रामायण का वो श्लोक, जो नेपाल का नेशनल मोटो है और इसका मतलब क्या है

रामायण का वो श्लोक, जो नेपाल का नेशनल मोटो है और इसका मतलब क्या है
संस्कृत भाषा के ग्रंथ वाल्मीकि रामायण की लोकप्रियता दुनिया के कई हिस्सों में है.

भारत और Nepal के बीच संबंध फिलहाल तनावपूर्ण हैं क्योंकि नेपाल ने ही हाल में अपने देश का नया नक्शा जारी कर उन स्थानों को अपनी सीमाओं में दर्शाया है, जो Indian Borders में रहे हैं. दूसरी तरफ, India & Nepal के बीच दोस्ताना संबंध अरसे से रहे हैं, जिसका सबूत है नेपाल के राष्ट्रीय चिह्न (National Emblem) में दर्ज मोटो.

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नेपाल की Parliament में हाउस ऑफ रिप्रेज़ेन्टेटिव्स ने पिछले हफ्ते एकमत से संविधान संशोधन (Constitution Amendment) बिल पास किया. इस दूसरे संविधान संशोधन के तहत Schedule 3 में बदलाव किया गया है, जिसके मुताबिक नेपाल के नए Map में लिम्पियाधुरा, लिपुलेख और कालापानी को शामिल किया गया. इसके साथ ही नेपाल ने नया यानी अपडेटेड राष्ट्रीय प्रतीक चिह्न (Emblem) भी जारी किया. इस चिह्न में रामायण (Ramayan) में दर्ज एक श्लोक साफ दिखाई पड़ता है.

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नेपाल ने अपने राष्ट्रीय चिह्न में पिछली बार 2008 में तब बदलाव किया था, जब देश नेपाली नागरिक युद्ध के बाद कठिन समय से गुज़र रहा था. इस चिह्न में समाजवादी विचार का प्रभाव साफ था. इसी चिह्न को मामूली अपडेट कर बीते 13 जून को संविधान संशोधन के मुताबिक नक्शे के साथ फिर जारी किया गया. आइए जानें कि इसमें जिस श्लोक का उल्लेख है, वह क्या है, क्यों है और इसके क्या प्रतीक हैं.



कैसा है नेपाल का राष्ट्रीय चिह्न?
नेपाल के राष्ट्रीय चिह्न या कोट ऑफ आर्म्स में सबसे पहले नेपाल का राष्ट्रीय झंडा है. उसके नीचे दुनिया की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट और माउंट कोमोलंगमा का बिम्ब है. फिर हरे रंग के पहाड़ पहाड़ी क्षेत्र के प्रतीक हैं और पीला रंग उपजाऊ तराई क्षेत्र का प्रतीक है. पुरुष और स्त्री के मिलते हुए हाथ लैंगिक समानता के प्रतीक हैं और नेपाल के राष्ट्रीय फूल की माला के साथ ही आधार पर एक रिबन के भीतर नेपाल के मोटो के रूप में एक श्लोक लिखा है : 'जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी.'

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नेपाल के राष्ट्रीय चिह्न में सबसे नीचे मोटो के रूप में श्लोक दर्ज है. (चित्र विकिकॉमन्स से साभार)


क्या यह रामायण का श्लोक है?
इस तरह के दावे को समझना बहुत ज़रूरी है. जानकारों के मुताबिक यह श्लोक रामायण के बहुत कम यानी सीमित पाठों में मिलता है लेकिन महत्वपूर्ण पाठ में नहीं. दूसरी तरफ, यह श्लोक दो तरह से मिलता है. रामायण का जो संस्करण मद्रास की हिंदी प्रचार प्रेस ने 1930 में जारी किया था, उसके हिसाब से यह श्लोक इस तरह है:

मित्राणि धन धान्यानि प्रजानां सम्मतानिव |
जननी जन्म भूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी ||

इस संस्करण के मुताबिक ऋषि भारद्वाज ने राम को संबोधित करते हुए यह श्लोक कहा, जिसका अर्थ है मित्रों, धनवानों और अनाजों की इस संसार में बड़ी प्रतिष्ठा है, लेकिन मां और मातृभूमि स्वर्ग से भी बढ़कर हैं.

दूसरे पाठों के मुताबिक यह श्लोक लंका विजय के बाद राम ने लक्ष्मण को संबोधित करते हुए इस तरह कहा:

अपि स्वर्णमयी लङ्का न मे लक्ष्मण रोचते |
जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी ||

इस संदर्भ में इस श्लोक का अर्थ है 'हे लक्ष्मण, यह लंका सोने की होने पर भी मेरी रुचि का विषय नहीं है क्योंकि मां और मातृभूमि ही स्वर्ग से बढ़कर हैं.'

क्यों नेपाल का मोटो है यह श्लोक?
वास्तव में, भारत और नेपाल लंबे समय से मित्र राष्ट्र रहे हैं. प्राचीन भारत में तो नेपाल अलग राष्ट्र था ही नहीं. नेपाल की राष्ट्रीय भाषा नेपाली पर संस्कृत के साथ ही अन्य भारतीय भाषाओं का प्रभाव रहा है. भाषाओं के मामले में नेपाली सिर्फ एक डेढ़ सदी पुरानी भाषा है. इसकी लिपि भी देवनागरी ही है.

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रामायण ग्रंथ के कई वर्जन देश और दुनिया में प्रचलित हैं. (फाइल फोटो)


नेपाली पर संस्कृत और भारतीय साहित्य का प्रभाव भी स्पष्ट रहा है. 19वीं सदी के नेपाली के प्रमुख साहित्य में सुंदरानंद कृत अध्यात्म रामायण और भानुभक्त आचार्य कृत रामायण के एक रूप का शुमार है. स्पष्ट है कि संस्कृत साहित्य और भारतीय संस्कृति का प्रभाव नेपाल पर रहा है इसलिए संस्कृत के इस श्लोक का नेपाल के मोटो के रूप में दर्ज होना अजूबा नहीं है.

नेपाल के राष्ट्रीय चिह्न में रहा है यह श्लोक
जिस चिह्न को अपडेट करके फिर जारी किया गया है उसे असल में, जनता के प्रभुत्व, राष्ट्र की पहचान, राष्ट्रीय एकता और स्वाभिमान के प्रतीक के रूप में नबींद्र मन राजभंडारी, हिमालय गौतम और कृष्ण श्रेष्ठ जैसे कलाकारों ने मिलकर डिज़ाइन किया था. ढालों और राष्ट्रीय महत्व की चीज़ों पर इस्तेमाल होने वाले इस राष्ट्रीय चिह्न में 1935 से अब तक करीब आधा दर्जन बार बदलाव हुए हैं, लेकिन यह श्लोक मोटो के तौर पर तबसे ही नेपाल के चिह्न पर रहा है.

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