन इक्का दुक्का को छोड़कर दिल्ली में भूकंप से कभी बड़ा नुकसान हुआ नहीं. तो क्या इसका मतलब यह है कि दिल्ली में भूकंप का कोई बड़ा खतरा नहीं है? नहीं. दिल्ली और उसके आसपास के इलाके खतरनाक भूकंपों की आशंका के दायरे में हैं. लेकिन, हिमालयी क्षेत्रों में बड़े भूकंप भी आएं तो भी दिल्ली अपनी भौगोलिक सेटिंग के कारण बड़े नुकसान से बच जाता है.

दिल्ली को किन सवालों का हल ढूंढ़ना होगा?
1. क्या दिल्ली किसी बड़े भूकंप के लिए तैयार हैं?
2. क्या बड़ी आबादी के पास भूकंप को लेकर जागरूकता है?
3. क्या आपदा की स्थिति में दिल्ली के पास पर्याप्त डेटा, ट्रेंड फोर्स और साधन हैं?
4. क्या भूकंप के खतरे की जड़ को समझा गया है और उसका कोई हल निकाला गया है?

तो कई इमारतें ढह जाएंगी..!
दिल्ली में सबसे बड़ी समस्या यह है कि यहां ​इमारतों के निर्माण ठीक नहीं हैं. भारतीय स्टैंडर्ड ब्यूरो की रिपोर्ट कहती है कि निर्माण में गाइडलाइन्स का पालन नहीं किया गया है. यूके एक्सप्रेस को आईआईटी जम्मू के प्रोफेसर चंदन घोष ने बताया कि बिल्डरों और आर्किटेक्टों के बीच एक नेक्सस है इसलिए निर्माण में समझौते होते हैं.

बीती 29 मई को आया भूकंप रिक्टर स्केल पर 4.5 मैग्नीट्यूड का था. घोष के मुताबिक अगर दिल्ली में 6.0 मैग्नीट्यूड का भूकंप आया तो भारी नुकसान होगा. कई इमारतें ज़मीदोज़ हो जाएंगी. ऐसी स्थिति में जापान से दिल्ली को सबक लेने की ज़रूरत है.


जापान से लेने ही होंगे ये सबक
दुनिया के जो देश भूकंप के सबसे ज़्यादा शिकार होते रहे हैं, उनमें से पैसिफिक फायर रिंग में स्थित जापान एक है. जापान को सुनामी संबंधी भूकंप जैसी आपदाओं का अनुभव है इसलिए उसके पास दिल्ली ही नहीं बल्कि दुनिया को सिखाने के लिए बहुत कुछ है.

1. जापान में कंस्ट्रक्शन कोड का सख्ती से पालन होता है. प्रोफेसर घोष के मुताबिक जापान में जो संरचनाएं हैं, निर्माण है, वह ​इस हिसाब है कि 7 से 8 मैग्नीट्यूड तक का भूकंप झेल सकें. दूसरी तरफ, भारतीय मौसम विभाग के भूकंप जोखिम इकाई के पूर्व प्रमुख डॉ. एके शुक्ला ने भी माना कि​ जो मौजूदा बिल्डिंग कोड हैं, उन्हें तत्काल बदले जाने की ज़रूरत है. दिल्ली सरकार का पोर्टल भी यह बात मानता है कि बड़े भूकंप के समय निर्माण की संरचनाएं जोखिम में रहेंगी.

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2012 में जापान में 7 मैग्नीट्यूड के भूकंप से भी इमारतों को खास नुकसान नहीं हुआ था. फाइल फोटो.


2. सूचनाओं को लेकर सतर्कता बरतने की ज़रूरत होती है. फुकुशिमा न्यूक्लियर प्लांट के भूकंप के समय जापान की आलोचना इसलिए हुई थी कि वह जल्दी और सटीक सूचनाएं नागरिकों को नहीं दे सका. इससे अफवाहें फैलीं और कई तरह के संदेशों से भ्रम बना. सीखना यह चाहिए​ कि नेतृत्व समय पर विश्वसनीय और ईमानदार सूचनाएं अपने देश को दे.

3. जो जितनी बड़ी व्यवस्था होती है, उतनी ही जटिल भी इसलिए सरकारी विभागों, निजी सेवाओं और नागरिकों को मिलकर आपदा के समय में सामना करना चाहिए. यह जापान कई बार सिखा चुका है. भूकंप जैसी बड़ी आपदाओं के समय भी वहां लूट या हत्याओं या दंगों जैसी स्थिति कभी नहीं रही.

4. आपदा प्रबंधन सिस्टम को बेहतर करना ही चाहिए. जापान में 2 लाख से ज़्यादा लोगों की प्रशिक्षित फोर्स आपदा प्रबंधन के लिए हमेशा तैयार रहती है. भारत जैसी बड़ी आबादी वाले देश में तो इससे कहीं ज़्यादा बड़ी फोर्स होनी चाहिए.

भारत में भूकंप के विषय पर बहुत कम विशेषज्ञ हैं. यह कोई और नहीं बल्कि दिल्ली सरकार की एक वेबसाइट कहती है. इस पर लिखा है कि भूकंप संबंधी बेहतर रिसर्च, बेहतर संस्थाओं बेहतर मानव संसाधन विकास की ज़रूरत बनी हुई है. जनजागरूकता कार्यक्रमों के साथ ही भूकंप जैसी आपदाओं से निपटने के लिए बेहतर और बड़े कदम उठाने के लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति की ज़रूरत इस लेख में बताई गई है.


दिल्ली में भूकंप से सुरक्षा की कोई उम्मीद है?
इस बारे में डाउन टू अर्थ पर प्रकाशित एक विशेषज्ञ लिखित लेख में कहा गया है कि इसका हल यही है कि मौजूदा इमारतों को मज़बूत किया जाए. स्टैंडर्ड कोड्स को बेहतर किया जाए. भूकंप से जुड़े नियमों का पालन करने संबंधी कानूनी व्यवस्था होना चाहिए. इमारतों की उम्र और उनके नवीनीकरण का समय तय किया जाना चाहिए. दूसरे, इमारतों के निर्माण के समय पूरी निगरानी होनी चाहिए और ज़रूरी सर्टिफिकेट निर्माण की क्वालिटी पर दिए जाने चाहिए. तीसरे जनजागरूकता के तमाम प्रयास होने चाहिए.

1 सितंबर को प्राकृति आपदाओं को घटाए जाने का दिन जापान में मनाया जाता है. 1923 में यह दिन 8.5 मैग्नीट्यूड के बिग टोक्यो भूकंप के लिए जाना जाता है. इस दिन पूरा देश भूकंप की ड्रिल में जुट जाता है, हर तरफ एंबुलेंस दौड़ती हैं, फायर फाइटर और मेडिकल अमला मुस्तैद हो जाता है. नतीजा यह होता है कि जब भी जापान में भूकंप आता है तो तीव्रता के हिसाब से मौतों की संख्या कम होती है.

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First published: June 4, 2020, 5:49 PM IST
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