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क्या है दो मंत्रालयों के बीच फंसी 'असम राइफल्स' और किस पाले में जाना चाहती है?

असम राइफल्स के लिए प्रतीकात्मक तस्वीर.

असम राइफल्स के लिए प्रतीकात्मक तस्वीर.

2013 में पहली बार प्रस्ताव आया था कि असम राइफल्स (Assam Rifles) को बीएसएफ (BSF) के साथ मर्ज कर दिया जाए. गृह और रक्षा मंत्रालयों के बीच सहमति नहीं बनी. इसके बाद इसे आईटीबीपी (ITBP) के साथ मर्ज करने की बात चली. खींचातानी यह है कि दोनों मंत्रालय फोर्स को पूरी तरह अपने पास रखना चाहते हैं और फोर्स क्या चाहती है?. जानिए पूरा माजरा.

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    पिछले तीन सालों से असम राइफल्स के नियंत्रण (Control of Assam Rifles) के मामले में पसोपेश बरकरार है. असम राइफल्स एक्स सर्विसमेन वेलफेयर एसोसिएशन की याचिका पर सुनवाई कर दिल्ली हाई कोर्ट (Delhi High Court) ने केंद्र सरकार (Government of India) को 12 हफ्तों के भीतर यह तय करने को कह दिया है कि इस बल को गृह मंत्रालय (Home Ministry) और रक्षा मंत्रालय (Defense Ministry), दोनों ही नियंत्रण करते रहेंगे या यह चलन खत्म किया जा सकता है.

    कोर्ट ने ये भी कहा कि ऐसा लगता तो है कि सैद्धांतिक तौर पर गृह मंत्रालय के विशिष्ट नियंत्रण में इस केंद्रीय पुलिस बल को रखा गया है, लेकिन कोई अंतिम निर्णय नहीं हो सका. अस्ल में याचिका में कहा गया कि इस तरह दो मंत्रालयों के बीच नियंत्रण रहने से बल के कर्मचारियों को कई तरह के दबाव और संकटों का सामना करना पड़ता है. सबसे पहले आपको बताते हैं कि असम राइफल्स कितना अहम बल है और फिर ये भी कि मंत्रालयों के बीच कैसे इसे लेकर रस्साकशी रही.

    क्या है असम राइफल्स?
    गृह मंत्रालय के प्रशासनिक नियंत्रण में छह केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल शामिल हैं; सेंट्रल रिज़र्व पुलिस फोर्स (CRPF), सीमा सुरक्षा बल (BSF), इंडो तिब्बत सीमा पुलिस (ITBP), केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल (CISF), सशस्त्र सीमा बल (SSB) और असम राइफल्स. असम राइफल्स उत्तर पूर्व में भारतीय सेना के साथ मिलकर कानून व्यवस्था बनाने और म्यांमार सीमा के पास सुरक्षा की ज़िम्मेदारी निभाती है.

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    असम राइफल्स की ज़्यादातर गतिविधियां भारतीय आर्मी के साथ मिलकर ही होती हैं.


    असम राइफल्स की मंज़ूर स्ट्रेंथ 63 हज़ार कर्मचारियों की है. 46 बटालियनों वाले इस बल में प्रशासनिक और ट्रेनिंग स्टाफ अलग से है. यह इसलिए अनूठा बल है क्योंकि इस पैरामिलिट्री बल का नियंत्रण दो मंत्रालयों के अधीन है.

    मंत्रालयों के नियंत्रण के तरीके
    असम राइफल्स का प्रशासनिक नियंत्रण गृह मंत्रालय और ऑपरेशनल नियंत्रण तकनीकी तौर पर भारतीय सेना के पास है, जो कि रक्षा मंत्रालय के अधीन है. इसका मतलब यह है कि इस बल के वेतन और इन्फ्रास्ट्रक्चर संबंधी मुद्दे गृह मंत्रालय के अधीन हैं, लेकिन तैनाती, पोस्टिंग, ट्रांसफर और पदस्थापना जैसे निर्णय आर्मी से तय होते हैं. इस बल में आईजी से डीजी तक तमाम सीनियर रैंक्स पर आर्मी के अफसर ही रहे हैं.

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    अब कहने को यह पुलिस बल है, लेकिन चूंकि इसमें कमांडिंग ​अधिकारी भारतीय सेना का लेफ्टिनेंट जनरल है, इसलिए इसे पैरामिलिट्री फोर्स समझा जाता है. वैसे भी इसकी कार्यप्रणाली सेना की ही तरह की है.

    क्यों रक्षा मंत्रालय में जाना चाहती है फोर्स?
    दो मंत्रालयों के बीच उलझे इस बल की प्रमुख मांग है कि यह पूरी तरह से रक्षा मंत्रालय के अधीन होना चाहता है. इसकी बड़ी वजह यही है कि रक्षा मंत्रालय के पास प्रशासनिक नियंत्रण जाने से बेहतर भत्ते और रिटायरमेंट लाभ मिलेंगे जो गृह मंत्रालय के नियमों के तहत नहीं हैं. हालांकि आर्मी में 35 की उम्र के बाद रिटायमेंट के प्रावधान हैं, लेकिन इस बल के लिए तय नियमों के तहत अभी रिटायरमेंट की उम्र 60 साल है.

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    दूसरे आर्मी के नियमों के मुताबिक वन रैंक वन पेंशन का फार्मूला लागू होता है, जो केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों पर लागू नहीं होता. इन लाभों के चलते असम राइफल्स की मांग है कि उसे पूरी तरह से रक्षा मंत्रालय के नियंत्रण में रखा जाए.

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    गृह और रक्षा मंत्रालय दोनों ही असम राइफल्स को अपने नियंत्रण में रखना चाहते हैं. (File Photo)


    मंत्रालयों के बीच रस्साकशी क्यों?
    एक तरफ असम राइफल्स की मांग है तो दूसरी तरफ, दोनों ही मंत्रालय इस बल का पूरा नियंत्रण चाहते हैं. क्यों? गृह मंत्रालय के सूत्रों के हवाले से इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट कहती है कि इंडो म्यांमार सीमा की सुरक्षा के लिए जिस एकीकृत अप्रोच की ज़रूरत है, उसके लिए दूसरे केंद्रीय पुलिस बलों की तर्ज़ पर ही असम राइफल्स को उसके अधीन ही रहना चाहिए.

    दूसरी तरफ, आर्मी का कहना है चूंकि असम राइफल्स सेना के साथ मिलकर ही ऑपरेशन्स करती है और हमेशा यह मिलिट्री फोर्स ही रही है न कि पुलिस फोर्स, इसलिए इसे रक्षा मंत्रालय के नियंत्रण में रहना चाहिए. आर्मी का मानना है कि अगर असम राइफल्स को गृह मंत्रालय के अधीन रखा गया या किसी और केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल के साथ मर्ज कर दिया गया, तो इससे फोर्स भी कन्फ्यूज़ होगी और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए भी जोखिम होगा.

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