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क्या है मुक्‍त आकाश निगरानी संधि, जिसे तोड़ने की बात कर रहे हैं डोनाल्‍ड ट्रंप

News18Hindi
Updated: May 23, 2020, 4:24 PM IST
क्या है मुक्‍त आकाश निगरानी संधि, जिसे तोड़ने की बात कर रहे हैं डोनाल्‍ड ट्रंप
अमेरिका ने रूस पर नियमों के उल्‍लंघन का आरोप लगाते हुए जनवरी 2002 में लागू हुई मुक्‍त आकाश संधि से बाहर होने का ऐलान कर दिया है.

मुक्‍त आकाश संधि (Open Skies Treaty) 1 जनवरी 2002 में लागू हुई थी. इसके 34 सदस्‍य देश हैं. यह व्यवस्था सदस्‍य देशों के बीच भरोसा बढ़ाने और संघर्ष को टालने के लिए शुरू की गई थी. आइए जानते हैं इस संधि के बारे में सब कुछ...

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अमेरिका के राष्‍ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (Donald Trump) ने 'मुक्त आकाश निगरानी संधि' (Open Skies Treaty) से बाहर होने की बात कहकर सभी को चााका दिया है. ट्रंप प्रशासन ने बृहस्‍पतिवार को इस संधि से जुड़े 34 अंतरराष्ट्रीय भागीदारों को अमेरिका के अलग होने की जानकारी दे दी है. अमेरिका ने आरोप लगाया है कि रूस इस संधि के नियमों का उल्लंघन कर रहा है. लिहाजा, वह इससे बाहर हो रहा है. माना जा रहा है कि संधि से बाहर होने की स्थिति में रूस और अमेरिका के संबंधों में खटास आ सकती है. इसके अलावा संधि में शामिल यूरोपीय देश और अमेरिकी कांग्रेस के कुछ सदस्‍य भी इस फैसले से नाराज हो सकते हैं. बता दें कि 34 देशों को एक-दूसरे के क्षेत्र में हथियारों के बिना टोही उड़ानों (Observation Aircraft) की अनुमति वाली ये संधि 1 जनवरी 2002 को लागू हुई थी. आइए जानते हैं कि इस संधि की खासियत क्‍या हैं और इसका प्रस्‍ताव कौन लेकर आया था...

सदस्‍यों के बीच संघर्ष टालने के लिए शुरू की गई थी व्‍यवस्‍था
बता दें कि करीब 18 साल पहले पहले यह व्यवस्था सदस्‍य देशों के बीच विश्वास बढ़ाने और संघर्ष को टालने के लिए शुरू की गई थी. इसके अलावा उड़ानों के दौरान जुटाई गईं तस्वीरें अमेरिका या कमर्शियल सेटेलाइट्स से काफी कम लागत पर तुरंत प्राप्त की जा सकती हैं. दरअसल, अमेरिकी राष्ट्रपति डी. आइजनहावर (Dwight Eisenhower) ने पहली बार जुलाई, 1955 में मुक्‍त आकाश संधि को लेकर प्रस्ताव पेश किया था. प्रस्‍ताव में कहा गया था कि अमेरिका (America) और तत्कालीन सोवियत संघ (Soviet Union) एक दूसरे के क्षेत्र में टोही उड़ानों की अनुमति दें. उस समय संधि को लेकर कुछ खास नहीं हो पाया. इसके बाद मई 1989 में जब राष्ट्रपति जॉर्ज एच. डब्ल्यू. बुश ने फिर प्रस्ताव पेश किया. फिर नाटो देशों के बीच बातचीत शुरू हुई. इसके बाद फरवरी 1990 में वारशॉ पैक्‍ट लागू हुआ.

मुक्‍त आकाश संधि के तहत रूस के आकाश में आब्‍जर्वेशन फ्लाइट के बाद अमेरिकी दल. (फोटो साभार: ओएससीई)




संधि का मकसद सैन्य गतिविधि पारदर्शिता को बढ़ावा देना


कुछ देशों ने 24 मार्च 1992 को संधि पर हस्‍ताक्षर कर दिए, लेकिन मास्को ने प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया. हालांकि, 1 जनवरी 2002 में रूस (Russia) ने भी मुक्‍त आकाश संधि पर हस्‍ताक्षर कर दिए और ये लागू हो गई. इस संधि पर अब तक 34 देश हस्ताक्षर कर चुके हैं. किर्गिस्तान संधि पर हस्ताक्षर करने वाला 35वां देश है, लेकिन उसने अभी तक इसकी पुष्टि नहीं की है. मुक्‍त आकाश संधि के तहत 1,500 से अधिक उड़ानों का संचालन किया गया है.

