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क्या होता है 'एक्ट ऑफ गॉड' और कब, कैसे लागू होता है?

न्यूज़18 क्रिएटिव

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भारत की जीडीपी (GDP of India) के बुरी तरह लुढ़क जाने के बाद वित्त मंत्री (Finance Minister) का 'एक्ट ऑफ गॉड' संबंधी बयान चर्चा में बना हुआ है. Covid-19 और लॉकडाउन के चलते अर्थव्यवस्था को जो करारा झटका लगा है, उसके बीच इस कॉंसेप्ट के कानूनी पहलू क्या हैं? दुनिया में इस कॉंसेप्ट के आधार पर उबरने की कोशिशें हो रही हैं या सिर्फ भारत में ही?

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    कोरोना वायरस (Coronavirus) महामारी के कारण दुनिया भर में अर्थव्यवस्थाओं (World Economy) पर बुरा असर पड़ा है. हाल में, भारत में जीडीपी के जो आंकड़े जारी हुए, उनके मुताबिक भारत की जीडीपी -24% के करीब तक लुढ़क गई, जो दुनिया में सबसे बुरी तरह प्रभावित अर्थव्यवस्था (Covid 19 Effected Economy) साबित हुई. इस बीच देश की वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण (Nirmala Sitaraman) ने अर्थव्यवस्था पर पड़े इस असर की तुलना 'एक्ट ऑफ गॉड' से की. इसके बाद से यह बहस का मुद्दा बना हुआ है.

    एक तरफ, पी चिदंबरम, अभिषेक मनु सिंघवी और सुब्रमण्यम स्वामी जैसे नेता सीतारमण के बयान पर सवाल खड़े कर रहे हैं तो दूसरी तरफ, यह विश्लेषण भी हो रहा है कि अन्य देश अर्थव्यवस्था पर कोविड 19 के असर को किस तरह से डील कर रहे हैं. इस बीच सबसे ज़रूरी बात यही है कि कानूनी तौर पर एक्ट ऑफ गॉड क्या है?

    क्या है एक्ट ऑफ गॉड?
    वैधानिक तौर पर इसे फोर्स मैज्योर क्लॉज़ (FMC) के तौर पर समझा जाता है. यह इस ​तरह की स्थिति होती है, जिसमें दोनों तरफ की पार्टियां दायित्व मुक्त हो जाती हैं क्योंकि यह स्थिति वश में नहीं होती. यह फ्रेंच टर्म है, जिसे एक्ट ऑफ गॉड के कॉंसेप्ट के तौर पर समझा जाता है. इसमें प्राकृतिक आपदाओं के साथ ही युद्ध जैसी आपातकाल परिस्थितियां शामिल मानी जाती हैं.

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    क्या हैं FMC के प्रावधान?
    यह क्लॉज़ ज़्यादातर कमर्शियल अनुबंधों में होता है और संकट की स्थितियों के लिए इसे रखा जाता है. इस क्लॉज़ के लागू होते ही अनुबंध करने वाली दोनों पार्टियां अनुबंध पर आश्रित नहीं रहतीं, यानी दायित्वों से मुक्त हो जाती हैं. जैसे इंश्योरेंस कंपनी अगर किसी को इंश्योरेंस दे रही है, तो वह संकट के चलते यानी इस क्लॉज़ के लागू होते ही इंश्योरेंस की रकम देने से इनकार कर सकती है.

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    निर्मला सीतारमण के बयान के बाद एक्ट ऑफ गॉड पर चर्चा हो रही है.


    इस क्लॉज़ के लागू होने पर दायित्व से मुक्त होने को अनुबंध या करार तोड़ना नहीं माना जाता. आम तौर से एक्ट ऑफ गॉड के तहत उन प्राकृतिक आपदाओं को समझा जाता है, जिनके बारे में पूर्वानुमान नहीं हो लेकिन इस एक्ट के तहत वो संकट भी शामिल हैं, जो मानवीय हस्तक्षेप के कारण घटित हो सकते हैं. प्राकृतिक आपदाएं युद्ध, दंगों के अलावा हड़ताल तक भी इस क्लॉज़ में शामिल की जा सकती है.

    महामारी और एक्ट ऑफ गॉड!
    सरकारी स्तर पर इस एक्ट के लिए जो नई नीति है, उसमें व्यापारिक प्रतिबंधों, बॉयकॉट और महामारी जैसी स्थितियों को भी सूचीबद्ध किया गया है. हालांकि इस क्लॉज़ को लागू करने के संबंध में संबंधित पार्टियों के बीच बातचीत की गुंजाइश रहती है. एकतरफा हिसाब से इसे लागू करने की प्रैक्टिस नहीं रही है. इस क्लॉज़ के अलावा, इंडियन कॉट्रैक्ट एक्ट 1872 भी इस तरह का प्रावधान देता है.

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    गौरतलब है कि इस साल अप्रैल में बॉम्बे हाई कोर्ट ने FMC लागू किए जाने के संबंध में उस दलील को खारिज कर दिया था, जिसमें कहा गया था कि कोविड 19 के चलते लॉकडाउन की वजह से स्टील सप्लाई कॉंट्रैक्ट के हिसाब से काम नहीं हुआ. हालांकि अन्य केसों में इस तरह की दलील को अलग तरह से लिया गया.

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    और देशों में क्या है नज़रिया?
    कोविड 19 महामारी की शुरूआत वाले देश चीन में इंटरनेशनल ट्रेड प्रमोशन की संस्था ने कारोबारों के लिए FMC लागू करने की बात कही. इससे पहले 2002 में सार्स के वक्त भी चीन में यह व्यवस्था लागू की गई थी. महामारी के दौर में अप्रैल में सिंगापुर ने भी व्यापारों को राहत देने के लिए कोविड 19 एक्ट लागू किया था. पेरिस की एक कोर्ट ने भी जुलाई में महामारी को FMC के साथ डील करने की बात कही थी.

    यूके में भी राहत देने के लिए इस तरह के क्लॉज़ को तरजीह दी गई और इसी तरह का फ्रेमवर्क स्कॉटलैंड और उत्तरी आयरलैंड में भी किया जा रहा है.

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