क्या है रेंटल रेसिज्म? क्यों दुनिया भर में लोगों को नहीं मिल रहे किराए पर घर?

नस्लभेद के पोस्टरों को दर्शाती एक गैलरी. (File Photo)
नस्लभेद के पोस्टरों को दर्शाती एक गैलरी. (File Photo)

कहीं मकान इसलिए किराए पर (House on Rent) नहीं मिल रहा कि आप किसी खास धर्म (Religion) से वाबस्ता हैं, तो कहीं इसलिए कि आप किसी खास देश (Country) से हैं. समझें कि ऐसा क्यों हो रहा है, कहां-कहां और इसके क्या अंजाम हो सकते हैं.

  • News18India
  • Last Updated: September 23, 2020, 2:58 PM IST
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'अंधेरा अंधेरे को दूर नहीं कर सकता, रोशनी ही कर सकती है. नफरत (Hate) से नफरत का जवाब नहीं दिया जा सकता, प्यार से ही दिया जा सकता है.' मार्टिन लूथर किंग का यह वाक्य याद दिलाता है कि वैज्ञानिक नज़रिये से धरती पर भले ही इंसान एक नस्ल (Humanity is a Race) हो, लेकिन इंसान ने रंग, धर्म और भाषा जैसे खानों में खुद को बांटकर 'नस्लभेद' (Racial Discrimination) जैसा शब्द गढ़ लिया है. भारत क्या, पाकिस्तान क्या, अमेरिका क्या... दुनिया के हर कोने में 'भेदभाव' का यह ज़हर इतना घातक हो गया है कि लोगों की बुनियादी ज़रूरत (Basic Need) 'रोटी और मकान' का संकट खड़ा हो रहा है.

कुछ खबरों पर नज़र डालें तो भारत में मुस्लिमों (Muslims in India), चीन में गैर चीनियों या गैर बौद्धों, अमेरिका और यूरोप में अश्वेतों (Blacks in West) और कुछ कथित श्वेत देशों में गैर नस्लीयों तक को मकान किराए पर मिलना मुहाल हो गया है. ये संकट इतना बड़ा हो गया ​है कि एक पीड़ित को कहना पड़ा कि 'संगीतकार अपनी बांसुरी छुपाकर मकान किराए पर ले सकता है, एक मांसाहारी खुद को शाकाहारी बताकर लेकिन कोई पहचान कैसे छुपाए? और क्यों छुपाए?'

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एक तरफ भारत के कई शहरों में मुस्लिमों को मकान किराए पर मिलने में बेहद परेशानी हो रही है, तो दुनिया के अन्य कई देशों में भारतीयों को भी यही मुश्किल हो रही है. ऐसा क्यों हो रहा है और किस स्तर पर कैसे हो रहा है? जानिए और जानने के बाद सिर्फ जाने मत दीजिए.
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दुनिया के कई देशों में है सांस्कृतिक भेदभाव की समस्या.


भेदभाव की कहानियां
घर या एक मकान मिलना सभी की ज़रूरत है. मकान किराए पर लेने के लिए किसी व्यक्ति को कितनी शर्तें पूरी करना चाहिए? क्या उन शर्तों में रंग, लिंग, देश, जाति, धर्म जैसे आधारों पर भेदभाव किया जाना शामिल हो सकता है? आदर्श उत्तर यही है कि 'नहीं होना चाहिए' लेकिन दुनिया भर में ऐसा हो रहा है. चलिए जर्मनी की कहानी से शुरू करते हैं.

1. हांगकांग से जर्मनी शिफ्ट होने वाले श्रीनिवास प्रसाद ने अपनी जो कहानी सुनाई, उसके मुताबिक द हिंदू की रिपोर्ट कहती है कि जर्मनी में 'अश्वेत विदेशियों' को ज़रूरत के मुताबिक मिलना बेहद मुश्किल है. बावजूद इसके कि प्रसाद एक बड़ी जर्मन कंपनी में अफसर की हैसियत से पहुंचे थे, फिर भी उन्हें 100 से ज़्यादा मकानमालिकों को कन्विन्स करने की नौबत आई.

2. अमृता मलिक के हवाले से एक रिपोर्ट में कहा गया कि इटली के फ्लोरेंस में उन्हें मकान नहीं मिला क्योंकि वो एक भारतीय हैं. कारण नहीं बताया गया, बस मकानमालकिन ने यही कहा कि वो भारतीयों को मकान नहीं देना चाहती थी.

3. न्यूज़ीलैंड के सबसे बड़े शहरों में शुमार क्राइस्टचर्च में न्यूज़ीलैंड के ही ग्रामीण या क्षेत्रीय समुदाय माओरी लोगों को किराए पर मकान मिलना बेहद मुश्किल काम हो गया है.

4. हालिया खबर के मुताबिक कनाडा के टोरंटो में एक 'श्वेत' मालिक और 'अश्वेत' किराएदार के बीच के विवाद में सुपीरियर कोर्ट ने फैसला दिया कि 'एक जैसे मन वाले या पारिवारिक वृत्ति' जैसे लोग न होने के कारण कोई संपत्ति मालिक किसी किराएदार को बेदखल नहीं कर सकता.

