क्या है न्यू शेपर्ड रॉकेट, जो फुटबॉल यूनिफॉर्म से कम खर्च में कराएगा अंतरिक्ष की सैर

रॉकेट सिस्टम की तस्वीर ब्लू ओरिजिन के पोर्टल से साभार.
रॉकेट सिस्टम की तस्वीर ब्लू ओरिजिन के पोर्टल से साभार.

अब रॉकेट सिर्फ साइन्स (Rocket Science) की बात नहीं रही बल्कि अब यह पर्यटन उद्योग (Space Tourism Industry) है. जी हां, अंतरिक्ष पर्यटन के लिए NASA की मदद से एमेज़ॉन की कंपनी (Amazon Company) द्वारा तैयार किए गए इस रॉकेट सिस्टम में बहुत कुछ खास है.

  • News18India
  • Last Updated: October 15, 2020, 7:51 AM IST
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अमेरिका के टेक्सस (Texas) से टेकऑफ करने के बाद उस रॉकेट सिस्टम अपना सातवां परीक्षण (Rocket Test Launch) सफलता से पूरा किया, जो पर्यटकों (Space Tourists) को अंतरिक्ष की सैर कराएगा. इस रॉकेट सिस्टम को दुनिया के सबसे अमीर व्यक्ति यानी एमेज़ॉन के फाउंडर जेफ बेजॉस (Jeff Bezos) की स्पेस कंपनी ब्लू ओरिजिन (Blue Origin) ने बनाया है. न्यू शेपर्ड (New Shepard) नाम के इस रॉकेट सिस्टम का मकसद निकट भविष्य में स्पेस टूरिस्टों को पृथ्वी से करीब 100 किलोमीटर तक की ऊंचाई पर ले जाकर माइक्रोगैविटी का अनुभव कराना होगा.

पिछले कुछ समय से अंतरिक्ष विज्ञान की आधिकारिक संस्था नासा और व्यावसायिक स्पेस उद्योग के बीच रिश्ते मज़बूत हुए. इसी का नतीजा है कि 2019 में ब्लू ओरिजिन के साथ करार करते हुए नासा ने उसे अपने टे​स्ट स्टैंड के इस्तेमाल की इजाज़त दी थी.

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स्पेस टूरिज़्म के बिज़नेस में हाथ आज़माने के लिए तैयार ब्लू ओरिजिन साल 2018 में उन 10 कंपनियों में शुमार थी, जिन्हें चंद्रमा और मंगल से जुड़े मिशन के लिए अं​तरिक्ष में शोध करने के लिए नासा ने चुना था. आइए अब जा​नें कि यह रॉकेट सिस्टम क्या है और यह कैसे काम करेगा?
क्या है न्यू शेपर्ड?
पहले अमेरिकी अंतरिक्ष यात्री एलन शेपर्ड के नाम पर इस रॉकेट सिस्टम का नाम न्यू शेपर्ड रखा गया है. पृथ्वी से 100 किलोमीटर तक ऊपर जाने वाला यह रॉकेट सिस्टम अंतरिक्ष में एक तरह से पूरी लैब ले जा सकने की क्षमता भी रखता है. अब तक यही कहा गया है कि इसे एस्ट्रोनॉट्स को ले जाने के लिए डिज़ाइन किया गया है.

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पहले अमेरिकी अंतरिक्ष यात्री एलन शेपर्ड की यह तस्वीर ट्विटर से साभार.


हालांकि यह अंतरिक्ष में रिसर्च भी करेगा लेकिन स्पेस में तय अंतर्राष्ट्रीय सीमा कैरमान लाइन के दायरे में ही. इस पूरे प्रोजेक्ट का मकसद स्पेस में आसानी और कम कीमत में जा पाने की संभावनाएं तलाशना है ताकि और ज़्यादा शोध हो सकें और स्पेस के हिसाब से और बेहतर तकनीक विकसित की जा सके.

कैसे काम करेगा रॉकेट सिस्टम?
इसमें दो खास हिस्से हैं कैप्सूल और बूस्टर. कैप्सूल को आप कैबिन और बूस्टर को रॉकेट के तौर पर समझा जाता है. ब्लू ओरिजिन की मानें तो कैबिन में 100 किलोग्राम तक अंतरिक्ष उपकरणों से परीक्षण किए जा सकेंगे. जो शैक्षणिक संस्थान स्पेस कार्यक्रमों में जुटे हैं, उनके स्टूडेंट्स को भी यह रॉकेट अंतरिक्ष में ले जा सकेगा. दिलचस्प दावा यह है कि इसका खर्च फुटबॉल की नई यूनिफॉर्म की कीमत से भी कम होगा.

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60 फीट लंबे रॉकेट में कैबिन एकदम टॉप पर बना हुआ है और छह लोगों के हिसाब से है. खास बात यह भी है कि कैरमान लाइन को पार करने से पहले यह कैबिन रॉकेट से अलग हो सकता है. वर्टिकल टेकऑफ और लैंडिंग करने वाले इस सिस्टम को पूरी तरह रीयूज़ेबल बताया गया है.

मज़ेदार यह है कि बूस्टर से अलग होने के बाद कैप्सूल अंतरिक्ष में आज़ादी से अपना काम कर सकता है. इधर, बूस्टर पृथ्वी पर वापस आकर लैंड हो जाएगा तो कैप्सूल पैराशूट की मदद से अपने आप लैंड हो सकेगा.

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क्यों किया गया सातवां परीक्षण?
लैंडिंग सेंसर किस तरह काम करेगा, इसके अलावा इस सिस्टम की उड़ान और कक्षा में घूमने संबंधी जांच के लिए सातवां लॉंच बीते मंगलवार को किया गया, जिसे NS-13 नाम से दर्ज किया गया. भविष्य में मंगल और चंद्रमा पर शोध के लिए होने वाले मिशनों में मदद मिल सके, इसके लिए तकनीक विकास संबंधी शोध के लिए एक्यूरेसी जांचने के लिए भी यह सातवां लॉंच हुआ, जिसमें कोई अंतरिक्ष यात्री नहीं था.
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