सैंपल जांच में स्पर्म न मिले तो क्या रेप होना नहीं माना जाएगा? क्या कहता है कानून?

अब महाराजगंज में नाबालिग के साथ गैंगरेप (प्रतीकात्मक तस्वीर.)
अब महाराजगंज में नाबालिग के साथ गैंगरेप (प्रतीकात्मक तस्वीर.)

हाथरस गैंगरेप केस (Hathras Gang Rape Case) में उत्तर प्रदेश पुलिस (UP Police) और कुछ नेताओं ने रेप की आशंका को इसलिए खारिज कर दिया क्योंकि जांच रिपोर्ट में कहा गया कि सीमन की मौजूदगी नहीं पाई गई. क्या कानून भी यही कहता है?

  • News18India
  • Last Updated: October 6, 2020, 12:19 AM IST
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हाथरस में एक 19 वर्षीय युवती की मौत (Hathras Rape Case) के बाद एक तरफ उत्तर प्रदेश पुलिस ने दावा किया कि युवती के साथ बलात्कार (Rape Case) होने की बात सही नहीं है, तो दूसरी तरफ, मौत से पहले युवती ने जो बयान (Victim Statement) दिया उसमें उसने सामूहिक बलात्कार के बाद बुरी तरह प्रताड़ित (Rape & Torture) किए जाने की बात कही. इस पूरे मामले में उप्र पुलिस की वो थ्योरी सवालों और चर्चा में आ गई है जिसमें घटना के 11 दिन बाद जांच करवाई गई और दावा किया गया कि वीर्य के सबूत नहीं मिले.

एक बार को अगर पुलिस और सियासत का यह दावा मान लिया जाए, तो भी क्या सिर्फ इस वजह से यह साबित होता है कि रेप नहीं हुआ? कानूनी विशेषज्ञों (Legal Experts) की इस बारे में राय के साथ ही इस पूरे दावे को सिरे से सिरे तक समझना ज़रूरी हो जाता है.

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पहले देखें कि दस्तावेज़ क्या कह रहे हैं?
फॉरेंसिक दस्तावेज़ों के हवाले से कहा गया कि पीड़िता के शरीर, गुप्तांगों और कपड़ों आदि पर वीर्य की मौजूदगी के सबूत नहीं मिले. पीड़िता के कपड़ों पर खून के निशान मिले थे, लेकिन वीर्य के नहीं. दूसरी तरफ, दिल्ली के वीएमएमसी से जारी पोस्टमार्टम रिपोर्ट कहती है कि मौत की वजह गला घोंटे जाने के बाद रीढ़ की हड्डी की गंभीर चोटों के कारण हुए कॉम्प्लिकेशन रहे.

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भारत में हर 16 घंटे में एक बलात्कार होना और औसतन रोजाना रेप के 87 मामले सामने आना चिंताजनक हो गया है.


जांच में देर होने का मतलब?
पीड़िता के साथ वारदात होने और जांच के लिए जपीड़िता के नमूने लिये जाने के बीच काफी देर होना भी इस केस में सवालों के घेरे में है. 15 सितंबर से अलीगढ़ में इलाज शुरू होने के बाद पीड़िता बयान देने की हालत में भी नहीं थी. खबरों के मुताबिक दो दिन बाद वह आपबीती सुना सकी. जब उसने बयान में बलात्कार की बात कही, तब नमूने लेकर उनकी जांच करवाई गई. एक रिपोर्ट में बताया गया कि मेडिकल जांच घटना के 8 दिन बाद शुरू हुई.



विशेषज्ञों की क्या राय है?
फॉरेंसिक विशेषज्ञ साफ कहते हैं कि अगर वीर्य की मौजूदगी पाई जाती है, यह स्पष्ट रूप से बलात्कार का केस सिद्ध होता है, लेकिन वीर्य की मौजूदगी न पाए जाने से बलात्कार को खारिज नहीं किया जा सकता. दूसरी तरफ, सीनियर एडवोकेट विकास पाहवा के हवाले से खबरों में कहा गया कि घटना और मेडिकल जांच के बीच कितना वक्त गुज़रा, इस पर कई चीज़ें निर्भर करती हैं कि जांच में क्या पाया गया और क्या नहीं.

