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जानें ऐसे ड्रग री-पोजिशनिंग कर पुरानी दवाओं से किया जा रहा कोरोना मरीजों का इलाज


कोरोना के लिए फैबीफ्लू दवा आई

कोरोना के लिए फैबीफ्लू दवा आई

वैज्ञानिक किसी पुरानी बीमारी के इलाज के लिए बनाई गई दवा में कुछ फेरबदल कर किसी नई बीमारी के इलाज में इस्‍तेमाल करने लायक बनाते हैं. कोरोना वायरस के मामले में भी डॉक्‍टर्स ऐसा ही कर रहे हैा. इससे किसी दवा को नए सिरे से बनाने में खर्च होने वाले समय, पैसे और ऊर्जा की बचत हो जाती है. साथ ही कई तहत की मंजूरियां भी नहीं लेनी होती हैं.

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    कोरोना वायरस (Coronavirus) के फैलने के साथ ही दुनियाभर के वैज्ञानिक और शोधकर्ता इसकी वैक्‍सीन (Vaccine) बनाने की कवायद के साथ ही इलाज (Treatment) ढूंढने में जुट गए. हालांकि, अभी तक ना तो इसकी कोई वैक्‍सीन बन पाई है और ना ही इसका कारगर इलाज ढूंढा जा सका है. इस बीच डॉक्‍टरों ने मलेरिया की दवा हाइड्रॉक्‍सीक्‍लोरोक्‍वीन से लेकर एचआईवी के मरीजों की दी जाने वाली दवाइयों के अलावा इबोला के लिए बनाई गई रेमडेसिविर और इंफ्लुएंजा की दवाइयों तक का कोरोना वायरस के मरीजों पर परीक्षण कर लिया है. वहीं, दर्द और बुखार में इस्‍तेमाल होने वाली पैरासिटामोल को भी संक्रमितों के इलाज में आजमाया जा चुका है. स्‍वास्‍थ्‍य विशेषज्ञों के मुताबिक, इसे ही ड्रग री-पोजिशनिंग (Drug Re-positioning) कहा जाता है. आसान शब्‍दों में समझें तो किसी दूसरी बीमारी के लिए बनाई गई दवा को किसी नई बीमारी के इलाज में इस्‍तेमाल करने लायक बनाना ही ड्र्रग री-पोजिशनिंग है.

    नई दवा बाजार तक पहुंचने में लग जाते हैं कई साल
    विशेषज्ञ ड्रग रिपोजिशनिंग के फायदों में सबसे बड़ा फायदा समय की बचत को बताते हैं. ड्रग डिस्‍कवरी वर्ल्ड की रिपोर्ट के मुताबिक, नई बीमारी के लिए पुरानी दवा की ड्रग रिपोजिशनिंग की प्रक्रिया में समय की बचत होती है. किसी ड्रग को शून्य से तैयार करने में सबसे पहले उसे लैबोरेट्री में तैयार कर के उसके असर को कोशिकाओं पर परखा जाता है.

    इसके बाद दवा का प्री-क्लीनिकल ट्रायल होता है. इंसानों पर आजमाने से पहले इसे कई प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता है. इसके बाद लाइसेंस लेने के लिए कई चरणों से होकर गुजरना पड़ता है. इस प्रक्रिया में 15 साल से ज्‍यादा तक का वक्त लग सकता है. कोरोना संकट को देखते हुए अगर इन प्रक्रियाओं को तेजी से भी करते हैं तो भी नई दवा को बाजार में लाने में कम से कम पांच साल लगेंगे. हालात को देखते हुए अभी हमारे पास इतना समय नहीं है.

    किसी भी पुरानी दवा की ड्रग री-पोजिशनिंग करने से नई बीमारी के लिए नई दवा तैयार करने के मुकाबले पैसे और समय की बहुत ज्‍यादा बचत होती है.


    ड्रग री-पोजिशनिंग में समय और पैसे की होती है बचत
    ड्रग रिपोजिशनिंग के तहत चुनी गई दवाइयां इंसानों पर टेस्ट (Human Trial) की जा चुकी होती है. इनके सुरक्षित होने को लेकर डाटाबेस पहले से मौजूद होता है. सिर्फ एक ही बात जाननी होती है कि यह नई बीमारी पर काम कर रही या नहीं. किसी नई बीमारी के मामले में इंसानों को देने से पहले इनका क्लीनिकल ट्रायल जरूरी होता है. दरअसल, इस बात की कोई गारंटी नहीं होती है कि यह नई बीमारी पर काम करेगी भी या नहीं.