5. भारत में, इंटरनेट पर सर्च कीजिए, तो कितने शहरों में यही किस्सा है कि मुस्लिमों को किराए से मकान नहीं मिल रहे. दिल्ली, चंडीगढ़, मुंबई, बेंगलूरु, भोपाल जैसे कई छोटे-बड़े शहरों में दोगुने किराए की पेशकश के बावजूद किराएदार को मकान मिलना मुश्किल है, अगर वो मुसलमान है. यही नहीं, उत्तर पूर्वी, कश्मीरी और कुछ जगहों पर जाति विशेष के होने के कारण भी मकान किराए पर नहीं मिल रहे.

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भारत में नस्लवाद के खिलाफ हुए एक विरोध प्रदर्शन की तस्वीर Pixabay से साभार.


हालांकि यह स्थिति नई नहीं है, लेकिन पिछले आम चुनावों के बाद से कश्मीर, नागरिकता को लेकर जो नए कानून बने हैं, उनके बाद से कई शहरों में यह स्थिति और खराब हो गई है. दिल्ली में फरवरी में हुए दंगे भी इस स्थिति के लिए एक कारण बने हैं, तो सामाजिक तौर पर एक सांप्रदायिक खाई का बढ़ना प्रमुख कारण रहा है. क्यों दुनिया भर में ऐसा हो रहा है, इस पर एक नज़र डालते हैं.

क्या हैं भेदभाव की वजहें?
भेदभाव स्वभाव में होता है? सामाजिक बुराई होता है या राजनीतिक साज़िश होता है? इसके बारे में आप और भी कई लंबे चौड़े लेख पढ़ सकते हैं, लेकिन इतना समझने में कोई अड़चन नहीं है कि हर जगह एक खास किस्म के 'राष्ट्रवाद' को हवा मिल रही है इसलिए जगहों के हिसाब से कुछ खास किस्म के समुदायों के प्रति नफरत का माहौल बनाया जा रहा है. कोविड 19 के दौर में 'वैक्सीन राष्ट्रवाद' तक की बात हो चुकी है, तो 'रेंटल रेसिज़्म' तो अभी दूर की लड़ाई है.

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और भी कारण बताते हुए, ईडी टाइम्स की रिपोर्ट कहती है कि यह शर्मनाक स्थिति है कि एक तरफ आप खुद को 'उदारवादी' कह रहे हैं और दूसरी तरफ 'कट्टर' हैं. दूसरे समुदाय या धर्मों के लोगों को मकान न देने के बारे में लोग ये भी सोचते हैं कि वो ऐसा करेंगे तो यह उनके समाज की सेवा नहीं होगी या बिरादरी क्या कहेगी! बीसवीं सदी में जहां किराए के मकान को मूलभूत अधिकार मानने की बहस चल रही है, वहीं हमें जातिवाद और धर्मांधता से भी लड़ना पड़ रहा है.

क्या कह रही हैं रिपोर्ट्स?
जर्मनी में भेदभाव विरोधी कार्यालय की रिपोर्ट में पाया गया कि 'नस्लभेद' लगातार बढ़ रहा है और अल्पसंख्यकों को मुश्किलें हो रही हैं. यही नहीं, इस पर भी ज़ोर दिया गया कि पूर्वाग्रह ज़्यादा सामने आ रहे हैं. यह अहम बात है कि आप किसी खास समुदाय के लिए खास किस्म की धारणा रखते हैं इसलिए उसके साथ एक खास किस्म का व्यवहार करते हैं.

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इस मामले में, यूनाइटेड किंगडम का ज़िक्र किए बगैर बात नहीं बनती. ब्रिटेन में 'नस्लभेद' इतना ज़बरदस्त है कि इसके अंजाम तक पर अध्ययन हो रहे हैं. भेदभाव के माहौल पर जो सरकारी नीति है, वह फेल होती नज़र आ रही है और समाज में भेदभाव पहले से कहीं ज़्यादा बढ़ गया है. एक तरफ, सरकार अब इन नीतियों को भेदभाव रोधी की जगह 'लचीली नीतियां' कहने लगी है लेकिन थिंक टैंक मान रहे हैं कि यह एक प्रोपैगेंडा है.

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मकान की ज़रूरत को अधिकारों में शामिल करने के लिए कानून कैसे हों, इस पर बहस हो रही है. (तस्वीर Teenvogue से साभार)


आईपीपीआर की स्टडी के हवाले से इंडिपेंडेंट की रिपोर्ट कहती है कि यूके में भेदभाव के शिकार लोग मकान से तो वंचित हैं ही, गरीबी, बेरोज़गारी के शिकार भी हैं. कोविड 19 के दौर में ऐसे कई लोग मारे गए, जिन्होंने माइग्रेट किया था, लेकिन कहीं कोई रिकॉर्ड नहीं था. यह भी एक फैक्ट है कि ऐसे भेदभावों के चलते वो खबरें भी सामने आ चुकी हैं, जो बताती हैं कि कौन कहां किसी कार में या किसी नाव में रहने को मजबूर है.

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ज़ाहिर है कि यूरोप से अमेरिका तक और भारत से चीन तक इस 'नस्लभेद' के खिलाफ विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं और होते रहना भी चाहिए क्योंकि एलिस वॉकर के शब्दों में 'इस ग्रह पर रहने की कीमत एक्टिविज़्म ही है'. याद रखने की बात यही है कि इंसान खुद एक नस्ल है और इस नस्ल के अंदर ही अगर कहीं 'रेसिज़्म' दिखे तो उसका जवाब 'एक्टिविज़्म' ही है.
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