Coronavirus: इस ब्‍लड ग्रुप के लोगों को है कोरोना वायरस के संक्रमण का सबसे ज्‍यादा खतरा

Coronavirus: इस ब्‍लड ग्रुप के लोगों को है कोरोना वायरस के संक्रमण का सबसे ज्‍यादा खतरा
अधिकारियों को जिला अस्पतालों में आइसोलेशन वार्ड बनाने और उनमें डॉक्टर्स की अलग टीम लगाने के निर्देश दिए गए हैं.

चीन ने कोरोना वायरस (Coronavirus) से संक्रमित मरीजों पर किए शुरुआती अध्‍ययन में पाया कि 'O' ब्‍लड ग्रुप (Blood Group) के लोगों को संक्रमण का सबसे कम खतरा है. वहीं, 'A' ब्‍लड ग्रुप के लोगों को इंफेक्‍शन (Infection) का सबसे ज्‍यादा खतरा है. हालांकि, 'O' ब्‍लड ग्रुप के लोगों को भी बार-बार हाथ धोने के साथ ही दूसरे बचाव के उपाय करते रहने हैं.

  • News18Hindi
  • Last Updated: March 18, 2020, 12:15 PM IST
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नई दिल्‍ली. चीन के वुहान (Wuhan) से फैलना शुरू हुए कोरोना वायरस (Coronavirus) की जद में अब तक दुनिया भर के 1,98,521 लोग आ चुके हैं. इनमें 7,988 लोगों की मौत हो चुकी है. वहीं, 82,763 लोग ठीक होकर घर लौट चुके हैं. इस बीच दुनिया भर के स्‍वास्‍थ्‍य विशेषज्ञ और वैज्ञानिक वायरस का इलाज (Treatment) खोजने के साथ ही इसके फैलने के कारणों, रोकथाम के उपायों, किस उम्र के लोगों को सबसे ज्‍यादा खतरा जैसे अध्‍ययन भी कर रहे हैं. ऐसे ही एक अध्‍ययन में चीन के शोधकर्ताओं ने पता लगाया है कि किस ब्‍लड ग्रुप (Blood Group) के लोगों पर कोरोना वायरस का कितना असर पड़ेगा. आसान शब्‍दों में समझें तो उन्‍होंने पता लगाया कि किस ब्‍लड ग्रुप के लोगों को कोरोना वायरस से कितना खतरा है.

ब्‍लड ग्रुप 'ए' वालों को सबसे ज्‍यादा तो 'ओ' वालों को कम खतरा
चीन के हुबेई प्रांत के वुहान शहर में किए गए अध्‍ययन में पता चला कि 'ए' ब्‍लड ग्रुप के लोगों को कोरोना वायरस के संक्रमण का सबसे ज्‍यादा चातरा है. वहीं, 'ओ' ब्‍लड ग्रुप के लोगों के संक्रमित होने का जोखिम सबसे कम है. हालांकि, ऐसा बिलकुल नहीं है कि उन्‍हें संक्रमण नहीं हो सकता है. वे भी वायरस की चपेट में आ सकते हैं. लिहाजा, उन्‍हें भी बार-बार हाथ धोने समेत बचाव के तमाम उपाय करने ही चाहिए. शोधकर्ताओं ने वुहान और शेनजेन (Shenzhen) के 2,000 से ज्‍यादा मरीजों पर किए गए शुरुआती अध्‍ययन में ये निष्‍कर्ष निकाला है. शोधकर्ताओं (Researchers) का कहना है कि 'ए' ब्‍लड ग्रुप के लोगों के संक्रमित होने पर हालात गंभीर (High Risk) होने की आशंका सबसे ज्‍यादा है. साथ ही उनके संक्रमित होने की दर भी अधिक है.