आर्म्‍स कंट्रोल एसोसिएशन की रिपोर्ट के मुताबिक,  इन उड़ानों का मकसद सैन्य गतिविधि के बारे में पारदर्शिता को बढ़ावा देना है. साथ ही संधि के तहत हथियारों के नियंत्रण और अन्य समझौतों की निगरानी करना है. संधि में सभी देश अपने सभी क्षेत्रों को निगरानी उड़ानों के लिए उपलब्ध कराने पर सहमत हैं. हालांकि, रूस ने अभी भी कुछ क्षेत्रों में उड़ानों पर प्रतिबंध लगा रखा है.

संधि के तहत टोही विमान का सेंसर से लैस होना अनिवार्य
संधि की शर्तों के मुताबिक, निगरानी विमान सेंसर से लैस होने चाहिए जो आर्टिलरी, लड़ाकू विमान और बख्तरबंद लड़ाकू वाहनों जैसे महत्वपूर्ण सैन्य उपकरणों की पहचान करने की निगरानी दल को क्षमता मुहैया करा सकते हों. हालांकि, सेटेलाइट्स के जरिये इससे कहीं ज्‍यादा और विस्‍तृत जानकारी आसानी से जुटाई जा सकती है. बावजूद इसके ये संधि की गई, क्‍योंकि इसके सभी 34 सदस्‍य देशों के पास सेटेलाइट्स से निगरानी करने की क्षमता उपलब्‍ध नहीं है. इस संधि का एक और मकसद सदस्‍य देशों के बीच भरोसा बढाना भी था. संधि लागू होने से पहले ही 26 देशों ने हस्‍ताक्षर करने की पुष्टि कर दी थी. संधि लागू होने के बाद बोस्निया, क्रोएशिया, एस्‍टोनिया, फिनलैंड, स्‍वीडन समेत 8 देशों ने भी हस्‍ताक्षर करने की पुष्टि कर दी. संधि के तहत सभी देश एकदूसरे के आकाश से अपने विमान गुजार सकते हैं.

ओपन स्‍काइज ट्रीटी के तहत अमेरिका में फ्लाइट के बाद रूस का दल. (फोटो साभार: ओएससीई)


भौगोलिक आकार के आधार पर तय होता है पैसिव कोटा
मुक्‍त आकाश संधि के तहत हर देश को सदस्‍य देशों की उड़ानों को तय संख्‍या में अपने हवाई मार्ग से गुजरने की अनुमति देनी होती है. इसे उसका पैसिव कोटा कहा जाता है. ये कोटा संबंधित सदस्‍य देश के भौगोलिक आकार के मुताबिक तय किया जाता है. सदस्‍य देश का एक्टिव कोटा किसी देश के हवाई मार्ग से गुजारने के लिए तय निर्धारित उड़ानों की संख्‍या होती है. वहीं, अगर कोई एक देश किसी दूसरे देश के आकाश से 10 उड़ानें गुजारता है तो उसे भी उसके हवाई मार्ग से उतनी ही फ्लाइट्स ले जाने का अधिकार मिल जाता है. हालांकि, किसी भी देश का एक्टिव कोटा उसके पैसिव कोटा से ज्‍यादा नहीं हो सकता है. वहीं, एक देश दूसरे देश के पैसिव कोटा के आधी से ज्‍यादा उड़ानों के लिए आग्रह नहीं कर सकता है. संधि के तहत सदस्‍य देश उड़ानें संचालित कर सकते हैं, लेकिन सभी देश निगरानी उड़ान नहीं कर सकते. निगरानी देशों की ओर से टोही उड़ान को उनकी पैसिव ओवरु्लाइट माना जाता है.

होस्‍ट कंट्री को 24 घंटे पहले फ्लाइट प्‍लान देना जरूरी
रूस ने संधि के तहत पहली टोही उड़ान अगस्‍त 2002 में संचालित की थी. वहीं, अमेरिका ने ऐसी पहली आधिकारिक उड़ान दिसंबर 2002 में संचालित की थी. मुक्‍त आकाश संधि के तहत 2002 से 2019 के बीच 1,500 से ज्‍यादा उड़ानों का संचालन किया गया है. संधि के तहत निगरानी उड़ान संचालित करने वाले देश को होस्‍ट कंट्री को कम से कम 72 घंटे पहले इस बारे में आगाह करना होता है. इसके बाद होस्‍ट कंट्री को आग्रह पर विचार करने के लिए 24 घंटे मिलते हैं.

इसके बाद होस्‍ट कंट्री संबंधित देश को अपना फैसला बता देता है. इस दौरान होस्‍ट कंट्री बताता है कि संबंधित देश अपने टोही विमान का इस्‍तेमााल कर सकता है या वो उसे ऐसा विमान उपलब्‍ध कराएगा. वहीं, गिरानी राष्‍ट्र को 24 घंटे पहले होस्‍ट कंट्री को अपना फ्लाइट प्‍लान बताना होता है. फ्लाइट के बाद उड़ान संचालित करने वाले देश को होस्‍ट कंट्री को जुटाए गए डाटा की एक कॉपी उपलब्‍ध करानी होती है.

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First published: May 23, 2020, 4:20 PM IST
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