क्या है 'पंजाब 2020 रिफरेंडम', जिसे कनाडा में किया गया खारिज

क्या है 'पंजाब 2020 रिफरेंडम', जिसे कनाडा में किया गया खारिज
पंजाब में जनमत संग्रह का प्रोपेगैंडा काफी समय से चल रहा है. फाइल फोटो.

पंजाब में अलगाववाद (Secessionism in Punjab) दशकों से घर किए है और दुनिया भर में सिखों के एक खास समुदाय की कोशिश रहती है कि पंजाब के टुकड़े किए जाएं. अमेरिका बेस्ड एक अलगाववादी समूह ने जनमत संग्रह के ज़रिये पंजाब को भारत से अलग करने की कोशिश की, लेकिन कनाडा (Canada Government) ने इस तथाकथित संग्रह के नतीजों को खारिज कर दिया.

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कनाडा (Canada) ने कहा कि वह भारत की संप्रभुता, एकता और अखंडता का सम्मान करता है इसलिए कनाडा सरकार अलगाववादियों (Separatists) के कदम को मंज़ूर नहीं करेगी. विशेषज्ञ इसे भारत की रणनीतिक जीत मान रहे हैं, तो पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह (Capt. Amrinder Singh) ने कनाडा की तारीफ करते हुए धन्यवाद दिया. एक सवाल तो यही है कि आखिर यह 'रिफरेंडम 2020' क्या बला है? और दूसरी ये कि इस पूरे मामले को विशेषज्ञों (Experts) की नज़रों से कैसे देखा जाए.

क्या है 'पंजाब रिफरेंडम 2020'?
भारत से पंजाब को अलग कर खालिस्तान बनाए जाने के मकसद को लेकर 'सिख्स फॉर जस्टिस' नाम की संस्था ने यह अभियान शुरू किया था. 2018 में इस संस्था के प्रमुख गुरपटवंत सिंह पन्नू ने घोषणा की थी कि जनमत संग्रह के लिए लाहौर में एक स्थायी दफ्तर बनाया जाएगा और ननकाना साहिब के आसपास जरनैल सिंह भिंडारावाले की तस्वीरों के साथ इस अभियान के बैनर लगाए जाएंगे.

यही नहीं, यह संस्था ग्रेटर खालिस्तान की मांग भी करती रही है, जिसमें पाकिस्तान के पंजाब का इलाका भी शामिल होता है. कथित तौर पर किए जा रहे जनमत संग्रह में गैर सिखों को भी वोटिंग के लिए रजिस्टर होने की सुविधा दी गई.
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सिख्स फॉर जस्टिस नामक संस्था को भारत में प्रतिबंधित किया जा चुका है.


क्यों चली इस तरह की मुहिम?
पंजाब में अलगाववाद पनपने का एक पूरा इतिहास रहा है, जिसका चरम 80 के दशक में सिख दंगों और इंदिरा गांधी की हत्या के रूप में देखा गया था. बहरहाल, इस तरह के जनमत संग्रह का समर्थन न करने की बात कहते हुए पंजाब के विधायक और आप के सदस्य सुखपाल सिंह खैरा ने कहा था कि 'इस तरह का जनमत संग्रह भारत की सरकारों द्वारा लगातार सिखों की उपेक्षा किए जाने का नतीजा है.' हालांकि खैरा के इस बयान की आलोचना शिअद और भाजपा ने की थी.

क्या है सिख्स फॉर जस्टिस?
खालिस्तान नाम के एक अलग और आज़ाद देश की मांग करने वाला यह अमेरिका बेस्ड एक अलगाववादी संगठन है. इसकी स्थापना पन्नू ने की थी. सिख समुदाय के कई प्रतिनिधियों से चर्चा के बाद 2019 में भारत ने इस संगठन को प्रतिबंधित कर दिया था. फेसबुक पेज स​मेत SFJ की इंटरनेट पर मौजूदगी वाले कई मंचों, वेबसाइटों और पोर्टलों को भी भारत ने ब्लॉक करवाया था. पंजाबी नौजवानों को हथियार उठाने के लिए उकसाने और अलगाववाद को पोसने के आरोपों में भारत ने 1 जुलाई 2020 को ही पन्नू को आतंकवादी घोषित किया था.

विशेषज्ञों की अब क्या राय है?
कनाडा चूंकि पंजाबियों और सिखों की बड़ी आबादी वाला देश है और ऐसे देश का SFJ के जनमत संग्रह को खारिज कर देना भारत के लिए बड़ी कामयाबी मानी जा रही है. विशेषज्ञों से बातचीत पर आधारित एएनआई की रिपोर्ट में पंजाब के रिटायर्ड डीजी शशिकांत के हवाले से कहा गया कि 'ये कोई जनमत संग्रह नहीं है क्योंकि आप किसी और देश में बैठकर किसी दूसरे देश में कोई जनमत संग्रह करवा ही नहीं सकते.'

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खालिस्तान आंदोलन अपनी ज़मीन खो चुका है.


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शशिकांत ने इसे भारतीय नीतियों की जीत बताया कि दूसरे देश भारत की संप्रभुता का सम्मान कर रहे हैं. ऑल इंडिया एंटी टेररिस्ट फ्रंट के प्रमुख मनिंदरजीत सिंह बिट्टा ने कहा 'कनाडा का फैसला वाजिब है और मुझे उम्मीद है कि यूके और यूएस से भी ऐसे ही बयान आएंगे.'

पाकिस्तान की ISI द्वारा फंड किए जा रहे 'रिफरेंडम 2020' को एक प्रोपेगैंडा के अलावा कुछ नहीं माना जा सकता. दुनिया भर में फैली बड़ी सिख आबादी में से अगर कुछ सिख खालिस्तान के पक्ष में हैं भी तो इसे पूरे सिख समुदाय की मर्ज़ी नहीं कहा जाना चाहिए.
मनिंदरजीत सिंह बिट्टा


क्या पंजाब में अभी जारी है खालिस्तान मूवमेंट?
पंजाब के एक विधायक कंवर संधू के हवाले से एएनआई ने रिपोर्ट में कहा कि भारतीय संविधान इस तरह के किसी जनमत संग्रह की इजाज़त ही नहीं देता. अगर कोई लोकतांत्रिक सरकार ऐसे जनमत को मानेगी तो वह अपनी ही विश्वसनीयता खोएगी. संधू ने ये भी कहा कि उनकी जानकारी में पंजाब में अब ऐसा कोई आंदोलन नहीं चल रहा है. कुछ लोग ऐसे जाली प्रोपेगैंडा से पंजाबियत और सिखों को बदनाम कर रहे हैं.

खराड़ से विधायक संधू ने ये भी कहा कि जो लोग जाने अनजाने, सोच समझकर या बहलावे में आकर या अपने परिचितों के इस तरह के प्रोपेगैंडा से जुड़े होने की वजह से अगर किसी तरह ऐसी मुहिम से जुड़ भी रहे हैं, तो उन्हें गैरकानूनी गतिविधि संबंधी कानून के तहत बुक किया जाएगा. दूसरी तरफ, 2007 में ही ​सिमरत ढिल्लन ने अपने रिसर्च पेपर में लिखा था कि खालिस्तान आंदोलन भारत और दुनिया में सिख समुदाय के बीच अपनी ज़मीन खो चुका था.
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