स्थिति साफ होने पर डॉक्‍टरों को इलाज करने में होगी सुविधा
शोधकर्ताओं का कहना है कि ये शुरुआती अध्‍ययन (Preliminary Study) है. अभी इस दिशा में काफी काम किया जाना बाकी है. उन्‍होंने दुनिया भर के सरकारों और स्‍वास्‍थ्‍य सुविधा देने वाली संस्‍थाओं को संक्रमित लोगों के इलाज के दौरान उनके ब्‍लड ग्रुप के आधार पर अलग डाटा तैयार कर अध्‍ययन करने का आग्रह किया है ताकि वास्‍तविक स्थिति का पता चल सके. अलग-अलग ब्‍लड ग्रुप पर कोरोना वायरस के अलग असर का स्‍पष्‍ट पता लगने के बाद संक्रमित लोगों के इलाज (Treatment) में डॉक्‍टरों को बहुत आसानी होगी. विशेषज्ञों का कहना है कि अगर इस दिशा में स्‍पष्‍ट नतीजे मिल जाएं तो सबसे ज्‍यादा जोखिम वाले ब्‍लड ग्रुप के मरीजों का प्राथमिकता के आधार पर इलाज कर उन्‍हें बचाया जा सकता है.



शोधपत्र में लिखा गया है कि अभी तक के अध्‍ययन के मुताबिक डाक्‍टर्स 'ए' ब्‍लड ग्रुप के मरीजों का प्राथमिकता के आधार पर इलाज करें.


डॉक्‍टर्स 'ए' ब्‍लड ग्रुप के मरीजों का सबसे पहले करें उपचार
चीन (China) में किए गए इस शोध का नेतृत्‍व करने वाले वांग शिन्‍जुआन का कहना है कि ब्‍ल्‍ड ग्रुप और कोरोना वायरस के असर के बीच संबंध में स्‍पष्‍टता आने पर खास ब्‍लड ग्रुप के लोग भी ज्‍यादा सावधानी बरतने लगेंगे. इससे संक्रमण फैलने की रफ्तार पर भी अंकुश लगाया जा सकेगा. वांग ने शोधपत्र (Research Paper) में लिखा है कि अभी तक के अध्‍ययन के मुताबिक 'ए' ब्‍लड ग्रुप के लोगों को प्राथमिकता के आधार पर उपचार उपलब्‍ध कराया जाना चाहिए. Medrxiv.org में प्रकाशित रिसर्च पेपर के मुताबिक, इसके उलट 'ओ' ब्‍लड ग्रुप के लोगों में संक्रमण के गंभीर स्थिति (Critical Condition) में पहुंचने की दर काफी कम है. फिर भी इस ब्‍लड ग्रुप के लोगों में भी संक्रमण होने पर तुरंत इलाज की दरकार है ताकि वे दूसरे लोगों में संक्रमण न फैला सकें.

शोध में शामिल मरने वालों में 63 फीसदी 'ए' ब्‍लड ग्रुप के हैं
अध्‍ययन में पता चला है कि शोध में शामिल कोरोना वायरस के मरीजों में मरने वाले 206 लोगों में से 85 का ब्‍लड ग्रुप 'ए' ही था, जो कुल मरने वालों का 63 फीसदी है. वहीं, मृतकों में 52 मरीज 'ओ' ब्‍लड ग्रुप के हैं. शोधकर्ताओं के मुताबिक, मरने वालों में हर उम्र के पुरुष व महिला शामिल हैं. ये अध्‍ययन बीजिंग (Beijing), वुहान (Wuhan), शंघाई (Shanghai) और शेनजेन (Shenzhen) के वैज्ञानिक व डॉक्‍टरों ने किया. इस अध्‍ययन के शोधपत्र में वांग ने चीन में इलाज की मौजूदा पद्धति (Clinical Practice) के बारे में भी दिशानिर्देश दिए हैं. तियानजिन में सरकारी लैबोरेटरी ऑफ एक्‍सपेरिमेंटल हैमाटोलॉजी में एक शोधकर्ता गाव यिंगदाई ने कहा कि सैंपल साइज (Sample Size) बढ़ाए जाने पर ज्‍यादा स्‍पष्‍ट नतीजे हासिल होंगे. बता दें कि यिंगदाई शोध में शामिल नहीं थे.