    पुरानी दवाई के नए हालात में असर को जानने के लिए क्लीनिकल ट्रायल जरूरी होता है. समय की बचत के साथ-साथ निश्चित तौर पर पैसे की भी इस प्रक्रिया में बचत होती है. ऑस्ट्रेलिया के यूनिवर्सिटी ऑफ मर्डोक के फार्माकोलॉजी के प्रोफेसर इयान मुलाने कहते हैं कि एक दवा कंपनी दो अरब डॉलर एक नई दवा की खोज पर खर्च करती है, जिसे बाजार में पहुंचने में कई साल लग जाते हैं. यह पहले से तैयार ड्रग के मुकाबले बहुत महंगा सौदा है.

    इन दवाइयों की पहले की जा चुकी है ड्रग री-पोजिशनिंग
    प्रोफेसर इयान कहते हैं कि किसी भी दवा का पेटेंट एक निश्चित समय के बाद समाप्त हो जाता है. हालांकि, यह हर मामले में अलग-अलग होता है, लेकिन अमूमन दवा के रजिस्ट्रेशन से लेकर 20 साल तक ही पेटेंट रहता है. एक बार समयसीमा पूरी होने के बाद कोई भी कंपनी उस दवा को बनाकर उसकी जेनरिक दवा बेच सकती है. सबसे पहले इस तरह के प्रयोग में कामयाबी एस्प्रिन को लेकर मिली थी. एक सदी से इसका इस्तेमाल दर्द की दवा के रूप में होता आया है, लेकिन अब कम मात्रा में इसका इस्तेमाल कुछ मरीजों में दिल के दौरे के जोखिम को कम करने में भी किया जाता है.

    कोरोना वायरस के मामले में अब तक डॉक्‍टर्स इबोला के लिए बनाई दवा से लेकर मलेरिया की दवा तक का क्‍लीनिकल ट्रायल कर चुके हैं.


    अब नए अध्ययन में पता चला है कि कुछ खास किस्म के कैंसर की रोकथाम में भी यह दवा असरदार हो सकती है. इसके अलावा प्रेग्‍नेंट महिलाओं को शुरुआती तीन चक्‍कर आने से रोकने के लिए थैलिडोमाइड नाम की दवा बनाई गई. जर्मनी की ये दवा बाद में कुछ कारणों से पवापस ले ली गई. इस ड्रग री-पोजिशनिंग हुई तो इसे बोनमैरो के कैंसर और लेप्रॉसी के इलाज में कारगर पाया गया.

    डाटा और एआई के कारण आसान हुई ड्रग री-पोजिशनिंग
    हाल के सालों में तकनीक के विकास ने ड्रग री-पोजिशनिंग को आसान बना दिया है. बीबीसी की रिपोर्ट के मुताबिक, अमरीका के एनजीओ क्यूर्स विदिन रिच के डायरेक्टर ब्रुस ब्लूम ने कहा कि डाटा और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के जमाने में ड्रग री-पोजिशनिंग आसान हो गई है. कोरोना के मामले में सबसे पहले उन दवाओं को ड्रग री-पोजिशनिंग की प्रक्रिया के लिए चुना गया जिन्‍‍‍‍‍हें किसी दूसरे वायरस के लिए तैयार किया गया था.

    उदाहरण के लिए रेमडेसिविर को इबोला (Ebola) के इलाज के लिए बनाया गया था, लेकिन इसका परिणाम निगेटिव आया था. कई बार ऐसा भी होता है कि जो दवा वायरस से नहीं जुड़ी होती है, वो भी एंटीवायरल साबित होती हैं. ड्रग रिपोजिशनिंग की सबसे बड़ी समस्या है कि बाजार इसमें कोई दिलचस्पी नहीं लेता है. व्यावसायिक तौर पर इस कवायद को प्रोत्साहित नहीं किया जाता है, जिससे री-पोजिशनिंग को शुरुआती दौर में समर्थन नहीं मिलता है.

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