क्या वीर्य की मौजूदगी ही रेप का सबूत है?
कानूनी विशेषज्ञों की मानें तो इस थ्योरी में कोई दम नहीं है कि वीर्य की मौजूदगी न पाए जाने से पुलिस रेप का केस ही खारिज कर दे. पहले भी कोर्ट ने कई बार इस बात को माना है कि स्पर्म की मौजूदगी न होना इस बात का इकलौता सबूत नहीं हो सकता कि रेप हुआ या नहीं. कोर्ट के ऐसे कुछ फैसलों को एक नज़र देखें.

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इस साल के शुरुआती नौ महीनों में महिलाओं के खिलाफ कुल 4,05, 861 आपराधिक मामले दर्ज हो चुके हैं.


1. परमिंदर उर्फ लड़का पोला बनाम स्टेट केस में सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले की पुष्टि करते हुए कहा था कि बलात्कार को साबित करने के लिए वीर्य की मौजूदगी ज़रूरी नहीं है.

2. हाईकोर्ट ने मेडिकल ज्यूरिसप्रुडेंस और टॉक्सिकोलॉजी के इस पैसेज को माना था :

रेप के मामले में अपराध साबित करने के लिए ज़रूरी नहीं है कि लिंग के पूरे प्रवेश के साथ, हाइमन टूटे और वीर्य का उत्सर्जन हो. लिंग का आंशिक प्रवेश, वीर्य हो या न हो, यहां तक कि लिंग के प्रवेश की कोशिश भी कानून के लिए पर्याप्त उद्देश्य है. जननांग पर किसी घाव के बगैर, वीर्य के दाग छोड़े बगैर भी रेप का अपराध कानूनी तौर पर पुष्ट हो सकता है.


3. वाहिद खान बनाम स्टेट केस में सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा था कि लिंग का आंशिक प्रवेश भी बलात्कार के अपराध की पुष्टि के लिए पर्याप्त है.

इसी तरह, उत्तर प्रदेश के स्टेट बनाम बाबूनाथ केस, तारकेश्वर साहू बनाम बिहार स्टेट, अमन कुमार बनाम हरियाणा स्टेट, राज भौमिक बनाम त्रिपुरा स्टेट जैसे कई मामलों में कोर्ट कई बार इस बात को दोहरा चुका है.

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क्या है रेप की कानूनी परिभाषा?
दिल्ली के बेहद चर्चित 2012 सामूहिक बलात्कार कांड के बाद सुप्रीम कोर्ट की एक कमेटी ने रेप और यौन शोषण मामलों के लिए संशोधन सुझाए जाने के बाद मार्च 2013 में केंद्र सरकार ने कानून में संशोधन किया था. इस बदली परिभाषा के अनुसार, 'महिला के जननांग, मूत्रांग या गुदा में उसकी मर्ज़ी के बगैर जबरन शरीर के किसी भी अंग या किसी और चीज़ का प्रवेश' रेप माना जाएगा. इस परिभाषा में जबरन ओरल सेक्स भी शामिल है.

पीड़िता के बयान की अहमियत?
कानून के बारे में जानकारी देने वाले एक पोर्टल की रिपोर्ट की मानें तो बलात्कार पीड़िता के बयान की पुष्टि की ज़रूरत नहीं होती. ऐसे कई मामले सामने आ चुके हैं जब कोर्ट ने मौत से पहले दिए गए पीड़ितों के बयानों के आधार पर बलात्कार के मामलों में दोषी ठहराने की कवायद की है. गौरतलब है कि हाथरस की घटना पर इलाहाबाद हाई कोर्ट ने सवत: संज्ञान ले लिया है और नाराज़गी ज़ाहिर की है.
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