संक्रमितों की संख्‍या के कारण कम माना जा रहा सैंपल साइज
यिंगदाई ने कहा कि शोध के लिए 2,000 मरीजों पर किया गया अध्‍ययन भी कम नहीं है. फिर भी दुनिया भी में संक्रमित लोगों की कुल संख्‍या और लगातार बढ़ रहे संक्रमण के कारण ये बहुत माना जा रहा है. इस अध्‍ययन की दूसरी खामी ये है कि शोध में अलग-अलग ब्‍लड ग्रुप के लोगों पर कोरोना वायरस के अलग असर का कारण स्‍पष्‍ट नहीं हो पाया है. बता दें कि ब्‍ल्‍ड टाइप को एक एंटीजन (Antigen) द्वारा निर्धारित किया जाता है. ये लाल रक्‍त कोशिकाओं (Red Blood Cells) की सतह पर मौजूद वो पदार्थ होता है, जो वायरस के हमले के समय रक्‍त की प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया (Immune Response) को सक्रिय करता है. ब्‍लड ग्रुप की खोज 1901 में ऑस्‍ट्रेलिया के जीवविज्ञानी कार्ल लैंडस्‍टेनर ने की थी.

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अमेरिका में 41 फीसदी लोगों का ब्‍लड ग्रुप 'ए' है. वहीं, चीन के वुहान में 34 फीसदी लोग इसी ब्‍लड ग्रुप के हैं.


अमेरिका की 41 तो वुहान की 34 फीसदी आबादी का ब्‍लड ग्रुप 'ए'
अलग-अलग देशों में ब्‍लड टाइप की जनसंख्‍या भी अलग है. अमेरिका (America) में करीब 44 फीसदी लोगों का ब्‍लड ग्रुप 'ओ' है. वहीं, अमेरिका (US) की कुल आबादी (Population) में 41 फीसदी लोग 'ए' ब्‍लड ग्रुप वाले हैं. चीन के वुहान की 1.1 करोड़ आबादी में 34 फीसदी लोगों का ब्‍लड ग्रुप 'ए' है. वहीं, 'ओ' ब्‍लड ग्रुप वालों की आबादी 32 फीसदी है. वुहान में संक्रमित लोगों में 'ओ' ब्‍लड ग्रुप के लोगों की संख्‍या 'ए' वालों से ज्‍यादा है. यहां 'ओ' ब्‍लड ग्रुप के 38 फीसदी, जबकि 'ए' वाले 25 फीसदी लोग वायरस की चपेट में आए. लेकिन संक्रमण के बाद मरने वालों में 'ए' ब्‍लड ग्रुप वाले लोग ज्‍यादा थे.

इसलिए 'ए' ब्‍लड ग्रुप के लोगों पर कम असर कर रहा कोरोना वायरस
वैज्ञानिक अभी भी स्‍पष्‍ट नहीं कर पा रहे हैं कि अलग ब्‍लड ग्रुप पर कोरोना वायरस का असर अलग क्‍यों हो रहा है. फिर भी एक थ्‍योरी कहती है कि इसमें प्‍लेग की जेनेटिक मेमोरी बड़ा कारण हो सकती है. वहीं, कुछ वैज्ञानिकों का मानना है कि समुद्र तल से खास ऊंचाई, विशेष तापमान और हवा में नमी की सही मात्रा वाली जगहों पर रहने वाले लोगों को खास ब्‍लड ग्रुप कोरोना वायरस से बचाने में मदद कर सकता है. कोरोना वायरस के अलावा हेपेटाइटिस बी, नॉरवॉक वायरस और सार्स का असर भी अलग-अलग ब्‍लड ग्रुप के लोगों पर अलग पाया गया था. यिंगदाई का कहना है कि ये अध्‍ययन मेडिकल प्रोफेशनल्‍स की खासी मदद कर सकता है. इस शोध के बाद भी 'ए' ब्‍लड ग्रुप के लोगों को घबराने की जरूरत नहीं है. इसका मतलब ये कतई नहीं है कि इस ब्‍लड ग्रुप के लोगों को कोरोना वायरस होगा ही होगा. बचाव के उपायों का इस्‍तेमाल कर वे संक्रमण से बचे रह सकते हैं.

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